Tuesday, November 11, 2014

मेघ मिलन–उर्फ़-होना एक इलैक्शन का - और कुछ बातें प्रसंगवश

मेघों का एक आयोजन देखा. सभा का इलैक्शन होना था. इलैक्शन हुआ भी. हाथ खड़े करके लोगों ने सभा के पदाधिकारियों को चुना. सवालिया हैरानगी इस बात पर हुई कि लोकतंत्र में गुप्त मतदान प्रणाली आखिर क्यों है? इसीलिए न कि व्यक्ति बिना डर-लिहाज़ के वोट डाले. बिरादरी के चुनावों में यदि लोग आमने-सामने बैठ कर हाथ खड़े करके वोट करें तो गोपनीयता तो खारिज हो ही गई. यदि समाज में किसी उम्मीदवार की नुइसेंस वैल्यू स्थापित हो तो उसके विरुद्ध कौन हाथ खड़े करेगा. नामिनेशन करने तक से लोग झिझकते हैं कि फलाँ रिश्तेदार (जो वहीं बैठा है) नाराज़ न हो जाए. खैर, चुनाव (?) होना तय था सो हो गया. बधाइयाँ!

अब प्रसंगवश और कुछ बातें. मेघों की आम सभाओं में युवा क्यों नदारद होते हैं. यह कोई इल्ज़ाम नहीं है सिर्फ़ लक्षण की बात की है. अब यह सोचना भी बेकार है कि सीनियर मेघ ही क्यों आते हैं, हाँ यह सवाल तो बनता है कि उनके आने से क्या सुधर गया. सीनियर्स में से भी सीनियर और ज़िंदा दिल बेबाक मेघजन क्यों नहीं आते हैं. यह स्थिति समझने-समझाने का कैसे मुद्दा बने.

एक वक्ता ने भारत सरकार की शिक्षा नीति पर अपना लंबा परचा पढ़ा, Of course, अंगरेज़ी में. बहुत अच्छा लिखा होगा ऐसा यकीन है. एक बात उनके भाषण में ग़ायब थी या शायद मैं ही नहीं सुन पाया कि महँगी शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए क्या किया जा सकता है. शायद उन्होंने बताया हो लेकिन मेरी अंगरेज़ी कम पड़ी हो. कहने का मतलब यह कि शिक्षा नीति तो चुनी हुई सरकार ही बनाती है तो सरकार तक अपनी चीख़ कैसे पहुँचाई जाए.

कुछ भाषण करने वालों ने कबीर को सजदे किए, कुछ ने बाबा साहेब अंबेडकर को नमन किया. लेकिन अपनी जातीय स्थिति की बात लगभग नहीं ही की. उक्त चुनाव प्रक्रिया के दौरान गाँव में बैठे मेघों की दशा कहीं हाशिए पर भी बैठी नहीं दिखी.

जम्मू के एक सज्जन ने ताराराम जी की पुस्तक ''मेघवंश - इतिहास और संस्कृति'' का ज़िक्र किया और बताया कि मेघों के पुरखे राजा-महाराजा रहे हैं और कि आज के मेघ उन्हीं की संतानें हैं. यह बात कई कानों को चौकन्ना कर गई. आपमें से किसी ने वह किताब पढ़ी है क्या? नहीं तो पढ़ें ज़रूर ताकि आपका आत्मगौरव धूल झाड़ कर उठ खड़ा हो.

दो-एक वक्ताओं ने अपना भाषण ''जय मेघ, जय भारत'' के साथ समाप्त किया. वहाँ बैठे कुछ मेघ इससे भी चौंके. आपको नहीं लगता कि मेघवंश अब ख़ुद की पहचान को अखिल भारतीय स्तर पर देखने लगा है? सिर हिला कर हाँ तो कर दीजिए जनाब!

MEGHnet

Tuesday, October 28, 2014

मेघों भगतों का फेसबुकिया इतिहास



Prof, Rajkumar Bhagat ने फेसबुक पर एक ग्रुप बनाया - Bhagat Network, उसके नामों में कई बार परिवर्तन किया. एक दिन उनके सहयोगी एडमिन ने उनका ग्रुप हाइजैक (हैक नहीं) कर लिया. तब कई मेघ पोस्टिंग न कर पाने के कारण बेचैन रहने लगे. ऐसी हालत में Megh forum बना लिया गया. पोस्टिंग की भूख एक हद तक मिटती रही. कुछ समय बाद भगत नेटवर्क किसी तरह घर लौट आया और आबाद हुआ. आने वाले समय में उसमें कुछ non-मेघ घुपैठिए भी शामिल हुए.

