Monday, September 21, 2015

History of Meghs - मेघों का इतिहास

मेघवंशी समुदायों के लोग आपस में एक दूसरे से पूछते रहे हैं कि भाई, हमारा इतिहास क्या है? उत्तर मिलता है कि - पता नहीं.

इतिहास तो बाद की बात है, पहले कुछ ऐतिहासिक सवाल हैं -
मेघों का इतिहास है तो उन्होंने युद्ध भी लड़ा होगा. इसके पर्याप्त सबूत हैं कि मेघवंशी या मेघ-भगत योद्धा रहे हैं हालाँकि उनके अधिकतर इतिहास का लोप कर दिया गया है. नवल वियोगी जैसे इतिहासकारों ने नए तथ्यों के साथ इतिहास को फिर से लिखा है और बताया है कि इस देश के प्राचीन शासक नागवंशी थे. आपने मेघ ऋषि के बारे में सुना होगा उसे वेदों में 'अहि' यानि 'नाग' कहा गया है.

''मेघवंश'' एक मानव समूह है जो उस कोलारियन ग्रुप से संबंधित है जो मध्य एशिया से ईरान के रास्ते इस क्षेत्र में आया था. इसका रंग गेहुँआ (wheetish) है.

मेघवंशी सत्ता में रहे हैं जिसे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) कहा जाता था. लेकिन के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री (जिन्होंने मेघ राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया) और आर.बी. लाथम ऐसे इतिहासकार हैं जिनकी खोज ने उस समय का इतिहास खोजा. आज इतिहास में कोई 'अंधकार काल' नहीं है.

मेघवंशी रेस ने मेडिटेरेनियन साम्राज्य की स्थापना की थी जो सतलुज और झेलम तक फैला था. पर्शियन राज्य की स्थापना के बाद यह समाप्त हो गया और मेदियन साम्राज्य के लोग बिखर गए होंगे इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है.

आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र में बसे लोग 'मेघ ऋषि' जिसे 'वृत्र' भी कहा जाता है के अनुगामी थे या उसकी प्रजा थे. उसका उल्लेख वेदों में आता है. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका आधिपत्य (Suzerainty) था. सप्तसिंधु का अर्थ है सात दरिया यानि सिंध, सतलुज, ब्यास, रावि, चिनाब, झेलम और यमुना. आर्यों का आगमन ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व माना जाता है और मेदियन साम्राज्य ईसा से 600 वर्ष पूर्व अस्तित्व में था. इस दौरान आर्यों के बड़ी संख्या में आने की शुरूआत हुई और इस क्षेत्र में मेघवंशियों के साथ लगभग 500 वर्ष तक चले संघर्ष के बाद आर्य जीत गए. यह लड़ाई मुख्यतः दरियाओं के पानी और उपजाऊ जमीन के लिए लड़ी गई.

आर.एल. गोत्रा जी ने लिखा है कि 'वैदिक साहित्य के अनुसार मेघ या वृत्र से जुड़े लगभग 8 लाख मेघों की हत्या की गई थी'. धीरे-धीरे आर्यों का वर्चस्व स्थापित होता चला गया जो बुद्ध के बाद पुष्यमित्र शुंग के द्वारा असंख्य बौधों की हत्या तक चला जिसमें बौधधर्म के मेघवंशी प्रचारक भी बड़ी संख्या में शामिल थे. कालांतर में ब्राह्मणीकल व्यवस्था स्थापित हुई, मनुस्मृति जैसा धार्मिक-राजनीतिक संविधान पुष्यमित्र ने स्मृति भार्गव से लिखवाया. जात-पात निर्धारित हुई और मेघवंशियों का बुरा समय शुरू हुआ.

मेघों का प्राचीन इतिहास भारत में कम और पुराने पड़ोसी देशों के इतिहास में अधिक है. यह उनके लिए दिशा संकेत है जो खोजी हैं.

ख़ैर, बहुत आगे चल कर आर्य ब्राह्मणों की बनाई हुई जातिप्रथा में शामिल होने से मेघवंश से कई जातियाँ निकलीं. पंजाब और जम्मू-कश्मीर के मेघ-भगत एक जाति है तथापि मेघवंश से राजस्थान के मेघवाल भी निकले हैं और गुजरात के मेघवार भी. कई अन्य जातियाँ भी मेघवंश से निकली हैं जिन्हें आज हम पहचाने से इंकार कर देते हैं लेकिन पहचानने की कोशिशें तेज़ हो रही है.

