Friday, March 30, 2012

Waging war against nation- diluting definition - टलना फाँसी का बनाम राष्ट्र पर हमला

कानून का विशेषज्ञ नहीं हूँ लेकिन भारत के एक नागरिक को राष्ट्र पर हमले की परिभाषा के बारे में जो जानना चाहिए उसके बारे में जो जानता हूँ उसके आधार पर कुछ कहने का अधिकार है.

किसी सरकारी सेवक या सरकारी संपत्ति को जानबूझ कर हानि पहुँचाने का कार्य राष्ट्र पर हमले की परिभाषा के अंतर्गत आता है. मुख्यमंत्री की हत्या इसी के तहत है.

कई वर्ष पूर्व पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के समय की परिस्थितियाँ आतंकवाद की और स्वर्णमंदिर को अलगाववादियों के कब्ज़े से मुक्त कराने की थीं जिसके क्रम में इंदिरा गाँधी और बेअंत सिंह की हत्या हुई. कुछ जुनूनी मृत्यु के बाद, कुछ फाँसी के बाद शहीद घोषित हुए. बलवंत सिंह राजोआणा 'जीवित शहीद' है जिसकी फाँसी की सज़ा को माफ़ कराने की कोशिश बहुत बड़े स्तर पर चल रही है.

आतंकी मामलों में संगठित धर्म और राजनीति का घालमेल क्या कर सकता है यह देखने योग्य है. यह घालमेल इस बात को स्वीकार नहीं करता कि धार्मिक स्थल पर सशस्त्र आतंकियों/अलगाववादियों का कब्ज़ा धर्मस्थल पर और देश पर हमला होता है. वे पुलिस/सेना की कार्रवाई को ही अपवित्र कार्रवाई मानते और घोषित करते हैं.

यह इसी घालमेल की सोच का परिणाम है कि पंजाब में लगभग सभी राजनीतिक दल बलवंत की फाँसी को रुकवाने के लिए एकत्रित हो गए हैं. बेअंत सिंह के उत्तराधिकारी भी उनके साथ हैं.

उल्लेखनीय है कि राजोआणा ने बेअंत सिंह की हत्या में अपनी संलिप्तता स्वीकार की है. उसने फाँसी की सज़ा के विरुद्ध कभी दया याचिका दायर नहीं की. उसका मानना है कि उसने अपने साथी को मानवबम के तौर पर उड़ाया और प्रयोग किया था. उसे ख़ुद को फाँसी से बचाने का कोई औचित्य नहीं दिखता क्योंकि उसका मृत साथी आज न तो अपील कर सकता है और न वापस आ सकता है. क्या बेअंत सिंह का जीवन वापस आ सकता है? नहीं.

इस बीच सतलुज और ब्यास में काफी पानी बह चुका है. आज की तारीख़ में इसे किसी व्यक्ति के जीवन से जोड़ कर देखना अच्छी बात है लेकिन कहीं हम राष्ट्र पर आक्रमण की परिभाषा को खतरे में तो नहीं डाल रहे हैं? यह गंभीर प्रश्न है जो हर उस परिस्थिति में हमारे सामने आ खड़ा होगा जब कोई धार्मिक-राजनीतिक हत्या होगी और कोई न कोई संगठित धर्म किसी राजनीतिक दल के साथ सड़कों पर उतर कर हत्यारों को शहीद घोषित कर देगा. हमारे देश में संगठित धर्म हैं. आने वाले समय में और भी होंगे. कल नक्सली भी अपनी सोच बदलते हुए या रणनीति के तहत किसी धर्म को अंगीकार कर लें तो शायद सब से अधिक खुशी भारत में पसरे माओ-लेनिनवाद को होगी :))

धर्म की आड़ में यदि अलगाववाद या आतंकवाद कहीं सिर उठाए तब हम किस दिशा में झांकेंगे और कितने समझौते करेंगे? क्या लोकतांत्रिक समझौतों से प्रेरित आतंक और शहादत की घोषणाओं का दौर चलता रहेगा और राष्ट्र पर हमले की परिभाषा पतली की जाएगी? अच्छा होगा धर्म के अनुयायियों की संख्या के आधार पर कह दिया जाए कि ले भइया तेरे पचास लाख अनुयायी, तुझे 50 धार्मिक आतंकियों का कोटा. खुश रहो, आबाद रहो!!!

