Monday, April 28, 2014

गोत्र प्रथा

ब्राह्मणवादी कर्मकांडों और पंरपराओं में अपने गोत्र का नाम बोलना ऐसा उपकरण है जो व्यक्ति की जातीय न्यूनता या ग़ुलामियत के स्तर को नाप लेने में सक्षम है. हर ब्राह्मणवादी कर्मकांड में इसे उच्चारना ज़रूरी है ताकि व्यक्ति अपनी जाति का विज्ञापन स्वयं करे. लोग अपनी इस मजबूरी के ख़ुद ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने या आपने इसे ज़बरदस्ती अब तक ओढ़ा हुआ है और उधर साधारण व्यक्ति के दिल में धर्म का इतना डर बैठा दिया गया है कि धर्म भी खुद को प्रेत समझने लगे. व्यक्ति न चाहते हुए भी ऐसी गाय बन जाता है जो केवल आर्यवाद/ब्राह्मणवाद को दूध पिलाती है. यदि कोई उस दूध को तरसता रह जाता है तो वह है आपका अपना वंश, आपका अपना बछड़ा.

1 comment:

  1. कर्मकांड में ये जरूरी क्यों है शायद इस वोशय पे प्रकाश डालना जरूरी है ... अगर ये केवल प्रतीक/मिथ्या के लिए है तो इस रीत का खत्म हो जाना ही उचित है ...

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