Friday, August 31, 2012

DICCI - नौकरियाँ माँगने वाले नहीं, नौकरियाँ देने वाले बने


आपने FICCI (Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry) के बारे में पढ़ा और जाना होगा. यह भारत के उद्योगपतियों का एक मंच है जो परस्पर सहयोग की बुनियाद को मज़बूत बनाता है.

संभव है आप जानते हों, अन्यथा आज जान जाएँगे कि भारत के दलित उद्योगपतियों ने ऐसे ही एक मज़बूत मंच का गठन सन् 2005 में किया था जिसे DICCI (Dalit Indian Chamber of Commerce and Industry)  के नाम से जाना जाता है. इसका मिशन है- नौकरियाँ माँगने वाले नहीं, नौकरियाँ देने वाले बने (Be job givers, instead of job seekers)’. यह मंच अब काफी प्रगति कर चुका है और इसका अस्तित्व अब बंगलूरु, हैदराबाद और जयपुर में भी है.

नीचे दिए फोटो पर क्लिक करके आप DICCI के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.

Wednesday, August 29, 2012

Tulsidas knew the art of loving his people - तुलसीदास अपने समुदाय से प्रेम करना जानते थे




(1)


कक्षाओं में तुलसीदास

कक्षाओं को पढ़ाते हुए डॉ. गोविंदनाथ राजगुरु कहा करते थे कि तुलसीदास कवि बहुत अच्छे हैं लेकिन थिंकर (चिंतक) के तौर पर बेकार हैं. थिंकर के तौर पर कबीर बेमिसाल हैं.

डॉ. वीरेंद्र मेंहदीरत्ता कहा करते थे कि तुलसी की हर बात को माफ़ किया जा सकता है लेकिन इस बात को नहीं- 'जाके प्रिय न राम वैदेही, सो छाँडिए कोटि बैरी सम जदपि परम सनेही'. सही है. स्नेही पर धर्म-आस्था का कोड़ा बरसाना अच्छी बात नहीं. तुलसी ने ही कहीं लिखा है- 'देखत ही हरषे नहीं, नैनन नाहिं स्नेह, तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह'. तो तुलसी का त्यागा हुआ परम स्नेही व्यक्ति जिसकी अपनी आस्था पर राम-वैदेही की छवि उकेरी हुई नहीं है, तुलसी के घर क्यों आएगा? यह बात और है कि राम-वैदेही के मंदिरों ने तुलसी के समाज को अच्छी आजीविका दी है.

डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा कहा करते थे, "तुलसीदास का यह कथन- 'ढोर, गँवार, शूद्र, पशु, नारी, ते सब ताड़न के अधिकारी'- यह वास्तव में रामचरित मानस में समुद्र के मुँह से कहलवाया गया है जो राम के मार्ग में बाधक था और उस समय विलेन था. जरूरी नहीं कि विलेन का कथ्य तुलसी का भी कथ्य हो." चलिए, आपकी बात भी मानते चलते हैं पंडित जी.

डॉ. पुरुषोत्तम शर्मा इसे कौमा-डैश का हेर-फेर मानते हुए कहते थे कि तुलसीदास का इससे तात्पर्य था- 'ढोर, गँवार-शूद्र, पशु-नारी, ते सब ताड़न के अधिकारी'. यानि अगर शूद्र गँवार हो या नारी पशु जैसी हो तो वे ताड़ना के अधिकारी हैं. बहुत खूब. इसके निहित संदर्भों की व्याख्या रुचिकर होगी क्योंकि तब शूद्र और नारी के लिए शिक्षा की मनाही थी. अतः उन्हें 'गँवार' और 'पशु' की श्रेणी में रखने का रिवाज़ रहा होगा.

कुछ बात तो है कि ब्राह्मण समाज तुलसीदास को सिर पर उठाए फिरता है और दूसरों को भी ऐसा करने की सलाह देता है. लेकिन यह तय है कि समय के साथ तुलसी साहित्य की व्याख्याएँ बदलती रहीं. संभव है कि तुलसी के साहित्य में हेर-फेर भी किया गया हो.