हस्तक्षेप.कॉम से : राजोआणा से एक अंत क्यों, शुरूआत भी हो सकती है !




Monday, March 26, 2012

The voice of Meghvanshis - मेघवंशियों की आवाज़



दुनिया में सब से कठिन कार्यों में से एक है अख़बार चलाना. दलितों के पक्ष को सही तरीके से रखने वाला अख़बार चलाना और भी कठिन इस मायने में है कि अख़बार को चलाने के लिए जितने पैसे की ज़रूरत होती है उतना मिलता नहीं. सरकारी विज्ञापन और सीधा वित्त लगभग अनुपलब्ध ही है.

इन परिस्थितियों में जयपुर से श्री गोपाल डेनवाल ने एक छोटा समाचार पत्र दर्द की आवाज़ निकाला था जिसका मार्च, 2012 का अंक मिला है. मैं इससे बहुत प्रभावित हुआ हूँ. इसमें मेघवंशियों की बात है, उनकी अपेक्षाएँ, पीड़ा और महत्वाकांक्षाएँ और उनकी प्रार्थनाएँ हैं. इस समाचार पत्र के प्रधान संपादक श्री डेनवाल के आलेखों का स्वर आह्वान का है जो दलितों के विकास में आती बाधाओं को चुनौती देता चलता है. सबसे बढ़ कर इसमें मेघवंश की एकता के प्रति प्रतिबद्धता है.

यह देख कर खुशी होती है कि इस समाचार पत्र की सर्कुलेशन बढ़ रही है.

संपर्क :
श्री गोपाल डेनवाल
ए-2, ए, नितेश विला
विवेकानंद कॉलोनी
नयाखेड़ा, अंबाबाड़ी,
जयपुर.

हम अपने समुदाय के समाचार पत्रों को पढ़ने के अभ्यस्त हो रहे हैं. यदि आप इन्हें पढ़ते हैं तो इसे उन मेघवंशी भाइयों के साथ शेयर करें जो इच्छुक हैं या अंशदान दे पाने की हालत में नहीं हैं. शुभ को शीघ्र करें. शुभकामनाएँ.   

MEGHnet

Monday, March 19, 2012

Dr. Dhian Singh - History of Meghs/Megh Bhagats - मेघों/मेघ भगतों का ज्ञात इतिहास


MEGHnet ब्लॉग पर मैंने दलितों के इतिहास से संबंधित आलेख (चिट्ठे) लिखे हैं जो पुस्तकों और इंटरनेट से उपलब्ध सामग्री के आधार पर हैं. ये इतिहास नहीं हैं परंतु कई पौराणिक और आधुनिक सूत्रों को समझने तथा उन्हें एक जगह एकत्रित करने का प्रयास है. अन्य से ली गई सामग्री के लिए संबंधित लेखक या वेबसाइट के प्रति विधिवत् आभार प्रकट किया गया है. मेघनेट के बहुत से आलेख कई अन्य वेब साइट्स और ब्लॉग्स पर मेघनेट के साभार डाले गए हैं जो बहुत संतोष देने वाला है

कपूरथला के डॉ. ध्यान सिंह को जब मैं मिला था तब उन्हें अपनी मंशा बता कर उनका पीएचडी थीसिस मैं उनसे ले आया था और उसे एक अन्य ब्लॉग 'Hisory of Megh Bhagats' या 'पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास' के नाम से काफी देर से इंटरनेट पर रखा हुआ है. इस ब्लॉग पर कई जिज्ञासु आए हैं.

मन में यह इच्छा थी कि डॉ. ध्यान सिंह के संपूर्ण थीसिस को या उसके कुछ अंशों को यूनीकोड में टाईप कर करके इंटरनेट पर डाला जाए जिससे उसे कोई भी हिंदी में पढ़ सकें. इसमें एक खतरा भी था कि कोई भी शोधग्रंथ की सामग्री को आसानी से ब्लॉग से कॉपी कर सकता था और प्रयोग कर सकता था. क्योंकि यह सामग्री मूलतः ध्यान सिंह जी की है अतः मेरा कर्तव्य था कि इसे यथा संभव सुरक्षित रखा जाए और पीडीएफ बना कर लिंक के रूप में अपने विभिन्न ब्लॉग्स पर रख दिया जाए ताकि जिज्ञासु इसे पढ़ सकें. आप इस फाइल का प्रिंट आऊट लेकर पढ़ सकते हैं.

