Saturday, May 23, 2015

कबीर जयंती और बर्फ

माह मई से जून में कबीर जयंती मनाने की धूम मची है. तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं. लेकिन गर्मी का चढ़ता पारा देख कर दिल धड़क रहा है. कुछ जगहों पर लू से लोग मर रहे हैं.

सौ साल पहले पैदा हुए जुलाहों के जन्म का कोई पक्का रिकार्ड नहीं मिलता. उन दिनों किसी त्योहार या किसी की शादी या गाय-भैंस की पैदाइश के मौके के साथ जन्मदिन याद रखने का रिवाज़ था. सोचिए कि जुलाहों के घर पैदा हुए कबीर की सही जन्म तिथि किसे पता होगी.

कबीर मंदिरों में जयंती मनाने के लिए जयंती तो तय करनी ही थी. चढ़ावा बहुत बड़ी चीज़ होती है. सो पंडितों ने तिकड़म लड़ा कर ज्योतिष के लिहाज़ से एक मुहूर्त तैयार किया जिसके साथ कथाएँ जोड़ीं और कबीर का जन्मदिन फिक्स हो गया. हनुमान तक का हो चुका है. लेकिन सोचें कि दलित तबकों में जन्में संतों के जन्मदिन मई-जून में और पूर्णमासी के दिन ही क्यों पड़ते हैं अष्टमी और नौवीं के दिन क्यों नहीं.

अब जब लोग कबीर जयंती के लिए तैयारी करते हैं तो एक हाथ में बिस्लेरी की बोतल होती है और दूसरे में माथे से पसीना पोंछता तौलिया. इस मौके पर भाषण और भजन पसीने की तरह सूखते हैं.

यारो आपको किसने रोका है कि जून में कबीर के नाम पर छबीलें लगाओ लेकिन कबीर ज्ञान दिवस अक्तूबर-नवंबर के सुहावने मौसम में अपनी सुविधा के अनुसार मनाओ. इसके लिए किसी ज्योतिषी की नहीं केवल आपकी अपनी समझदारी की ज़रूरत है. फिर देखिए कबीर जयंती का जमावड़ा और अपनी लोकशक्ति का नज़ारा.

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