Thursday, July 26, 2012

Megh Bhagats of J&K struggle for survival

(1)

Megh Bhagat - मेघ भगत

Their habitats उनके घर

Their capital उनकी पूँजी


Their way to development उनका विकास मार्ग

Their roofs उनकी छतें

They compete with heavy weight cloth industry
भारी कपड़ा उद्योग के साथ प्रतियोगिता


Below you can see a community Hall being constructed for them. Hiranagar B D O block is constructing this community Hall at village Ladyal Hiranagar, S C Mohalla for the past about 12 years.


A house of Bhagats in the heart of Samba city




(2)

Their displacement due to terrorism

घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए सरकार ने सरकारी भवनों के दरवाज़े खोल दिए थे लेकिन आतंकवाद के कारण कई क्षेत्रों से विस्थापित मेघों की ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं. इनकी कहानी एक गुमनामी की कहानी है. गरीबी में रह रहे इस समुदाय के लोग कारे बेगार कानून की पीड़ा भुगत चुके हैं और कश्मीरियों और जम्मू के डोगरों की संपन्नता के पीछे इनका खून-पसीना साफ़ चमकता है. 

There are many more Megh Bhagats from Kishatwar now living in Kathua District who had to leave their homes and land. Now they have no land to cultivate, no permanent work or employment. They have settled in village Bhalua Budhi, Barnoti, Nagri and near Sakta Chack. There are about 30 families. Just look at their conditions.




(Contributed by Sh. Tara Chand Bhagat of Udhampur via Face Book)

Wednesday, July 18, 2012

Write dear brothers - बंधुओ! लिखो.....


मुझे याद है कि स्कूल के दिनों में मैंने नेहरू पर चार पृष्ठों का निबंध लिखा था. उसके बाद गाँधी पर भी लंबा निबंध लिखा.

चार वर्ष पूर्व जब मैंने अपने पिता पर लिखने के लिए कलम उठाई तो समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखा जाए. ऐसा नहीं था कि उन्होंने जीवन में ऐसा कार्य न किया हो जिस पर एक पृष्ठ तक न लिखा जा सके. लेकिन यह मानसिकता की बात थी. जब उनके जीवन पर एकाग्रता से दृष्टि डाली और उनके किए कार्य को स्मरण किया तो बहुत-सी घटनाएँ और बातें एक चित्र का रूप ग्रहण करने लगीं. उसके बाद मैं उनके बारे में काफी सामग्री नेट पर दे पाया.

कुछ वर्ष पहले ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ के एक कार्यक्रम में मुझे बोलने का अवसर मिला तो मैंने वहाँ उपस्थित प्रबुद्ध मेघ समाज के सदस्यों को मेघों के गुम इतिहास का संकेत करते हुए अनुरोध किया था कि आप अपने परिवार और समाज के बारे में लिखने की आदत डालें क्योंकि एक-एक पैरा से पुस्तकें बनती हैं और फिर उन्हीं पुस्तकों से इतिहास बनता है. आप चार पुस्तकें लिखते हैं तो इतिहास में चार पंक्तियाँ जुड़ जाएँगी.

इस लिए लिखो, लिखो लिखो.......


Monday, July 16, 2012

Bhagat Buddamal - भगत बुड्डामल


Bhagat Budda Mal Ji
सन् 1947 में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए और जालंधर में बसे मेघ भगत समाज में लगभग सभी लोग एक नाम से भली-भाँति परिचित हैं- भगत बुड्डामल. भार्गव कैंप, जालंधर में उनके नाम से एक ग्राऊँड बना है जिसे भगत बुड्डामल ग्राऊँड कहते हैं.

विडंबना है कि आज मेघ भगत समाज में बहुत कम लोग इस सामाजिक कार्यकर्ता के बारे में विस्तार से जानते हैं जिसने अपने समुदाय के लिए जीवन भर अथक परिश्रम किया ताकि यह समुदाय भविष्य में भली प्रकार से ससम्मान जीवन व्यतीत कर सके.
उनका जन्म और पालन-पोषण स्यालकोट, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था. वे मेघ जाति के एक सामान्य परिवार में जन्मे थे. बहुत शिक्षित नहीं थे. लेकिन छोटी आयु में ही वे समाज सेवा के कार्य में प्रवृत्त हो गए थे. भारत में आने के बाद तो वे आजीवन समाज सेवा में रहे. मैंने स्वयं उन्हें अमृतसर, जालंधर और चंड़ीगढ़ में समाज सेवा में सक्रिय देखा है.
  
