Tuesday, May 22, 2012

Do we have advocates - क्या हमारे पास एडवोकेट हैं

Too many advocates in parliament

किसी ने पूछा कि देश को कौन चलाता है तो विद्वान आदमी ने उत्तर दिया, “देश को एडवोकेट चलाते हैं.”

महात्मा गाँधी एडवोकेट थे. वे अंग्रेज़ों के कानून और परंपराओं को जानते थे इसलिए उनसे भिड़ जाते थे. फिर जवाहरलाल नेहरू आए. वे भी एडवोकेट थे. उनके पिता नामी-गिरामी एडवोकेट थे. आज संसद पर नज़र डालें तो पाएँगे कि पक्ष-विपक्ष में एडवोकेटों की यह जमात छाई हुई है. ये सरकार के फैसलों को प्रभावित करते हैं. चूँकि ये संसद में बैठे हैं अतः बाहर की दुनिया को भी अच्छे-बुरे तरीके से प्रभावित करने की स्थिति में हैं.


भारत में एडवोकेट सत्ता पर क़ाबिज़ हैं. वर्तमान में राज्य सभा और लोकसभा में कई सांसद हैं जो प्रखर एडवोकेट हैं. बहुत से मंत्री एडवोकेट हैं. कई सांसद बनने के बाद धनी हुए. क्या यह केवल संयोग की बात है या इसके पीछे कोई तत्त्व है. मैं मानता हूँ कि इसके पीछे एडवोकेट होने का तत्त्व महत्व रखता है.

मैंने नेट पर एक पुस्तक में पढ़ा था कि मेघों की विशेषता थी कि ये अदालतों में नहीं जाते थे. पता नहीं यह विशेषता थी या उनकी ग़रीबी से पैदा मजबूरी थी. लेकिन आर्यसमाज के समर्थन से शिक्षा प्राप्त मेघों के दो बालक जो अपने समुदाय में पहले शिक्षित और स्नातक हुए वे दोनों एडवोकेट बने. श्री जगदीश मित्र और श्री हंसराज. जगदीश मित्र का जीवन छोटा रहा (*). श्री हंसराज डॉ. अंबेडकर से प्रभावित थे और उन्होंने उनके साथ मिल कर कार्य भी किया था. श्री हंसराज राजनीति में आए और दिल्ली में रह कर प्रेक्टिस की.

वैसे तो शेक्सपियर ने लिखा है- "पहला काम हम यह करें कि हम सभी वकीलों को मार दें." (ताकि राजा के आदेशों को चुनौती देने वाला कोई न रहे). यह नकारात्मक स्थिति में कहा गया है. सच यह है कि ये बेहतर राजनीतिज्ञ होते हैं. एडवोकेटों की मेघ समुदाय को भी आवश्यकता है और देश को भी. क्या हमारे पास ऐसे एडवोकेट हैं जो राजनीति में बड़े पैमाने पर आ सकें?
Too many advocates in Parliament - Economic Times 



(*) सुना है कि श्री जगदीश मित्र ने संन्यास ले लिया था और हरिद्वार चले गए थे. वहाँ उनका काफी सम्मान था और उनके लिए हाथी की सवारी उपलब्ध कराई गई थी. यह बात एक वृद्ध महिला ने बताई है.




Sunday, May 20, 2012

The myth of Arya - आर्य शब्द की भ्रांतियाँ


आर्य का अर्थ साहित्यिक और शब्दकोशीय भ्रांतियाँ
 
कर्नल तिलक राज जी से कई बार फोन पर लंबी बातचीत होती है. पिछले दिनों ऐसी ही एक बातचीत के दौरान उन्होंने पूछ, भाई, यह बताओ कि आर्य शब्द का अर्थ क्या होता है” ? कर्नल साहब बहुत विद्वान व्यक्ति हैं. मैं तनिक होशियार हो कर बैठ गया. मैंने कहा, आर्य का अर्थ है जो बाहर से आकर आक्रमण करे.कर्नल साहब की आवाज़ की उमंग छिपी नहीं रह सकी. वे तुरत बोले, बिल्कुल सही. यह शब्द अरि’ (शत्रु) से बना है.फिर उन्होंने धातु के अनुसार इस शब्द की व्युत्पत्ति बताई. उन्होंने आर्यसमाज के संस्थापक और संस्कृत के विद्वान दयानंद नामक ब्राह्मण द्वारा प्रचारित अर्थ का उल्लेख किया और फिर कहा कि वह 'आर्य' शब्द का अर्थ श्रेष्ठबताता है.