इस बीच बड़े भाई मेघवालों और मेघवारों के भी ग्रुप सामने आए और मेघ छा गए. मतलब बहुत फैल गए. फिर सक्रिय मेघवंशी युवाओं का आक्रमण हुआ. नए-नए पेज बने, ग्रुप बने और 'ग्रुप विदिन द ग्रुप' बने. कई जुलाहे असंतोष के कारण बसी हुई बस्तियाँ छोड़ कर गाँव से बाहर बैठ गए लेकिन कुछ पुराने साथियों को न्योतना नहीं भूले. मेघों ने 'ऑल इंडिया.....' के नाम से शुरू एससी और एसटी ग्रुपों में पैठ बना ली. नतीजतन इतनी पोस्टें हर रोज़ आने लगीं कि कुछ सीनियर्स की ऐनकों के शीशे अक्सर बदलने लगे. लेकिन ओल्ड हैबिट्स तो डाई हार्ड होती हैं न.

वर्तमान में आसमानी अफरातफरी है. कोई मेघ इधर से उधर उड़ रहा है और कोई उधर से इधर. समझ नहीं आ रहा कि हवा का रुख किधर..... किसी ने 8-9 ग्रुपों की एडमिनगीरी छोड़ दी और किसी ने 30-40 पेजों का पीछा करना छोड़ दिया. सनातनिया सवाल है कि मेघों में एकता क्यों नहीं? आज यह उत्तर संतुष्टि देता है कि मेघ वास्तव में अतिसक्रिय (hyper) होते हैं. तो सब ठीक ठाक है. एकता की ऐसी की तैसी !!!

Friday, July 25, 2014

Bhagat Vikas Sabha - भगत विकास सभा

भगत विकास सभा का गठन 09 मार्च 2003 को किया गया था और इसे दिसंबर 2003 में पंजीकृत कराया गयाभगत विकास सभा ने अक्तूबर 2011 में बच्चों के लिए कंप्यूटर लर्निंग केंद्र की स्थापना संत कबीर मंदिरभार्गव कैंपजालंधर में कीइस सभा के अध्यक्ष प्रोकस्तूरी सोत्रा हैंसभा ने 14-08-2011 को ज़रूरतमंद लोगों के लिए एक मैडिकल कैंप का भी आयोजन कियाइसी प्रकार योग शिविर भी इस सभा ने लगाए हैं जिससे लोगों को लाभ हुआ हैफिलहाल यह संस्था एक किराए की जगह में कंप्यूटर सेंटर चला रही हैइस सभा ने लगभग 350 बच्चों को कंप्यूटर में प्रशिक्षित कराया हैइस प्रशिक्षण के लिए नाममात्र फीस ली जाती है जिससे प्रशिक्षक के मानदेयबिजलीकंप्यूटरों और परिसर के रखरखाव पर खर्च किया जाता हैसभा छात्रों को छात्रवृत्तियाँ भी प्रदान करती हैअब तक तीन योग शिविर और तीन मैडिकल कैंप आयोजित किए गए हैंसभा की ये गतिविधियाँ लोक कल्याणकारी हैं और ये अन्य सामाजिक संगठनों के लिए एक दिशा देती हैं.

भगत चूनी लाल, मंत्री, पंजाब सरकार और महिंदर भगत की उपस्थिति में

भगत चूनी लाल, मंत्री, पंजाब सरकार और महिंदर भगत की उपस्थिति में

बच्चों को कंप्यूटर प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र

योग शिविर

चिकित्सा शिविर

योग शिविर

ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में

Friday, May 9, 2014

New tradition of collective marriages in Meghs - मेघों में सामूहिक विवाह की नई परंपरा

हमारा बहुत सा धन अनावश्यक धार्मिक और सामाजिक दिखावे में बर्बाद होता है. राजस्थान के मेघों/मेघवालों ने मृत्युभोज की प्रथा को काफी सीमा तक बंद कर दिया है. अब वे सामूहिक विवाह को एक स्वस्थ परंपरा के रूप में अपना रहे हैं. यह बहुत बढ़िया तरीका है जिससे वर और वधु पक्षों का धन बचता है और उस धन को बच्चों की शिक्षा और प्रशिक्षण पर व्यय किया जा सकता है. ऐसे ही एक समारोह में मुझे अखिल हाड़ौती मेघवाल युवा समिति की ओर से निमंत्रण पत्र मिला था जिसमें कुछ विशेष और ज़रूरी बातें लिखी हैं. उसके स्कैन यहाँ लगा दिए हैं ताकि सामाजिक कार्यकर्ता इसे विस्तार से जान सकें. मुझे किसी ने बताया था कि बटाला, पंजाब में एक मेघ सज्जन श्री अशोक भगत कबीर जयंती के अवसर पर प्रति वर्ष सामूहिक विवाहों को संपन्न कराते हैं. यह स्वागत योग्य है. क्या संभव है कि मेघों में ये सभी शादियाँ कबीरपंथी पंरपरा के अनुसार कराई जाएँ ताकि धन-संसाधनों की और भी बचत हो और मेघ पुरोहितों की परंपरा और भी दृढ़ हो सके.