आपके गोत्र में आपका थोडा-सा इतिहास रहता है और आपका सामाजिक स्तर भी. गोत्र से उन सारी बातों का प्रचार हो जाता है जो याद दिलाती रहती हैं कि कौन सा वर्ण सबसे ऊँचा है या सबसे ऊँचे से कितना नीचे है.

लोगों को आपने जन्म-मरण, विवाह के संस्कारों के समय अपना गोत्र छिपाते हुए देखा होगा. वे केवल ऋषि गोत्र से काम चलाना चाहते हैं. वे जानते हैं कि गोत्र बता कर वे अपनी जाति और अपने सामाजिक स्तर की घोषणा खुद करते हैं जो उन्हें अच्छा नहीं लगता. गोत्र की परंपरा का बोलबाला देख कर मेघों ने भी ख़ुद को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस गोत्र व्यवस्था को अपनाया. गोत्र-परंपरा ब्राह्मणी परंपरा से ली गई प्रथा है.

आमतौर पर ब्राह्मण परंपरा में गोत्र को रक्त-परंपरा (अपना ख़ून) और वंश के अर्थ में लिया जाता है. इसलिए ब्राह्मण हमेशा ब्राह्मण ही रहेगा. मेघवंशी मेघवंशी ही रहेगा. वह आर्य या ब्राह्मण नहीं बन सकता. एक अन्य परंपरा के अनुसार मेघों की पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती थी. इसलिए सारे भारत में मेघ वाशिष्ठी, वशिष्टा या वासिका नाम से जाने गए. फिर कई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया.

आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष के रूप में मेघ नामधारी महापुरुष को मानते आए हैं. यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता (वंशकर्ता) है. इसे सभी मेघवंशी मानते हैं.

मेघों का धर्म
क्या मेघों का अपना कोई पुराना धर्म है? इतिहास खुली नज़र से इसका भी रिकार्ड देखता है. मेघ समुदाय में मेघों के धर्म के विषय पर कुछ कहना टेढ़ी खीर है. जम्मू के एक उत्साही युवा सतीश एक विद्रोही ने इस विषय पर एक चर्चा आयोजित की थी जिसमें बहुत-सी बातें उभर कर आई थीं. वैसे आज धर्म नितांत व्यक्तिगत चीज़ है.

राजस्थान के बहुत से मेघवंशी अपने एक पूर्वज बाबा रामदेव में आस्था रखते हैं. गुजरात के मेघवारों ने अपने पूर्वज मातंग ऋषि और ममई देव के बारमतिपंथ को धर्म के रूप में सहेज कर रखा है और उनके अपने मंदिर हैं, पाकिस्तान में भी हैं. प्रसंगवश मातंग शब्द का अर्थ मेघ ही है. मेघवार अपने सांस्कृतिक त्योहारों में सात मेघों की पूजा करते हैं. संभव है वे सात मेघवंशी राजा रहे हों. ममैदेव महेश्वरी मेघवारों के पूज्य हैं जो मातंग देव या मातंग ऋषि के वंशज हैं. ममैदेव का मक़बरा जिस कब्रगाह में है उसे यूनेस्को ने विश्वधरोहर (World Heritage) के रूप में मान्यता दी है. इस प्रकार एक मेघवंशी का निर्वाण स्थल विश्वधरोहर में है.

मेघ कई अन्य धर्मों/पंथों में गए जैसे राधास्वामी, निरंकारी, ब्राह्मणीकल सनातन धर्म, सिखिज़्म, आर्यसमाज, ईसाईयत, विभिन्न गुरुओं की गद्दियाँ, डेरे आदि. सच्चाई यह है कि जिसने भी उन्हें 'मानवता और समानता' का बोर्ड दिखाया वे उसकी ओर गए. लेकिन उनका सामाजिक स्तर वही रहा. धार्मिक दृष्टि से उनकी अलग पहचान और एकता नहीं हो पाई. मेघों ने सामूहिक निर्णय कम ही लिए हैं.