शोधग्रंथ का यह एक ही अध्याय है जो प्रस्तुत किया जा रहा है लेकिन निश्चित है कि इसमें मेघ भगतों का ज्ञात इतिहास है. मेघों का प्राचीन इतिहास कथा-कहानियों के रूप में है. उन्हें संकेत माना जा सकता है. वास्तविक/विस्तृत इतिहास या तो लिखा नहीं गया या उसे आक्रमणकारी कबीलों ने नष्ट कर दिया. अतः जो उपलब्ध है उसे जाना जाए.

डॉ. ध्यान सिंह के साभार और उनके कर कमलों से उनके शोधग्रंथ का तीसरा और मुख्य अध्याय मेघवंशियों को समर्पित है.

डॉ. ध्यान सिंह
 
उक्त उपलब्ध इतिहास को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.

Megh Bhagat and their surnames - मेघ भगत और उनके गोत्र (गोत)


डॉ. ध्यान सिंह का शोधग्रंथ कई मायनों में उपयोगी है. इसमें मेघ भगतों के गोत्रों को भी समेकित किया गया है. इस विषय में मुझे कुछ जानकारी तो थी लेकिन डॉ. सिंह द्वारा तैयार गोत्रों की सूची से बहुत कुछ नया भी मिला. गोत्रों की सूची इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे संकेत मिलते हैं कि हम कौन हैं, कहाँ से आए थे और हमारे पूर्वज क्या करते थे. इस सूची में दिए नाम सिद्ध करते हैं कि हमारे कुछ पूर्वज अस्सीरिया से संबंधित थे. इस दृष्टि से अस्सरिया और एरियन शब्द अपनी कहानी कहते हैं. इसी प्रकार इस सूची में केशप (कश्यप) और प्राशर (पराशर) ऋषियों के नाम से गोत्र होना और विवाहों आदि में हमारा ऋषि गोत्र के रूप में भारद्वाज, अत्रि आदि ऋषियों का नाम बताना एक शोध का विषय हो सकता है क्योंकि कुछ अन्य ऋषियों के नाम हमारे समुदाय से जुड़े नहीं हैं.

सूची से स्पष्ट है कि गोत्रों का नामकरण कई प्रकार से हुआ है. गोत्र के मूल में गाँव, रेस, ऋषि, व्यवसाय, किसी नई जाति विशेष से संपर्क में आने के बाद नया नाम, रंग और छवि, विशेष आदत, गुण विशेष, क्षेत्र विशेष, पशु-पक्षी (व्यवसाय के रूप में भी), इष्ट, शारीरिक बनावट, महँगे पत्थरों आदि के नाम हैं. बहुत से गोत्रों के नाम ऐसे हैं जो संभवतः कभी शुद्ध रूप में तत्सम् (संस्कृत स्पैलिंग के अनुसार) रहे हैं और बाद में अन्य जातियों ने उनका रूप ज़बरदस्ती बिगाड़ दिया है या वे घिसते हुए इस तद्भव रूप को प्राप्त हुए हैं.

अंत में एक बात जोड़ना चाहूँगा कि गोत्रों की सूची को मैंने शब्दकोश विज्ञान (Lexicography) के नियम के अनुसार वर्णक्रम में लगा दिया है. आने वाले समय में शोधकर्ता इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रयोग कर सकेंगे.

