Tuesday, February 25, 2014

Deprived castes and God - वंचित जातियां और ईश्वर

ताराराम जी ने फेस बुक पर एक पुस्तक से बहुत ही विचारणीय विषय उठाया था जो इस प्रकार था-

".....क्योंकि सिद्धांत के स्तर पर आप कुछ भी कहते हैं वह वैदिक किंवा हिंदू संस्कृति के लिए घृणा या विरोध का कारण नहीं बन सकता है, परंतु ज्यों ही आप व्यवहार की बात करेंगे उनका विरोध विधिरूपा होगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. इसके पीछे हिंदुओं की यह ऐतिहासिक सीख है - आध्यात्मिक विचार की स्वतंत्रता होनी चाहिए परंतु जीवन की क्रियात्मक योजना में स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए. वह तो हिंदू व्यवस्था के अनुरूप ही होना चाहिए. वस्तुतः हिंदुओं का विरोध भारत के अन्य समाजों के आध्यात्मिक विचारों के साथ उतना नहीं है, जितना कि उनके जीवन की क्रियात्मक योजना के साथ है. विचार की स्वतंत्रता किंतु धर्म की कट्टरता इतिहास के आरंभिक काल से उसकी विशेषता रही है जिसे आज भी देखा जा सकता है. यह वैदिक परंपराओं की अन्यान्य विशेषताओं में से एक है. इसी कारण इसने सांख्य, मीमांसा, सिद्ध, नाथ, कबीर आदि कइयों के आध्यात्मिक विचारों को अपने में समाहित कर लिया है एवं अपने व्यापक स्वरूप का बखान किया."

बहुत विचार के बाद मैंने उस पर यह टिप्पणी की-

"वंचित जातियों के लोग हर जगह उपेक्षित महसूस करते हैं. आध्यात्मिक क्षेत्र में भी काफी प्रतियोगिता है. वंचित लोग जानते हैं कि आध्यात्मिक विषयों में काफी लफ़्फाज़ी भरी पड़ी है जिसका मुकाबला वे आसानी से कर सकते हैं और बता सकते हैं कि वे भी इस रहस्यमय क्षेत्र में दखल रखते हैं. इस पर वे बड़े शौक से और बहुत बोलते हैं, बहस करते हैं. लेकिन इसे ग़लतफहमी ही कहा जाएगा.

लफ़्फाज़ी के पीछे जो पैसे का खेल है उसका मुकाबला करने योग्य उन्हें नहीं छोड़ा गया. मैं दावे से कह सकता हूँ कि लोगों को कहा जाए कि यदि उन्हें ईश प्राप्ति हो गई है तो वे भौतिक सुख त्याग दें तो वे ईश को त्यागना बेहतर समझेंगे. ईश अनुभूति से आनंद-शांति तो मिल सकती है लेकिन रोटी-रोज़ी नहीं मिलती. कम से कम एक महापुरुष ने कहा है कि अपनी कमाई के लिए भगवान पर भी भरोसा मत करो."