Tuesday, May 15, 2012

Scavenging human excreta - मैला ढोने वाले


स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्ष बाद भी दलितों का एक ऐसा हिस्सा है जो सिर पर मनुष्यों का मैला उठाने के लिए बाध्य है. मुख्यतः गाँवों में रहने वाले इस हेला समुदाय, वाल्मीकि समुदाय आदि के कई सदस्यों को अभी तक ऐसा अवसर नहीं मिला है कि इस कार्य से मुक्त हो सकें. सच यह है कि गाँवों में चलने वाली अमानवीय परंपराओं के शिकार इन लोगों की स्वतंत्रता केवल नाम की है. ये लोग अपना व्यवसाय बदलने का प्रयास करते हैं तो इन पर इतना सामाजिक और आर्थिक ज़ुल्म ढाया जाता है कि इन्हें अपने बच्चों को जीवित रखने के लिए सिर पर मैला ढोने के कार्य की ओर लौटना पड़ता है. मध्यप्रदेश में हुए एक अध्ययन ने भारत सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें कहा गया था कि सिर पर मैला ढोने की प्रथा का भारत में अंत कर दिया है. 

अध्ययन रिपोर्ट इस लिंक पर देखी जा सकती है :-