लेकिन इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि आर्यसमाज द्वारा मेघों के शुद्धीकरण के बाद मेघों का आत्मविश्वास जागा, उनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा बढ़ी और स्थानीय राजनीति में सक्रियता की उनकी इच्छा को बल मिला. वे म्युनिसपैलिटी जैसी संस्थाओं में अपनी नुमाइंदगी की माँग करने लगे. इससे आर्यसमाजी परेशान हुए.

मेघों की नई पीढ़ी कबीर की ओर झुकने लगी है ऐसा दिखता है और बुद्धिज़्म को एक विकल्प के रूप में जानने लगी है. यह भी आगे चल कर मेघों के धार्मिक इतिहास में एक प्रवृत्ति (tendency) के तौर पर पहचाना जाएगा. मेघों में संशयवादी (scepticism) विचारधारा के लोग भी हैं जो ईश्वर-भगवान, मंदिर, धर्मग्रंथों, धार्मिक प्रतीकों आदि पर सवाल उठाते हैं और उनकी आवश्यकता महसूस नहीं करते. मेघों की देरियाँ भी उनके पूजास्थल हैं जो अधिकतर जम्मू में और दो-तीन पंजाब में हैं.

इधर ''मेघऋषि'' का मिथ धर्म और पूजा पद्धति में प्रवेश पाने के लिए आतुर है. मेघऋषि की कोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं है लेकिन कल्पना की जाती है कि एक जटाधारी भगवा कपड़े पहने ऋषि रहा होगा जो पालथी लगा कर जंगल में तपस्या करता था. इसी पौराणिक इमेज के आधार पर गढ़ा, जालंधर में एक मेघ सज्जन सुदागर मल कोमल ने अपने देवी के मंदिर में मेघऋषि की मूर्ति स्थापित की है. राजस्थान में गोपाल डेनवाल ने मेघ भगवान और मेघ ऋषि के मंदिर बनाने का कार्य शुरू किया है. इसके लिए उन्होंने मोहंजो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 .पू. की एक प्रतिमा जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियम, कराची, में रखी है उसकी इमेज या छवि का भी प्रयोग किया है. मेघ भगवान की आरतियाँ, चालीसा, स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई और बाँटी गई हैं.

कमज़ोर आर्थिक-सामाजिक स्थिति की वजह से राजनीति के क्षेत्र में मेघों की सुनवाई लगभग नहीं के बराबर है और सत्ता में भागीदारी बहुत दूर की बात है. एक सकारात्मक बात यह है कि पढ़े-लिखे मेघों ने बड़ी तेज़ी से अपना पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता कई अन्य कार्यों में दिखाई और उसमें सफल हुए. व्यापार के क्षेत्र में इनकी पहचान बने इसकी प्रतीक्षा है.

मेघों के इतिहास के ये कुछ पृष्ठ ख़ाली पड़े हैं.

1. अलैक्ज़ेंडर कन्निंघम ने अपनी खोज में मेघों की स्थिति को सिकंदर के रास्ते में बताया है. हालाँकि राजा पोरस पर कई जातियाँ अपना अधिकार जताती हैं. तथापि यह देखने की बात है कि उस समय पोरस की सेना में शामिल योद्धा जातियाँ कौन-कौन थीं. भूलना नहीं चाहिए कि उस क्षेत्र में मेघ बहुत अधिक संख्या में थे जो योद्धा थे. कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि पोरस ने ही सिकंदर को हराया था.

2. केरन वाले भगता साध की अगुआई में कई हज़ार मेघों ने मांसाहार छोड़ा. यह एक तरह का एकतरफा करार था. इस करार की शर्तों और पृष्ठभूमि को देखने की ज़रूरत है.

3. कुछ मेघों ने विश्वयुद्धों में, पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में हिस्सा लिया है. वे दुश्मन की सामाओं में घुस कर लड़े हैं. उनके बारे में जानकारी नहीं मिलती.