शब्दकोशों में जिस तरह से चमार शब्द के साथ घृणा जोड़ी गई ठीक वैसे ही आर्य शब्द को महिमामंडित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई. इस पर मैंने अपने नोट्स नीचे दिए लिंक पर रखे हैं. यहीं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इस आलेख में किसी बात के होते हुए भी यह तथ्य है कि किसी भी कारण से क्यों न हो, मेघ भगतों की शिक्षा का पहला प्रबंध आर्यसमाज ने ही किया था और मेघों को 'आर्य मेघ' और 'आर्य भगत' कहा. 

अब दलितों के नाम के साथ 'आर्य' लगाने का फार्मूला एक ही तरफ जाता दिखता है और लक्ष्य है यह सिद्ध करना कि ब्राहमण आर्य और दलित आर्य एक ही सभ्यता (सिंधुघाटी) की पैदाइश हैं. पिछले लगभग सवा सौ वर्षों से ब्राहमण आर्यजन सारा ज़ोर इसी पर लगाते दिख रहे हैं जबकि ऐतिहासिक जानकारियाँ इससे मेल नहीं खातीं. वैसे भी ये समय-समय पर स्थिति देख कर साहित्य के साथ छेड़-छाड़ करते रहे हैं और बिना मतलब के ऐसा नहीं किया जाता. लेकिन अब समय बदल गया है. सत्य को स्वीकारना बेहतर है.  






Tuesday, May 15, 2012

Now we exist in songs - अब गीतों में हम हैं.


कई वर्ष पहले मैंने मेघ शब्द इंटरनेट पर ढूँढा. मंशा थी कि बिरादरी के बारे में शायद कुछ जानकारी मिले. मगर कुछ नहीं मिला. मेघ सरनेम वाले एक अमरीकन की वेबसाइट मिली. वह उद्योगपति था. लेकिन वह काफी गोरा था. हो सकता है वह हमारा ही बंदा आदमी हो :))  एक इटेलियन एक्ट्रेस मिली जिसके नाम के साथ मेघ(नेट) लगा था. शायद वह हमारी ही बंदी हो. भगत ढूँढा तो कबीर और अन्य संतों के अलावा जालंधर के एक सज्जन श्री राजकुमार का एक ब्लॉग मिला जिसका नाम था भगत शादी डॉट कॉम’. उनसे बात हुई और फिर.....आज आप ढूँढ कर देखिए दोनों शब्द, 'मेघ-भगत' बहुतायत से आपको इंटरनेट पर मिल जाएँगे.

कुछ वर्ष पहले तक इस बात की भी तकलीफ़ होती थी कि हम साहित्य में कहीं नहीं थे. एक दिन खोज करते हुए अचानक एक कहानी मिली ज़ख़्मों के रास्ते से जिसे एक कथाकार देसराज काली ने लिखा था. इसमें मेघ भगत और भार्गव कैंप का स्पष्ट उल्लेख था. रूह को बहुत आराम आया कि चलो भई हम साहित्य में कहीं तो मिले.

इस बीच वियेना में हुई चमार समुदाय के गुरु की हत्या और जालंधर के पास गाँव तलहण की घटनाओं ने चमार समुदाय के स्वाभिमान को जगा दिया और वे कई सुंदर गीतों के साथ संगीत की धमक लेकर आ गए. 'रविदासिया धर्म' की स्थापना हो गई और ये गर्वीले सड़कों पर उतर कर कहने लगे – गर्व से कहो हम चमार हैं. इस बात से दिल पूछने लगा कि भई हम मेघ भगत गीत-संगीत की धमक में कहाँ हैं.