भारत भूषण, चंडीगढ़
ईमेल- bhagat.bb@gmail.com


मेघ भगतों के गोत्रों की सूची
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अगर, अस्सरिया,
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एरियन,
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कंगोत्रा, ककड़, कतियाल, कड़थोल, कपाहे, कम्होत्रे, कलसोंत्रा, कलमुंडा, करालियाँ, कांचरे, कांडल, काटिल, काले, किलकमार, कूदे, केशप, कैले, कोकड़िया, कोण,
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खंगोतरे, खंडोत्रे, खड़िया, खढ़ने, खबरटाँगिया, खरखड़े, खलड़े, खलोत्रा, खोखर, खोरड़िये,
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गंगोत्रा, गाँधी, गुटकर, गड़गाला, गड़वाले, गिद्धड़, गोत्रा, गौरिये,
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घई, घराई, घराटिया, घराल, घुम्मन,
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चखाड़िये, चगोत्रा, चगैथिया, चबांते, चलगौर, चलोआनियाँ, चितरे, चोकड़े, चोपड़ा, चोहड़े, चोहाड़िए, चौदेचुहान, चौहान,
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छापड़िया, छोंके,
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जजूआं, जल्लन, जल्लू,
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टंभ, टनीना, टुंडर, टुस्स, टेकर, टोंडल,
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डंडिये, डंबडकाले, डग्गर, डांडिये, डोगरा, डोगे,
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ढम, ढींगरिये,
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तरपाथी, तराहल, तरियल, तित्तर,
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थंदीरा, थिंदीआलिया, थापर,
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दत्त, दमाथियां, दलवैड, दरापते,
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धूरबारे,
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नजोआरे, नजोंतरे, नमोत्रा,
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पंजगोत्रे, पंजवाथिए, पंजाथिया, पकाहे, पटोआथ, पडेयर, पराने, परालिये, पलाथियाँ, पवार, पहाड़ियाँ, पाड़हा, पानोत्रा, पाहवा, पूंबें, पौनगोत्रा, प्राशर (पराशर),
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बकरवाल, बजगोत्रे, बजाले, बदोरू, बक्शी, बग्गन, बाखड़ू, बादल, बटैहड़े, बरेह, बिल्ले, बैहलमें,
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भगोत्रा, भलथिये, भसूले, भिंडर, भिड्डू,
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मंगलीक, मंगोच, मंगोतरा, मंजोतरे, मड़ोच, मनवार, मन्हास, ममोआलिया, मल्लाके, मांडे, मुसले, मैतले,
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रतन, रत्ते, रमोत्रा, रूज़म,
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लंगोतरा, लंबदार, लालोतरा, लचाला, लचुंबे, लसकोतरा, लातोतरा, लासोतरा, लीखी, लुड्डन, लेखी, लोंचारे,
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शौंके,
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संगलिया, संगवाल, संगोत्रे, सकोलिया, सपोलिया, समोत्रा, सलगोत्रे, सलगोत्रा, सलहान, सलैड, सांगड़ा, साठी, सिरहान, सीकल, सीहाला, सोहला, सुंबरिये, सेह्,
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हरबैठा, हितैषी.
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(गोत्रों की यह सूची डॉ. ध्यान सिंह के पीएचडी के लिए स्वीकृत शोधग्रंथ पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकाससे ली गई है.)

Sunday, March 18, 2012

Something is going on - कुछ है तो सही

आजकल गूगल द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले ग्राफ़ से मालूम पड़ रहा है कि मेरे MEGHnet ब्लॉग पर एक विषय विशेष से संबंधित बहुत से आलेखों पर दो-तीन व्यक्ति काफी विज़िट कर रहे हैं. अच्छा लगता है. संभव है इनमें से कोई मेघों के इतिहास पर कार्य कर रहा हो. शुभकामनाएँ.

Thursday, March 15, 2012

Than what if there are apprehensions - आशंकाएँ व्यापती हैं तो क्या!


Chunni Lal Bhagat
भगत चूनी लाल जी कैबिनेट मंत्री बन गए हैं.

सिपाही जब युद्ध के मैदान में जाने लगता है तो उसके घायल होने की आशंका व्यापने लगती है. जब दलित जातियों के लोग नौकरी पा लेते हैं तो रिपोर्टें खराब होने की आशंका घेरने लगती है. ऐसे ही जब हमारे राजनीतिक कार्यकर्ता मंत्रीमंडल में पहुँचते हैं तो हमें ए. राजा और बंगारूलक्ष्मण की याद आना स्वाभाविक है. राजनीति षडयंत्रों का दूसरा नाम है.

देखा गया है कि राजनीतिक पार्टियों में दलित कम होते हैं और उनकी आवाज़ भी उसी अनुपात में सुनी जाती है. आला कमान की कमान में वे नन्हें तीरों की तरह होते हैं.
Prakash Singh and Chunni Lal Bhagat
 यह सच है और सामने है. राजनीति के युद्ध में जाना है तो राजनीतिक मृत्यु की आशंका भी व्यापेगी. तो क्या राजनीतिक अवसरों को जाने दिया जाए? नहीं. आशंकाएँ कार्य करने में मदद नहीं करतीं. सत्ता में भागीदारी करनी है तो जोखिम उठाने होंगे. अनुभव साझा करने होंगे और अपने काडर खड़े करने होंगे.