4. दीनानगर की अनीता भगत ने बताया था कि एक मेघ भगत मास्टर नरपत सिंह, गाँव बफड़ीं, तहसील और ज़िला हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश), (जीवन काल - सन् 1914 से 1992 तक) स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा पा चुके हैं. अनीता ने उनके बारे में जानकारी और फोटोग्राफ इकट्ठे करके भेजे हैं. उस वीर को 1972 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र भेंट किया था. गाँव की पंचायत ने उनके सम्मान में स्मृति द्वार बनवाया है. एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसके शरीर पर गोलियों के छह निशान थे. ऐसे लोग शायद और भी मिलें. देखिए. ढूँढिए.

5. मेघवंश के लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का रिकार्ड तैयार करने की भी ज़रूरत है. एडवोकेट हंसराज भगत, भगत दौलत राम जी के बारे में कुछ जानकारी मिली है. यह सूची अधूरी है.

6. ऐसे ही मेघों के राजनेताओं की जानकारी का संकलन अभी तक नहीं हो पाया है.

जो अब तक कहा गया है उसे अंत में आप मेघों के इतिहास की हेडलाइन्स समझ कर संतोष करें.

मेघ इतने दमन के बावजूद बेदम नहीं हुए बल्कि आज वे पहले से अधिक प्रकाशित हैं. अन्य जातियों के साथ मिला कर वे देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं. आने वाले समय में इनकी भूमिका बहुत एक्टिव होगी और स्पेस भी अधिक होगा. पने पिछले इतिहास को थोड़ा-सा जान लिया है. अब अपने आज को सँवारिए और भविष्य बनाइए जो आपका है.

जय मेघ, जय भारत.

भारत भूषण भगत
 चंडीगढ़.



Wednesday, July 8, 2015

Megh Coins found in Punjab and Afghanistan

THE JOURNAL OF THE BOMBAY BRANCH OF THE ROYAL ASIATIC SOCIETY. में जॉन विल्सन द्वारा प्राचीन सिक्कों की पहचान के बारे में लिखे गए एक संक्षिप्त शोध आलेख का कुछ अंश यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है। जिसमे उनके पास पंजाब और अफ़ग़ानिस्तान में प्राप्त हुए कुछ सिक्के भेजे गए थे, उनके विश्लेषण करते हुए उनमे मेघवंश के सिक्कों का वर्णन किया है। इससे यह बात प्रमाणित होती है कि ईसवी शताब्दी प्रारम्भ होने से पहले कन्नौज, पंजाब और अफ़ग़ानिस्तान में मेघों का राज्य था। विल्सन ने इन सिक्कों को क्षत्रप सिक्कों की श्रेणी में रखा है। ज्यादा जानकारी के लिए मूल लेख देखा जा सकता है, जो एशियाटिक जर्नल मे पब्लिश है-
"Art. X. — Brief Notes on certain Ancient Coins lately presented to or exhibited before the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society."
( Pages 126 to 131 )
By John Wilson,
D. D. Honorary President of the Society.
Original Text follows as under:
..."..................but having no Barbarian titles," I find in Captain Christopher's collection nine of Soter MEGAS, of two or three types. They belong to a class which is exceedingly numerous not only in the Panjab, where they were found, but in Afghanistan, where Mr. Masson procured two hundred and fifty seven specimens in three years. They have on the obverse generally a helmeted or coronated king with a nimbus, with out any inscription ; and on the reverse the figure of a man mounted on horseback, with the legend BA2ILEY2 BA2ILEQN SQTHP MEr- A2 sometimes in a corrupted form. "The large number of these coins," says professor Lassen, " prove that this [nameless] king possessed an ample empire, and did not reign for a short time. He must have ruled in Kabul and a part of the Panjab." The same distinguished Antiquarian and Orientalist says that " he must have belonged to a certain Scythian horde, which had for some time their abode in a country, where purely Greek and not native characters were adopted for the coins." He adds, " At an after period he perhaps used them ; if indeed the coins with native legends which M. Mionnet assigns him, be really his." In one specimen now before us, there is the appearance of such a legend as that now referred to, but the letters are so indistinct that nothing can be made of them. Mr. Prinsep makes the nameless Soter MEGAS flourish about 70 years B. C. He must have been prior to the conquest of the Panjab and Kabul by Vikramaditya, whose era, 56 before Christ, dates from a victory over the Scythians in the Panjab. Of the Kadphises group of Indo-Scythian coins, referrible to the time between the Christian era and the century following, there are seven specimens in Capt. Christopher's collection. It also furnishes ten of the Kanerhi group ; fifteen of the Indian Kanavj dynasty ; eleven coins which I have not yet been able to class, but of which something may be made ; twenty-one coins which are much defaced ; and one hundred and twenty one with Arabic and Persian inscriptions. None of these series, I have found time sufficiently to examine ; but, perhaps, I may be able to direct attention to some of them at a subsequent meeting of the Society, particularly if any peculiarities appear in them worthy of distinct notice. They form altogether a valuable accession to our Museum." Page 131