Monday, April 28, 2014

गोत्र प्रथा

ब्राह्मणवादी कर्मकांडों और पंरपराओं में अपने गोत्र का नाम बोलना ऐसा उपकरण है जो व्यक्ति की जातीय न्यूनता या ग़ुलामियत के स्तर को नाप लेने में सक्षम है. हर ब्राह्मणवादी कर्मकांड में इसे उच्चारना ज़रूरी है ताकि व्यक्ति अपनी जाति का विज्ञापन स्वयं करे. लोग अपनी इस मजबूरी के ख़ुद ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने या आपने इसे ज़बरदस्ती अब तक ओढ़ा हुआ है और उधर साधारण व्यक्ति के दिल में धर्म का इतना डर बैठा दिया गया है कि धर्म भी खुद को प्रेत समझने लगे. व्यक्ति न चाहते हुए भी ऐसी गाय बन जाता है जो केवल आर्यवाद/ब्राह्मणवाद को दूध पिलाती है. यदि कोई उस दूध को तरसता रह जाता है तो वह है आपका अपना वंश, आपका अपना बछड़ा.

Tuesday, April 22, 2014

A suggestion to Meghs - मेघों को एक सुझाव

A SUGGESTION:

Liberation of Meghs from superstition is necessary to achieve scientific morality and ethics in the interest of growth. Actuality and growing civilized human personality rule the Earth. The Meghs may progress in their all-round growth by recognizing the actual situations, the sociology-political circumstances, favourable and un-favourable points in their lives, and caring about the development of education with improvement in their respective skills in the chosen fields. Otherwise, as their own experience amply demonstrates, no amount of 'Bhagati' or chanting of 'Mantras' is going to help them in their progress.

Rattan Gottra

Friday, March 28, 2014

Ravish Kumar (NDTV) shows political picture of Megh/Bhagat/Ravidasia - रवीश कुमार (एनडीटीवी) ने दिखाई मेघ/भगत/रविदासियों की राजनीतिक तस्वीर


NDTV ने जालंधर के भगतों की एक बड़ी साफ राजनीतिक तस्वीर दी है जिसे रवीश कुमार ने दिखाया है. लीजिए. लिंक हाजिर है. देखिए, समझिए और सोचिए.

Tuesday, February 25, 2014

Deprived castes and God - वंचित जातियां और ईश्वर

ताराराम जी ने फेस बुक पर एक पुस्तक से बहुत ही विचारणीय विषय उठाया था जो इस प्रकार था-

".....क्योंकि सिद्धांत के स्तर पर आप कुछ भी कहते हैं वह वैदिक किंवा हिंदू संस्कृति के लिए घृणा या विरोध का कारण नहीं बन सकता है, परंतु ज्यों ही आप व्यवहार की बात करेंगे उनका विरोध विधिरूपा होगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. इसके पीछे हिंदुओं की यह ऐतिहासिक सीख है - आध्यात्मिक विचार की स्वतंत्रता होनी चाहिए परंतु जीवन की क्रियात्मक योजना में स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए. वह तो हिंदू व्यवस्था के अनुरूप ही होना चाहिए. वस्तुतः हिंदुओं का विरोध भारत के अन्य समाजों के आध्यात्मिक विचारों के साथ उतना नहीं है, जितना कि उनके जीवन की क्रियात्मक योजना के साथ है. विचार की स्वतंत्रता किंतु धर्म की कट्टरता इतिहास के आरंभिक काल से उसकी विशेषता रही है जिसे आज भी देखा जा सकता है. यह वैदिक परंपराओं की अन्यान्य विशेषताओं में से एक है. इसी कारण इसने सांख्य, मीमांसा, सिद्ध, नाथ, कबीर आदि कइयों के आध्यात्मिक विचारों को अपने में समाहित कर लिया है एवं अपने व्यापक स्वरूप का बखान किया."

बहुत विचार के बाद मैंने उस पर यह टिप्पणी की-

"वंचित जातियों के लोग हर जगह उपेक्षित महसूस करते हैं. आध्यात्मिक क्षेत्र में भी काफी प्रतियोगिता है. वंचित लोग जानते हैं कि आध्यात्मिक विषयों में काफी लफ़्फाज़ी भरी पड़ी है जिसका मुकाबला वे आसानी से कर सकते हैं और बता सकते हैं कि वे भी इस रहस्यमय क्षेत्र में दखल रखते हैं. इस पर वे बड़े शौक से और बहुत बोलते हैं, बहस करते हैं. लेकिन इसे ग़लतफहमी ही कहा जाएगा.

लफ़्फाज़ी के पीछे जो पैसे का खेल है उसका मुकाबला करने योग्य उन्हें नहीं छोड़ा गया. मैं दावे से कह सकता हूँ कि लोगों को कहा जाए कि यदि उन्हें ईश प्राप्ति हो गई है तो वे भौतिक सुख त्याग दें तो वे ईश को त्यागना बेहतर समझेंगे. ईश अनुभूति से आनंद-शांति तो मिल सकती है लेकिन रोटी-रोज़ी नहीं मिलती. कम से कम एक महापुरुष ने कहा है कि अपनी कमाई के लिए भगवान पर भी भरोसा मत करो."