(2)

कक्षाओं से बाहर तुलसीदास

तुलसी के साहित्य से ऐसे कई उद्धरण हैं जिन्हें आज विभिन्न लेखक अलग दृष्टि से पहचानते हैं. एक सज्जन ने जातिवादी दृष्टि से तुलसी की इन पंक्तियों- 'पूजिए विप्र जदपि गुन हीना'- की व्याख्या की और तुलसी पर जम कर बरसे और फिर इस पर ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति का ठप्पा लगा दिया. चलिए जी, ठीक है जी......

लेकिन मैं तुलसी के उक्त कथन को बहुत महत्व देता हूँ.

'पूजिए विप्र जदपि गुन हीना' (अर्थात् ब्राह्मण यदि गुणहीन भी है तो भी पूजनीय है). स्पष्ट है कि यहाँ विद्वान, ज्ञानी, दूसरों का भला करने वाले व्यक्ति की बात नहीं हो रही बल्कि ब्राह्मण समुदाय के किसी व्यक्ति की बात है जो सिर्फ़ अनाज का दुश्मन है.

अब मैं सोचता हूँ कि तुलसीदास ने क्या लिखा. वे ब्राह्मण थे और वे अपने समुदाय के गुणहीन व्यक्ति को भी पूजनीय कह रहे हैं तो इसमें उनकी उदार दृष्टि और प्रेम भावना झलकती है. इसमें ग़लत क्या है? वे अपने समुदाय की छवि को ऊँचा उठाते रहे और उनका समुदाय आज उन्हें उठाए-उठाए फिरता है.

अपने समुदाय के सदस्यों के कार्य, कला, ज्ञान और उत्पाद (product) की जानकारी लें और परस्पर चर्चा करें. फिर जहाँ भी अवसर आए उसकी यथोचित प्रशंसा करें. यह सब को अच्छा लगेगा. इस प्रकार एक-दूसरे का आवश्यक सामाजिक-आर्थिक सहयोग अपने आप होता रहता है.

संत तुलसीदास सामुदायिक उन्नति के इस सरलतम मार्ग को जानते थे. उनकी सभी बातें आप माने या न माने, केवल अपने समुदाय के प्रति आदर और प्रेम-भावना को घना करके हृदय तक उतार लें तो समुदाय के विकास का रास्ता अधिक प्रशस्त होगा. आपकी उन्नति और सफलता निश्चित है.

Wednesday, August 22, 2012

Towards greater unity – कारवाँ बनने लगा है


ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका मेघ चेतना का निरंतर प्रकाशन एक प्रशंसनीय कार्य है. इस प्रकार की सामुदायिक पत्रिकाओं से व्यावसायिक पत्रिकाओं जैसी आकर्षक और अदोष सामग्री की आशा नहीं की जाती लेकिन इस बात की अपेक्षा की जा सकती है वे समुदाय की गतिविधियों का निर्दोष आईना अवश्य बने.

कल ही इस पत्रिका के प्रधान संपादक श्री निर्मल चंदर भगत से इसका मई-जुलाई 2012 का अंक मिला. इस अंक में प्रकाशित संपादकीय इस पत्रिका की लंबी यात्रा का एक मील का पत्थर है.