Please add it in last of megh coins punjab/afghanistan

"3. Dr. Wilson, on behalf of Captain Christopher. I. N., present the Society a collection of ancient coins made by that gentleman during his late voyages of research and experiment on the Indus. These coins had been assorted and arranged by Dr. Wilson. A great number of them belong to the Bactrian and Indo-Scythian and Kanauj dynasties, including one of Heliocles, one of Azes, nine of Soter Megas, seven of the Kadphises group, ten of the Kanerki, fourteen of the Kanauj or ancient Hindee series, eleven not yet identified, but of which some thing may be made, and twenty one much defaced. There were also 121, with Arabic and Persian characters, which had not yet been ex amined. On the most remarkable of these coins, and the Parthian coin lately exhibited by Dr. Buist, and some specimens from Dr. Wilson's own collection, some notes were read by Dr. Wilson, which will appear in the next number of the Society's Journal. A continuation of his paper was promised, should anything of novelty or interest be discovered on a further study of Captain Christopher's valuable gatherings." Page 185
Reference:
THE JOURNAL OF THE BOMBAY BRANCH OF THE ROYAL ASIATIC SOCIETY.
EDITED BY THE SECRETARY,
VOL. III. IN TWO PARTS. PART II.
DECEMBER 1848 TO NOVEMBER 1840.
BOMBAY:
AMERICAN MISSION PRESS.
T. -GRAHAM, PRINTER.
Year of publication: 18 5 1.

Saturday, May 23, 2015

कबीर जयंती और बर्फ

माह मई से जून में कबीर जयंती मनाने की धूम मची है. तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं. लेकिन गर्मी का चढ़ता पारा देख कर दिल धड़क रहा है. कुछ जगहों पर लू से लोग मर रहे हैं.

सौ साल पहले पैदा हुए जुलाहों के जन्म का कोई पक्का रिकार्ड नहीं मिलता. उन दिनों किसी त्योहार या किसी की शादी या गाय-भैंस की पैदाइश के मौके के साथ जन्मदिन याद रखने का रिवाज़ था. सोचिए कि जुलाहों के घर पैदा हुए कबीर की सही जन्म तिथि किसे पता होगी.

कबीर मंदिरों में जयंती मनाने के लिए जयंती तो तय करनी ही थी. चढ़ावा बहुत बड़ी चीज़ होती है. सो पंडितों ने तिकड़म लड़ा कर ज्योतिष के लिहाज़ से एक मुहूर्त तैयार किया जिसके साथ कथाएँ जोड़ीं और कबीर का जन्मदिन फिक्स हो गया. हनुमान तक का हो चुका है. लेकिन सोचें कि दलित तबकों में जन्में संतों के जन्मदिन मई-जून में और पूर्णमासी के दिन ही क्यों पड़ते हैं अष्टमी और नौवीं के दिन क्यों नहीं.

अब जब लोग कबीर जयंती के लिए तैयारी करते हैं तो एक हाथ में बिस्लेरी की बोतल होती है और दूसरे में माथे से पसीना पोंछता तौलिया. इस मौके पर भाषण और भजन पसीने की तरह सूखते हैं.

यारो आपको किसने रोका है कि जून में कबीर के नाम पर छबीलें लगाओ लेकिन कबीर ज्ञान दिवस अक्तूबर-नवंबर के सुहावने मौसम में अपनी सुविधा के अनुसार मनाओ. इसके लिए किसी ज्योतिषी की नहीं केवल आपकी अपनी समझदारी की ज़रूरत है. फिर देखिए कबीर जयंती का जमावड़ा और अपनी लोकशक्ति का नज़ारा.