सतर्कता बरतें, आशंकाओं को भुलाएँ और सत्ता का स्वाद चखें. शुभकामनाएँ.

Prakash Singh Badal and Bhagat Chunni Lal

Wednesday, March 14, 2012

Megh Churn-3 – मेघ मथनी (मधाणी)-3



चाटी में रखा धर्म

बड़ीईईईई मुश्किल है. मिस्टर मेघ से बात करना ख़तरे से ख़ाली नहीं. वे हमेशा ज़मीनी बात कहें यह ज़रूरी नहीं लेकिन वे कड़ुवी बातें कहेंगे यह तय है. इस बार जब वे भार्गव कैंप (मेघ नगर) की गली में शहतूत के नीचे बिशना टी-शाप पर मिले तो जैसा कि होता आया है, विषय खिसक कर ऐसी जगह पहुँचा जिसका मुझे अनुमान नहीं था. मैंने ही शुरू किया था-

मैं- सर जीईईईई, जय हिंदअअ. कैसे हैं.

मि. मेघ- सुना भई, तेरी दोनों टाँगे चल रही हैं न?

मैं- क्यों सर जी, मेरी टाँग को क्या हुआ.

मि. मेघ- पिछली बार तेरे इतिहास की टाँग तोड़ दी थी मैंने, इस लिए पूछा. हा हा हा हा हा हा....

मैं- (उदास स्वर में) हाँ अंकल जी. अब हमें बिना टाँग से गुज़ारा करना पड़ेगा क्योंकि दूसरी भी टूटती नज़र आ रही है. बुरा न मनाना सर जी, हमारा इतिहास तो है नहीं, धर्म भी रसातल में जा रहा है.

मि. मेघ- क्या हुआ? बड़ा दुखी नज़र आ रहा है. तेरा सनातन धर्म तो आर्यसमाज है. उसकी बैसाखी टूट गई क्या? लगता है गायत्री मंत्र ने बेड़ा पार नहीं किया.

मैं- उस बैसाखी को टूटे तो 60 साल हो गए. अब समस्या बहुत गंभीर हो गई है.

मि. मेघ- ओह, तो तेरी समस्या धर्म है. तू खुद को हिंदू कहता है और हिंदू तेरे को हिंदू नहीं मानते. यही तेरी समस्या है तो दफ़ा हो जा.

मैं- क्या बात करते हो अंकल जी!! हम हिंदू नहीं तो फिर और क्या हैं? यही न कि हिंदुओं में सबसे नीचे रखे हुए हैं.

मि. मेघ- खोत्तेया, सब से नीचे रह कर तू खुश है. तभी तो तू महान है उल्लुआ.

मैं- तो क्या आप हिंदू नहीं हो?

मि. मेघ- हूँ. लेकिन एक अलग मायने में. होशियार रहता हूँ कि बीजेपी और आरएसएस के झाँसे में न आऊँ. ये तो निरा धोखा हैं.

मैं- यह तो आप में कांग्रेस का भूत बोल रहा है. आप आधे तीतर और आधे बटेर हो चुके हो.

मि. मेघ- तू सही कह रहा है. पर तू मेरी छोड़, अपनी बता. चाय पीनी हो तो बात कर.

(चाय से बातचीत के दरवाज़े खुलते हैं. बिशना को कड़क चाय का आर्डर किया. कैरोसिन का स्टोव शूँ-शूँ करने लगा. भाप के साथ पत्ती की महक आने लगी.

मि. मेघ- चल, अब शुरू हो जा. चाय बन रही है.

मैं- अंकल जी, आपने भी सुना होगा कि बहुत से मेघ ईसाई बन गए हैं.

मि. मेघ- और तेरे पेट में दर्द उठता होगा? हैं? यदि तेरी यही समस्या है तो इसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं. ओए बिशना आर्डर कैंसल कर.

मैं- बिशना आर्डर कैंसल नहीं होगा....मेघ जी यह बिरादरी की समस्या है. हम हैं ही कितने? पहले ही एकता की कमी है और हम और ज़्यादा बँट जाएँगे.