देश भर में मेघ ऋषि को मानने वाली संतानें करोड़ों हैं लेकिन भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से वे सदियों से एक दूसरे को पहचानने में भूल करती आई हैं. कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा और व्यवसाय के नाम पर वे बँटी हुई दिखती हैं. शिक्षा और नई जानकारियाँ प्राप्त होने के बाद अब उनकी नज़दीकियाँ और मेल-मिलाप बढ़ा है.
संपादकीय - इस चित्र पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.
उक्त संपादकीय को मैं इसलिए महत्वपूर्ण मानता हूँ कि इस पत्रिका को पढ़ने वाले पंजाब के मेघ भगत अभी भी इस तथ्य को पचाने में कठिनाई महसूस करेंगे कि जम्मू-कश्मीर के मेघ, राजस्थान के मेघवाल, मेघबंसी, बलाई, बुनकर, मेहरा आदि और गुजरात के मेघवार मूलरूप से एक ही वंश के हैं जो मेघ ऋषि को अपना मूल मानते हैं. इनकी कई शाखाएँ भारत के अनेक भागों में बसी हैं और एक-दूसरे से अनजान हैं. इसी पत्रिका में संपादक के नाम डॉ. हरबंस लाल लीलड़ का एक पत्र छपा है जिसमें विभिन्न मेघवंशी समुदायों की एक महत्वपूर्ण बैठक का उल्लेख है जिसके बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं. सामाजिक संगठनों की इस प्रकार की पहल कदमियों के अलावा राजनीतिक कोशिशें भी महत्वपूर्ण होती हैं. उसे ध्यान में रखते हुए कुछ मौकों पर श्री महेंद्र भगत जी (भगत चूनी लाल जी के सुपुत्र) से इस विषय पर चर्चा हुई है कि वे राजस्थान के मेघवाल सांसदों और विधान सभा सदस्यों से मिल कर राजनीतिक मंच साझा करने के लिए कदम उठाएँ और रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स को इस प्रक्रिया में शामिल करें. आशा है इसका कोई नतीजा शीघ्र निकलेगा.

प्रत्येक बड़े कार्य की एक छोटी शुरुआत आवश्यक होती है. वह शुरुआत हो चुकी हुई है. आशा है इस संपादकीय पर प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ आएँगी. उन्हें जानकारी के साथ खारिज करना होगा. मैं इस संपादकीय को एक बड़े कार्य की दिशा में सार्थक प्रयास की तरह देखता हूँ. 


इस ब्लॉग से अन्य लिंक

Political notes of 80 years old Virumal

Meghvanshis have only one direction to move i.e. unity

मेघवंश: एक सिंहावलोकन

जम्मू में कबीर प्रकाशोत्सव

हम कौन हैं, कहाँ से आए थे....

 


Monday, August 20, 2012

Dalit Media - दलित मीडिया - Meghvansh Navyug मेघवंश नवयुग


1. फेस बुक के माध्यम से श्री कामता प्रसाद मौर्य ने सम्यक् भारत पत्रिका के बारे में जानकारी दी है. इसका एक अंक श्री प्रभु दयाल (सुश्री मायावती के पिता) के हाथों में है जिसे देख कर सुखद आश्चर्य हुआ. दलित मीडिया विकसित हो रहा है.
कामता प्रसाद मौर्य जी का बलॉग बन चुका है आशा है इस पर हमें जानकारी पूर्ण आलेख मिला करेंगे.


3. फेस बुक से श्री गुणेश राठौड़ ने जानकारी दी है कि बाड़मेर से एक पत्रिका 'मेघवंश नवयुग' नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ है जिसका पहला अंक फरवरी 2012 में आया है. इसके मुख्य संपादक डॉ. नारायण मेघवाल हैं और इसका प्रकाशन जनहितकारी सीमांत संस्था, बाड़मेर (राजस्थान) कर रही है.
अधिक जानकारी मिलने पर उसे यहाँ देना चाहूँगा.

Saturday, August 18, 2012

Reservation in services - नौकरियों में आरक्षण

मेरे MEGHnet ब्लॉग पर नौकरियों में आरक्षण को लेकर काफी चर्चा हुई है जिसे आप नीचे दिए चित्र पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.


Wednesday, August 15, 2012

Development is the name of God - उन्नति को ही ईश्वर कहते हैं.