तभी एक गीत सुनाई दिया- मेघो कर लो एका, भगतो कर लो एका. मज़ा आ गया. इसे रमेश कासिम ने गाया था.......और अभी हाल ही में एक गीत सुनने को मिला- असीं भगताँ दे मुंडे, साडी वखरी ए टौर (हम भगतों के बेटे, हमारा अलग है स्टाइल)जिसे अमित देव ने गाया है. वाह क्या बात है !!

तो भई हम साहित्य और संगीत में आ गए हैं. ये तीनों लिंक मैंने सहेज लिए हैं.

श्री देसराज काली
 





Scavenging human excreta - मैला ढोने वाले


स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्ष बाद भी दलितों का एक ऐसा हिस्सा है जो सिर पर मनुष्यों का मैला उठाने के लिए बाध्य है. मुख्यतः गाँवों में रहने वाले इस हेला समुदाय, वाल्मीकि समुदाय आदि के कई सदस्यों को अभी तक ऐसा अवसर नहीं मिला है कि इस कार्य से मुक्त हो सकें. सच यह है कि गाँवों में चलने वाली अमानवीय परंपराओं के शिकार इन लोगों की स्वतंत्रता केवल नाम की है. ये लोग अपना व्यवसाय बदलने का प्रयास करते हैं तो इन पर इतना सामाजिक और आर्थिक ज़ुल्म ढाया जाता है कि इन्हें अपने बच्चों को जीवित रखने के लिए सिर पर मैला ढोने के कार्य की ओर लौटना पड़ता है. मध्यप्रदेश में हुए एक अध्ययन ने भारत सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें कहा गया था कि सिर पर मैला ढोने की प्रथा का भारत में अंत कर दिया है. 

अध्ययन रिपोर्ट इस लिंक पर देखी जा सकती है :-  

Friday, May 11, 2012

Valmiki community (Scavengers) retain their income


चंडीगढ़ नगर निगम - सफाई की बातें, पैसे पर निशाना

आज भारत में जातीय संघर्ष के कई रूप दिखते हैं और अब यह मुख्यतः पैसे की ही सारी लड़ाई है. एक उदाहरण हाल ही में चंडीगढ़ में देखा.

घर-घर से कूड़ा उठाने वालों को एक दिन ख़बर मिली कि नगर निगम ने प्रयोग के तौर पर एक परियोजना शुरू की है कि निगम के कर्मचारी और ट्रक सैक्टर-22 के घरों में आकर घंटी बजाएँगे और वहाँ के रहने वालों से गारबेज बैग या कूड़ा बाल्टी से कूड़ा ले जाएँगे. कूड़ा उठाने का शुल्क 70 रुपए प्रतिमाह बिजली के बिल में शामिल करके भेजा जाएगा और लोगों को परंपरागत कूड़ा उठाने वालों की मनमानी से छुटकारा मिलेगा. बहुत खूब. लेकिन सफाई करने वाले समुदाय ने अचानक हड़ताल कर दी और निगम की कार्रवाई के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया. उन्होंने कूड़ा फेंकने के निर्धारित स्थानों की निगरानी की और चौकस दृष्टि के साथ आंदोलन चलाया. घरों में कूड़ा इकट्ठा होना शुरू हो गया. लोगों ने बहुत धैर्य का परिचय दिया. कुछ दिनों के बाद निगम ने बातचीत के बाद अपनी परियोजना को बंद करने का निर्णय लिया और सफाई करने वाले कार्य पर लौट आए. लोगों ने राहत की लंबी साँस ली. सिर्फ़ एक श्री शर्मा के अलावा, जिसे दि ट्रिब्यून ने संदर्भित करते हुए कहा था कि निगम ने ऐसे आंदोलन से निपटने के लिए पूरे प्रबंध नहीं किए थे.