मि. मेघ- अच्छा...अच्छा...अच्छा. तो तुझे यह ग़म खाए जा रहा है! अच्छा यह बता कि तुझे यह ग़म कब से खा रहा है? जब से मेघ सिख, आर्य समाजी बने या मुसलमान हुए या फिर राधास्वामिए बन गए? अच्छा यह बता कि सिख, आर्यसमाजी, मुसलमान, राधास्वामिए या ईसाई बनने से पहले तुम्हारा कोई धर्म था? था तो कौन सा था? चल बता...

मैं- मैं नहीं जानता, बिल्कुल.

मि. मेघ- तो फिर दुखी क्यों होता है? तू कुछ नहीं है और ख़ुद को समझता भी है कि कुछ है. मतलब तू पहले कुछ भी नहीं था, और अब कुछ बन गया है. जो बनेगा, वो बँटेगा. इसमें कोई नई बात है क्या? तुझे यह तक तो पता नहीं कि तेरा पुराना धर्म क्या है. तो क्या तेरे पुरखे बिना धर्म के जीते आ रहे थे? डेरे-डेरियाँ क्या ऐसे ही बन गए? अक्ल की बात किया कर यार.

मैं- मैंने तो कहीं इसके बारे में पढ़ा नहीं.

मि. मेघ- मैं बताता हूँ. तेरा धर्म है- अनपढ़ता. (विरक्त हो कर) सारी उम्र ऐसे ही कट गई. बाकी भी कट जाएगी.

मैं- (खीझ कर) तो फिर आप बताओ न. क्या था धर्म हमारा?

मि. मेघ- तेरे मुँह में तो बस कोई खीर बना कर डाल दे. ख़ुद तो कुछ करना ही न पड़े. पुत्तर, स्टेट लाईब्रेरी में जाया कर. चल तेरे को एक शार्ट कट बता देता हूँ. कुछ न पढ़ सके तो अंबेडकर को पढ़ ले.

मैं- यूँ ही मारे जा रहे हो. कुछ बताओ तो सही. अंबेडकर के बारे में हो सकता है मैं कुछ जानता होऊँ.

मि. मेघ- अच्छा तो यह बता कि अंबेडकर का धर्म क्या था?

मैं- वो हिंदू थे, और क्या.

मि. मेघ- लक्ख लानत..

मैं- क्यों?

मि. मेघ- वे बौध थे.

मैं- (अचानक याद आने पर) हाँ-हाँ-हाँ-हाँ-हाँ, मैंने सुना था.

मि. मेघ- (चुभती आवाज़ में) बौध धर्म के नाम से अब तेरे पेट में फिर से दर्द उठ रहा होगा. नहीं? बिशना से तू चुल्लू भर पानी ले ले और डूब कर मर जा.
(बिशना की आँखें चमक उठीं)

बिशना- हंबेडकर ने कहा था चाचा, कि मैं नरक में पैदा तो हो गया था पर नरक में मरूँगा नहीं.

मि. मेघ- सुन लिया? जो तू नहीं जानता वह बिशना जानता है. अब धरती पर तेरे मरने के लिए कोई जगह नहीं. तू सिर्फ़ बिशना की चाय में डूब कर मर सकता है. चाय पकड़ ले.....और आखिरी बार समझ ले कि धर्म एक ऐसा नकली दही है जिसमें से कोई भी मधाणी मक्खन नहीं निकाल सकती. तू दुखी मत हुआ कर, मेघ बहुत स्याने लोग हैं इसका विश्वास रख.

मिस्टर मेघ कहीं भी, कुछ भी कह सकते हैं. लेकिन उन्होंने आख़िर तक मेघों के ईसाई बनने पर अपनी ओर से कुछ नहीं कहा. मिस्टर मेघ हैं ही मेघ, ऊँची सोच वाले, एकदम आसमानी. कोई कुछ भी बने, वे धर्म को लेकर परेशान नहीं होते. ईसाई मिशनरियों, आरएसएस ने शायद बरास्ता मि. मेघ के मेघों को जान लिया है. मेघ ईसाई भी बन रहे हैं और बुड्डा मल ग्रऊँड में आरएसएस की शाखा भी लगने लगी है. बहुत ख़ूब और जय हो !!

लेकिन समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेघ एकता की बात पर मि. मेघ मुझे गोली क्यों दे गए?  


Megh churn-1 - मेघ मथनी-1

Megh churn-2 - मेघ मथनी-2