उनकी दिनचर्या ही थी कि वे सहायता माँगने आए किसी भी आगंतुक के साथ हो लेते और उसकी भरपूर मदद करते. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे अन्य मेघ भगतों की भाँति भार्गव कैंप, जालंधर में बस गए. यहाँ रहते हुए उन्होंने भगत गोपीचंद के साथ मिल कर बहुत कार्य अपने समाज के लिए किया. वे कई बार जालंधर म्युनिसिपल कार्पोरेशन के सदस्य चुने गए. वे अकेले या अपने साथी सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में आते रहे और यहाँ भगत मिल्खीराम (पीसीएस), श्री केसरनाथ जी, सत्यव्रत शास्त्री जी आदि के साथ मिल कर उन्होंने बहुत से लोगों के नौकरियों आदि से संबंधित कार्य कराए जिससे समुदाय के लोगों को लाभ पहुँचा.
इनकी धर्मपत्नी का नाम भगवंती था. इनके अपनी कोई संतान नहीं थी अतः अपने भाई की संतान को गोद लेकर पाला. दमकता हुआ गोरा चेहरा. लंबा कुर्ता, तुर्रे वाली अफ़ग़ानी पगड़ी और पठानी सलवार पहनने वाले बुड्डामल जी का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक और प्रभावपूर्ण था. वे धीरे-धीरे प्रेमपूर्वक और ठहरी हुई बात करते थे.

उनके कार्य और समाज सेवा के मद्देनज़र सरकार ने उनकी स्मृति में भार्गव कैंप में श्री बुड्डामल पार्क बना दिया और उनके कार्य के महत्व को मान्यता दी.
पार्क बनने के साथ उनका नाम अमर तो हो गया लेकिन उनके बारे में अभी बहुत-सी जानकारियाँ जुटाई जानी बाकी हैं. अभी हाल ही में भगत चूनी लाल भगत के नागरिक अभिनंदन समारोह में श्री बुड्डामल जी को याद किया गया था.

अब बेहतर हो कि हमारे सामाजिक संगठन अपने पूर्ववर्ती सामाजिक कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी जुटाएँ और समय-समय पर उनके संबंध में उपलब्ध सामग्री को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का उपक्रम करें आखिर वे हमारे लिए कल्याणकारी सोच रखने वाले प्रेरणा स्रोत हैं.
मेरे विचार से भगत बुड्डामल पार्क में उनकी मूर्ति लगाई जानी चाहिए ताकि आने वाले समय में हम सभी उनके कार्य से प्रेरणा ले सकें. यहाँ के वाटर टैंक पर 'बुड्डामल पार्क' लिखा जा सकता है ताकि पार्क का नाम दूर से पढ़ा जा सके.



विशेष टिप्पणी :-

 
कुछ समय पूर्व भगत बुड्डामल ग्राऊँड में शनि सहित कई देवी-देवताओं का मंदिर बना दिया गया है. यह सोचने की बात है कि किसी मेघ भगत के नाम से पंजाब में इस प्रकार की यह एकमात्र ग्राऊंड है. माना कि यह सरकारी जगह है लेकिन इसका उपयोग पार्क की तरह ही होना चाहिए. बेहतर होगा कि शनि मंदिर को कहीं और शिफ्ट किया जाए.
सोचने की बात है कि आपको 'आर्य समाज स्कूल' सुनने में अच्छा लगता है कि 'मेघ हाई स्कूल'. ऐसे ही सोच लें कि 'भगत बुड़्डामल ग्राऊँड' सुनने में अच्छा लगता है या 'शनि मंदिर ग्राऊँड'. यदि मेघ भगत समुदाय या उसके किसी सदस्य के नाम पर कोई स्थल या शिक्षण संस्थान बने तो उससे समुदाय की छवि बेहतर बनती है. विचार करें.



'मेघ चेतना' का एक पुराना पृष्ठ

विशेष आभार
भगत बुड्डामल जी के फोटो और उनकी पेंटिंग की फोटो देने के लिए भगत बुड्डामल जी के परिवार का तथा पार्क के चित्र भेजने के लिए युवा ब्लॉगर श्री मोहित भगत का बहुत आभार. उनकी सहायता के बिना यह कार्य संभव नहीं था.