सच्ची बात यह है कि मैं कई अनपढ़ों से गया गुज़रा हूँ. सोचा कि परंपरागत रूप से कूड़ा उठाने वालों की स्थिति के बारे में जानकारी ली जाए. सो अपने घर में सफ़ाई का काम करने वाली महिला को पूछा कि यह माजरा क्या था. उसने कूड़ा उठाने के कार्य की आर्थिकता की जो बात बताई उसका सार यह है-

ये कर्मचारी एक घर से कूड़ा उठाने के प्रति परिवार 50 रुपए लेते हैं. निगम 70 रुपए लेता जो एक घर में रहने वाले परिवारों या किराएदारों में बँट जाता. दूसरा पक्ष है कि कचरे के अतिरिक्त इन लोगों को इसमें ऐसी वस्तुएँ भी मिलती हैं जो कबाड़ के रूप में बिकती हैं. (यह सुनते ही मेरे दिमाग़ का बल्ब जला क्योंकि मैं पठानकोट के एक महाजन परिवार को जानता हूँ जिनके चार भाइयों में से तीन अच्छे साफ़-सुथरे दूकानदार हैं और एक कबाड़ का काम करता है. चारों में से सिर्फ़ कबाड़ का कार्य करने वाले भाई ने चंडीगढ़ जैसे महँगे शहर में मकान बनाया.) मेरे पूछने पर उस महिला ने बताया कि कई कूड़ा उठाने वालों को कबाड़ इकट्ठा करके महीने में चालीस-पचास हज़ार रुपए की आमदनी हो जाती है और कि उन लोगों ने अपने यहाँ कुछ युवाओं को रोज़गार भी दिया हुआ है. मेरी खोपड़ी घूम कर लौट आई. आयकर दाता हूँ सो तुरत ध्यान आया कि अरे ये भी टैक्स देते होंगे क्या? फिर तुरत ही कृषि से प्राप्त आय का ध्यान आया जिस पर कोई आयकर नहीं लगता क्योंकि कृषि एक जोखिम भरा व्यवसाय है.

ओके भाई साहब. अब आप कूड़ा उठाने वाले किसी भी व्यक्ति के खून की जब  चाहे जाँच करवा लें. वह कभी स्वस्थ नहीं निकलेगा. यह कार्य पूर्णतः जोखिम भरा है. फिर ये लोग आगे भी रोज़गार का उत्पादन कर रहे हैं. इससे प्राप्त आय को आय कैसे माना जा सकता है. नाइयों के कार्य को भी आयकर से मुक्त रखा गया है.

साफ़ बात है कि नगर निगम की निगाहें कबाड़ पर थीं और इस पूरे प्रकरण के पीछे किन्हीं ठेकेदारों की भूमिका थी जो कबाड़ के थोक व्यापारी हैं. कूड़ा उठाने वालों ने इस कूड़े को भी पहचान कर साफ़ किया. जय हो.

पैसे का संघर्ष लग़ातार चलने वाला है. कभी राजनीतिक फैसलों से और कभी नई तकनीक के नाम पर. लेकिन क्या कोई व्यक्ति अपनी आय के साधन को थाली में रख कर किसी अन्य के हाथ में ऐसे ही सौंप देता है? हाँ, भारत के जुलाहों में यह बात है जो विभिन्न नामों में बँटे हैं. उन्होंने उन सरकारी नीतियों के विरुद्ध कभी कोई संगठित आंदोलन नहीं चलाया जिनकी मदद से देश भर के मेघवंशी जुलाहों, अंसारियों के व्यवसाय को तबाह करके गिने-चुने उद्योगपतियों (ऊँची जातियों) के हाथों में सौंप दिया गया.

ग़रीब से अकिंचन हो जाने से बेहतर है कि ग़रीब से बेहतर कुछ बना जाए.

Wednesday, May 9, 2012

Bharatiya Shudra Sangh (BSS) - भारतीय शूद्र संघ

भारत की दलित जातियाँ अपनी परंपरागत जाति पहचान से हटने के प्रयास करती रहीं हैं. इस बात को भारत का जातिगत पूर्वाग्रह भली-भाँति जानता है. मूलतः शूद्र के नाम से जानी जाती ये जातियाँ अपनी पहचान को लेकर बहुत कसमसाहट की स्थिति में हैं.