दलित जातियों के लोग भगवान या ईश्वर की अवधारणा पर गूढ़-लंबी चर्चा में रुचि लेते हैं और समय बरबाद करते हैं. ऐसी चर्चा करना ज्ञान पर ज्ञान बघारने जैसा है और अहंकार का मामला बन के रह जाता है. हाथ कुछ नहीं आता. एक रुपया (`.0) भी नहीं.

आख़िर हम भगवान की पूजा क्यों करते हैं? अत्यंत ग़रीब, बीमार और दूसरों द्वारा भयंकर रूप से सताए गए लोग अपने कष्ट से मुक्ति के लिए पूजा-प्रार्थना करते हैं. अन्य लोग स्मृद्धि के लिए भगवान की पूजा करते हैं. यदि कोई ग़रीब स्मृद्धि के लिए पूजा करता है और अपनी ग़रीबी दूर करने के लिए कार्यशील रहता है तो उसे पूजा का लाभ इसी जन्म में मिलना चाहिए. जो लोग अगले जन्म में लाभ की आशा रखते हैं उनके लिए श्रेष्ठतर होगा कि वे जन्म-मरण से पार जाने का तरीका कबीर से सीख लें.

भगवान की सच्चाई सभी विद्वान और आम लोग जानते हैं कि वह बाहर नहीं मिलता. वह अंतर्घट में चेतन तत्त्व के रूप रहता है आदि-आदि. उनमें से जो अधिक समझदार हैं वे अपनी ईश्वर की या धर्म की दूकान खोल कर पैसा बनाते हैं और धनाढ्यों का जीवन जीते हैं. वे राजनीति में दख़लंदाज़ी रखते हैं.

जो युवा ईश्वर और धर्म पर चर्चा में अधिक रुचि लेते हैं उनके लिए बेहतर है कि वे अपनी सांसारिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील हो जाएँ. ईश्वर हर समय उनके अंग-संग है. ईश्वर है और ब्रह्मरूप में है. ब्रह्म का अर्थ ही है बढ़ना और उन्नति करना, इसी जन्म में. उस ईश्वर-ब्रह्म को प्रत्यक्ष रूप में देखना है तो उसे अपने और अपने समुदाय के विकास में देखा जा सकता है. विकास है तो ईश्वर है, विकास नहीं है तो ईश्वर भी नहीं है. इधर-उधर पैसा चढ़ाने और लुटाने की बजाय उन्नति के अपने प्रयासों में विश्वासपूर्वक श्रद्धा बढ़ाएँ और उनमें लगे रहें. यह भी उतना ही लाभकारी है. विश्वासं फलदायकं अर्थात विश्वास ही स्मृद्धि का फल देता है.

क्या आपको यह संस्कार मिला है कि मंदिरों में पैसा चढ़ाने से ही भगवान प्रसन्न होते हैं? तनिक सोचें. यदि आप अपने किसी ज़रूरतमंद संबंधी की मदद करते हैं तो वह मंदिर में चढ़ावे से अच्छा है. इस मदद को सद् ब्राह्मणों ने विष्णु की पूजा कहा है. यदि आप के पास खुला पैसा है तो आप अपने समुदाय के ऐसे संगठनों को भी पैसा दे सकते हैं जो समुदाय के विकास के लिए कार्यरत हैं. इसे ही सद् ब्राह्मणों ने महालक्ष्मी और महाविष्णु की पूजा कहा है. सामर्थ्य के अनुसार यह पूजा अवश्य करनी चाहिए.

ईश्वर और ईश्वर पूजा के अर्थ की इससे सरल व्याख्या मैं नहीं कर सकता और जो सज्जन इस आलेख को समझ लेंगे उनकी उन्नति निश्चित है.

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असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
                                
                             हरिवंशराय बच्चन 
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Sunday, August 5, 2012

All India Satguru Kabir Sabha – आल इंडिया सत्गुरु कबीर सभा - (1958)

कल 03-08-2012 को आर्य समाज मंदिर, सैक्टर-16, चंडीगढ़ में श्रीमती तारा देवी की रस्म क्रिया के बाद भगत प्रेम चंद जी ने एक स्मारिका (Souvenir/सुवेनेयर - 2012-13) मुझे दी. 

