Wednesday, August 15, 2012

Development is the name of God - उन्नति को ही ईश्वर कहते हैं.


दलित जातियों के लोग भगवान या ईश्वर की अवधारणा पर गूढ़-लंबी चर्चा में रुचि लेते हैं और समय बरबाद करते हैं. ऐसी चर्चा करना ज्ञान पर ज्ञान बघारने जैसा है और अहंकार का मामला बन के रह जाता है. हाथ कुछ नहीं आता. एक रुपया (`.0) भी नहीं.

आख़िर हम भगवान की पूजा क्यों करते हैं? अत्यंत ग़रीब, बीमार और दूसरों द्वारा भयंकर रूप से सताए गए लोग अपने कष्ट से मुक्ति के लिए पूजा-प्रार्थना करते हैं. अन्य लोग स्मृद्धि के लिए भगवान की पूजा करते हैं. यदि कोई ग़रीब स्मृद्धि के लिए पूजा करता है और अपनी ग़रीबी दूर करने के लिए कार्यशील रहता है तो उसे पूजा का लाभ इसी जन्म में मिलना चाहिए. जो लोग अगले जन्म में लाभ की आशा रखते हैं उनके लिए श्रेष्ठतर होगा कि वे जन्म-मरण से पार जाने का तरीका कबीर से सीख लें.

भगवान की सच्चाई सभी विद्वान और आम लोग जानते हैं कि वह बाहर नहीं मिलता. वह अंतर्घट में चेतन तत्त्व के रूप रहता है आदि-आदि. उनमें से जो अधिक समझदार हैं वे अपनी ईश्वर की या धर्म की दूकान खोल कर पैसा बनाते हैं और धनाढ्यों का जीवन जीते हैं. वे राजनीति में दख़लंदाज़ी रखते हैं.

जो युवा ईश्वर और धर्म पर चर्चा में अधिक रुचि लेते हैं उनके लिए बेहतर है कि वे अपनी सांसारिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील हो जाएँ. ईश्वर हर समय उनके अंग-संग है. ईश्वर है और ब्रह्मरूप में है. ब्रह्म का अर्थ ही है बढ़ना और उन्नति करना, इसी जन्म में. उस ईश्वर-ब्रह्म को प्रत्यक्ष रूप में देखना है तो उसे अपने और अपने समुदाय के विकास में देखा जा सकता है. विकास है तो ईश्वर है, विकास नहीं है तो ईश्वर भी नहीं है. इधर-उधर पैसा चढ़ाने और लुटाने की बजाय उन्नति के अपने प्रयासों में विश्वासपूर्वक श्रद्धा बढ़ाएँ और उनमें लगे रहें. यह भी उतना ही लाभकारी है. विश्वासं फलदायकं अर्थात विश्वास ही स्मृद्धि का फल देता है.

क्या आपको यह संस्कार मिला है कि मंदिरों में पैसा चढ़ाने से ही भगवान प्रसन्न होते हैं? तनिक सोचें. यदि आप अपने किसी ज़रूरतमंद संबंधी की मदद करते हैं तो वह मंदिर में चढ़ावे से अच्छा है. इस मदद को सद् ब्राह्मणों ने विष्णु की पूजा कहा है. यदि आप के पास खुला पैसा है तो आप अपने समुदाय के ऐसे संगठनों को भी पैसा दे सकते हैं जो समुदाय के विकास के लिए कार्यरत हैं. इसे ही सद् ब्राह्मणों ने महालक्ष्मी और महाविष्णु की पूजा कहा है. सामर्थ्य के अनुसार यह पूजा अवश्य करनी चाहिए.

ईश्वर और ईश्वर पूजा के अर्थ की इससे सरल व्याख्या मैं नहीं कर सकता और जो सज्जन इस आलेख को समझ लेंगे उनकी उन्नति निश्चित है.

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असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
                                
                             हरिवंशराय बच्चन 
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1 comment:

  1. सभी लोगों के लिए सलाह तो आपने सही दी है लेकिन भटके लोग माने तभी न बात बने।

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