व्यक्ति जानता है कि यदि वह अपना कोई जातिनिरपेक्ष सेक्युलरसा नाम रख लेता है जैसे भारत भूषण या दशरथ कुमार या अर्जुन तो उसे हर दिन कोई न कोई व्यक्ति अवश्य पूछेगा कि भाई साहब आप अपना पूरा नाम बताएँगे? तो वह अपनी पहचान छिपाने के लिए दूसरी कोशिश करते हुए कहेगा, “भारत भूषण भारद्वाज. दूसरा व्यक्ति कहेगा, “यह तो ऋषि गोत्र हुआ. पूरा नाम…”. दो-चार सवालों के बाद उत्तर देने वाले व्यक्ति का स्वाभिमान आहत होने लगता है. वह जानता है कि उसकी जाति पहचान ढूँढने वाला व्यक्ति उसे हानि पहुँचाने वाला है.

अपनी पहचान के कारण संकट से गुज़र रही इन जातियों के सदस्यों ने अपने नाम के साथ सिंह, चौधरी, शर्मा, वर्मा, राजपूत, अग्रवाल, गुप्ता, मल्होत्रा, पंडित सब कुछ लगाया. लेकिन संकट टलता नज़र नहीं आता. मैंने अपने जीवन में इसका सरल हल निकाला कि नाम बताने के तुरत बाद मैं कह देता था कि मेरी जाति जुलाहा है, कश्मीरी जुलाहा (तर्ज़ वही रहती थी- My name is bond, James bond). :)) इससे पूछने वाले के प्रश्न शांत हो जाते थे और उसके मन को पढ़ने में मुझे भी आसानी हो जाती थी. इस तरीके से मुझे बहुत से बढ़िया इंसानों को पहचानने में मदद मिली.

अभी हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय शूद्र संघके राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रीतम सिंह कुलवंशी से बात हुई और उन्होंने एक पुस्तिका मुझे थमाते हुए कहा कि इसे देखिएगा. इसमें उल्लिखित बातों से बहुत-सी आशंकाओं का समाधान हो जाएगा. वह पुस्तिका मैंने ध्यान से पढ़ी है और उसका सार यहाँ लिख रहा हूँ.


भारतीय शूद्र संघ - मिशन

इस पुस्तिका में स्पष्ट लिखा गया है कि भारतीय शूद्र संघ, संघ नहीं एक मिशन है. इसमें मोहन जोदड़ो और हड़प्पा सभ्यताओं से लेकर आधुनिक युग तक भारत के मूलनिवासियों का बहुत ही संक्षिप्त इतिहास दिया गया है जो बहुत प्रभावकारी है. इसी के दूसरे पक्ष के तौर पर शूद्र समाज के सदस्य व्यक्ति की अस्मिता (पहचान) की बात उठाई गई है. इस संस्था का मिशन यह है कि शूद्र समाज के हर बुद्धिजीवी को एकजुट होकर स्वाभिमान के लिए प्रयास और संघर्ष करना पड़ेगा. अन्य बातों के साथ-साथ इस मिशन का उद्देश्य इस बात का प्रचार करना भी है कि शूद्र समाज के व्यक्ति अपने नाम के पूरक के तौर पर इन नामों का प्रयोग करें- भारती, भारतीय, रवि, अंबेडकर, भागवत, वैष्णव, सूर्यवंशी, कुलवंशी, नागवंशी, रंजन, भास्कर इत्यादि. उल्लेखनीय है कि ये नाम दलितों के साथ पहले भी जुड़े हैं. शायद यह मिशन ऐसे नामों की शार्ट लिस्ट (छोटी सूची) तैयार करना चाहता है या स्पष्ट पहचान वाले शब्दों को बढ़ावा देना चाहता है.