आल इंडिया सत्गुरु कबीर सभा (1958), मेन बाज़ार, भार्गव नगर, जालंधर का नाम सुना था लेकिन मेरी जानकारी में नहीं था कि सभा (AISKS) ने इस वर्ष ऐसी स्मारिका का प्रकाशन किया है. इस स्मारिका को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ.

सुखद आश्चर्य इस लिए कि ये स्मारिकाएँ संस्था द्वारा संपन्न कार्यों का प्रकाशित दस्तावेज़ होता है. इसमें कार्यों की भूमिका, उनके महत्व, संबंधित विषयों पर आलेख, कार्यकर्ताओं और संगठन की गतिविधियों के बारे में जानकारी आदि होते हैं जो धीरे-धीरे एक इतिहास का निर्माण करते हैं. इस स्मारिका में यह सब कुछ दिखा.

यह स्मारिका सत्गुरु कबीर के 614वें प्रकाशोत्सव (04-06-2012) के अवसर पर जारी की गई थी. इसका संपादन श्री विनोद बॉबी (Vinod Bobby) ने किया है और उप संपादक श्री गुलशन आज़ाद (Gulshan Azad) हैं.

इस स्मारिका में काफी जानकारियाँ हैं. लेकिन जो मुझे अपने नज़रिए से महत्वपूर्ण लगीं उनका उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ. इसका संपादकीय जालंधर में कबीर मंदिरों (Kabir Temples) के विकास की संक्षिप्त कथा कहता है और इसमें शामिल आलेख कबीर से संबंधित जानकारी देते है. राजिन्द्र भगत द्वारा श्री अमरनाथ (आरे वाले) पर लिखा आलेख सिद्ध करता है कि अपने समाज के अग्रणियों पर अच्छा लिख कर हम आने वाली संतानों के लिए आदर्श जीवनियों का साहित्य निर्माण कर सकते हैं. यह अच्छी भाषा में लिखा आलेख है. 'अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति पीठ - कबीर भवन' पर लिखा आलेख प्रभावित करता है.

स्मारिका में प्रकाशित विज्ञापन बताते हैं कि मेघ भगतों ने इसके प्रकाशन में खूब सहयोग दिया है. बहुत-बहुत बधाई, क्योंकि यह करने योग्य कार्य है.

इस सभा के संस्थापकों में आर्यसमाज के अनुयायी मेघ भी कबीर सभा की इस स्मारिका में दिखे जो मेघ समाज में हो रहे परिवर्तन का द्योतक है. आर्यसमाजी विचारधारा के कारण मेघ भगत समाज ने कबीर और डॉ. भीमराव अंबेडकर को बहुत देर से अपनाया. यह देख कर अच्छा लगा कि इस स्मारिका में विवादास्पद लेखक श्री एल. आर. बाली (L.R. Bali) ('भीम पत्रिका' के संपादक) का आलेख भी छापा गया है जिन्होंने अपना पूरा जीवन अंबेडकर मिशन को समर्पित कर दिया है. मुझे आशा है कि मेघ भगत देर-सबेर डॉ. अंबेडकर, जो स्वयं कबीरपंथी थे, को जाने-समझेंगे.

स्मारिका में सभा के कार्यकर्ताओं का टीम अन्ना के साथ दिखना राजनीतिक संकेत करता है और यह अच्छा है.

आशा है कि मेघ भगतों के अन्य संगठन भी ऐसी स्मारिकाएँ छापने के बारे में विचार करेंगे. 

 स्मारिका की पूरी पीडीएफ फाइल आप नीचे दिए इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं

Souvenir (p. 1-32)

Souvenir (p. 33-64)



मेघ भगत