Tuesday, March 24, 2015

Darshan Muni - दर्शन मुनि


कालेज के दिनों में दर्शन मुनि जी से सैक्टर-18 की एक धर्मशाला में मिलने का मौका मिला था. मुझे मेरे जीजा जी श्री सत्यव्रत शास्त्री जी उनसे मिलवाने ले गए थे. उसके बाद वे एक बार मेरे पिता भगत मुंशीराम जी से मिलने के लिए हमारे घर आए थे तब मैं चंडीगढ़ से बाहर नौकरी कर रहा था. मैंने अपने जीवन में केवल एक ही मेघ भगत को जैन मुनि के रूप में देखा है. जनने की उत्सुकता थी. कई वर्ष बाद पता चला कि वे ऊधमपुर, जम्मू में कार्य कर रहे थे. फिर पता चला कि वे लुधियाना में भी रहे और वहाँ उनके शिष्यों ने उनके लिये एक आश्रम बनवा दिया था. कुछ दिन पूर्व श्री इंद्रजीत मेघ से बात की तो उन्होंने कुछ और जानकारी के संकेत दिए. समय पाकर मैंने उनसे वीडियो के रूप में जानकारी देने के लिए कहा. उस बातचीत को आप नीचे दिए वीडियो लिंक पर देख सकते हैं. 

(दर्शन मुनि जी की कोई फोटो या उनके जीवन के बारे में कोई जानकारी आपके पास के पास हो तो कृपया bhagat.bb@gmail.com पर भिजवाने की कृपा करें.)

वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें



 MEGHnet

Thursday, January 15, 2015

Col. Tilak Raj - कर्नल तिलक राज



शास्त्र और शस्त्र के धनी कर्नल तिलक राज का जन्म 09 अगस्त 1940 को हुआ. 1971 के भारत पाक युद्ध में आपने महत्वपूर्ण कमान संभाली जिसके लिए थल सेना अध्यक्ष द्वारा आपको दो बार सम्मानित किया गया. हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में समान रूप से लिखते हैं. इनकी पाँच कृतियाँ भी प्रकाशित हो चुकी हैं. ग़ज़ल लेखन में विशेष महारत हासिल है.
उनकी नीचे दी गई दो ग़ज़लें 'शब्द प्रवाह' पत्रिका के वार्षिक काव्य विशेषांक - 2014 में छपी थीं जिन्हें आपके लिए प्रस्तुत किया गया है.

(1)
ज़िंदगी इक किताब है यारो
हर वरक़ लाजवाब है यारो
पढ़ सको तो पढ़ो मुहब्बत से
दिल की उम्दा किताब है यारो
ख़ुदनुमाई जहाँ की फ़ितरत है
ये नशीली शराब है यारो
लोक सेवक नहीं यहाँ कोई
हर कोई इक नवाब है यारो
हक़फ़रोशी है जिस तरफ़ देखो
दोस्ती इक नक़ाब है यारो
क़त्ल होती रही शराफ़त क्यों
वक़्त मांगे हिसाब है यारो

(2)
लूट का दरबार है चारों तरफ़
आज अत्याचार है चारों तरफ़
हर कोई भरमा रहा है हर घडी
गुमशुदा संसार है चारों तरफ
अब घटाएँ ख़ौफ़ की हैं छा गईं
आदमी बेज़ार है चारों तरफ़
जितने भी हैं लोग बेबस हैं यहाँ
ज़िंदगी लाचार है चारों तरफ़
क्या मिले दैरो-हरम मे बंदगी से
मौन की दीवार है चारों तरफ़

यू ट्यूब पर उनकी एक गज़ल है  


सर्द रातों में दिल मचलता है
दिल में ग़म करवटें बदलता है
झूठे सपनों में रात बीती है
जाग जाऊँ कि दिन निकलता है
क्यों फ़िज़ा में है कँपकपी तारी
कौन मन को मेरे मसलता है
तुम जो आओ तो रोशनी फैले
वरना सूरज तो रोज़ ढलता है





इसे आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके चिताले जी की भावपूर्ण वाणी में सुन सकते हैं
Sh. Vijay Chitale
सर्द रातों में दिल मचलता है