मिशन द्वारा वितरित पुस्तिका में बहुत से बिंदु हैं जिन पर गंभीर विचार मंथन आवश्यक है. दलितों के कई समूह सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों में बँट कर अलग-अलग कार्य कर रहे हैं. उनमें से कई बहुत बड़े स्तर पर सक्रिय हैं. उनका एक गठबंधन (confederation) तैयार करने की आवश्यकता है. सभी समूह अपना-अपना कार्य करें साथ ही अपना एक महासंघ गठित करें. इससे सुदृढ़ संगठन और एक साझा अनुशासन निर्मित होगा.

समाज के विभिन्न वर्गों में सदियों से चला आ रहा और घर-घर में फैला कर्मचारी-नियोक्ताका संबंध एक अविरल प्रक्रिया है. ऐसे सामाजिक संबंध का विकास तो होता है लेकिन यह अपना समय लेता है. यह मिशन इस तथ्य को स्पष्ट स्वीकारता है. 





Sunday, May 6, 2012

Meghvansh- One direction - मेघवंश - एक दिशा


कल 05 मई, 2012 को चंडीगढ़ के पास एक गाँव बहलाना में कई मेघवंशी और कबीरपंथी समुदायों के प्रतिनिधियों का एक सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें मेघवंशी समुदायों के परस्पर समन्वय के लिए किए जाने वाले कार्यों की सूची पर विचार-विमर्ष हुआ. इस सेमिनार की अध्यक्षता श्री गोपाल डेनवाल ने की और श्री आर.पी. सिंह इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे. कार्यक्रम का आयोजन हिमाचल प्रदेश की संस्था कबीरपंथ महासभा (Kabir Panth Mahasabha) ने किया था.
(From left) S/Sh. Baru Pal, Gopal Denwal and R.P. Singh
इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों से पधारे प्रतिनिधियों ने अपने-अपने विचार रखे जिनका सार-संक्षेप यह है कि मेघवंशी और अन्य दलित सामाजिक संगठनों के साझा धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक मंच तैयार करने की आवश्यकता है. इसके लिए शिक्षा और एकता की भावना विकसित करने की तत्काल ज़रूरत है. जातियों के बँटवारे की पूर्वनिर्मित भ्रामक मान्यता को तोड़ना होगा. जानना होगा कि अनुसूचित जातियाँ, जनजातियाँ और अन्य पिछड़ी जातियाँ वास्तव में एक ही हैं. इस नकली विभाजन को मन से निकालना होगा. धार्मिक विभाजन की दीवारों को खंडित करके आत्म सम्मान के भाव को सशक्त करना होगा.
Gopal Denwal addressing the gathering
अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री गोपाल डेनवाल ने कहा कि विभिन्न नामों में बँटा मेघवंशी समाज आपस में नाम पर ही भिड़ जाता है. इस प्रवृत्ति को तोड़ना ज़रूरी है. नाम अलग होने से कुछ नहीं होता बल्कि सभी मेघवंशी समुदायों का आपस में मिल कर शिक्षा और आर्थिक विकास का प्रबंध करना महत्वपूर्ण है. इसके लिए सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक संगठन की कोशिशें तेज़ होनी चाहिएँ.

इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से पधारे अन्य वक्ताओं में सर्वश्री/सुश्री जसविंदर कौर, बारू पाल, हरबंस लाल लीलड़, इंद्रजीत मेघ, प्रीतम सिंह, त्रिलोक चंद, प्रो. कायस्थ, मस्त राम, गणपतराय, रमेश, भारत भूषण आदि थे.
H.R. Leelad

Prof. Kayastha

R.P.Singh's address to participants.
विशेष नोट – मेघ भगतों के संगठन ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ का प्रतिनिधित्व श्री इंद्रजीत मेघ ने और भगत महासभा, जम्मू का प्रतिनिधित्व श्री भारत भूषण ने किया.
(From to left to right) S/Sh K.C. Bhagat, Darshan Lal Bhagat and Inderjit Megh represented All India Megh Sabha, Chandigarh.

मेघवंशियों का समाचार-पत्र 'दर्द की आवाज़' ने रुचि जगाई



एक विस्तृत नोट नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.