Saturday, February 11, 2012

Ramchandra Mahajan Mahashay - महाशय रामचंद्र महाजन


अछूतों की दशा सुधारने के लिए आर्य भाइयों ने अपना तन, मन, धन बलिदान कर दिया. इसमें महाशय रामचन्द्र जी का स्थान सर्वोपरि है. उनका जन्म 1896 में कठुआ, कश्मीर में हुआ था. साधारण शिक्षा प्राप्त करके सरकारी सेवा में खजाँची के पद पर नियुक्त हुए थे. वे कट्टर आर्य समाजी थे और दलितोद्धार की उन्हें धुन लगी हुई थी. सन् 1923 में उनकी बदली अख़नूर में हो गई. वहाँ उन्होंने आर्य समाज का कार्य शुरू कर दिया. अख़नूर और उनके आसपास के पहाडी इलाकों में मेघों की अनेक बस्तियाँ थीं. उन्होंने एक कमरा किराए पर लेकर मेघों के लिए पाठशाला खोल दी. खजाँची के काम से जब फ़ुर्सत मिलती तो वे मेघों की उन्नति में लग जाते. आधी-आधी रात तक उनकी बस्तियों में घूमना, उन्हें पढ़ाना, रोगियों को दवा देना और उनके सुख-दुख में शामिल होना उनका रोज़ का काम था. 

महाशय जी का यह काम ऊँची जाति के हिन्दू नहीं सह सके. विशेषतः उन्हें मेघों की शिक्षा से सख्त ऐतराज़ था. परिणाम यह हुआ कि हिन्दुओं ने आर्य समाजियों से नाता तोड़ लिया. परेशान होकर कुछ आर्य समाजियों का विचार था की मेघों की पाठशालाएँ बस्तियों से दूर खोल दी जाएँ. परंतु महाशय रामचन्द्र इससे सहमत नहीं हुए. उनका कहना था कि कोई भी मनुष्य या जाति अछूत नहीं है. अतः मेघों के बच्चों को अछूत समझकर क्यों दूर किया जाए. उनके प्रयत्नों से मेघों की पाठशाला के लिए जमीन प्राप्त हो गई थी और उस पर स्कूल की इमारत बना ली गई. अख़नूर की पाठशाला की सफ़लता से आसपास की बस्तियों के मेघों में उत्साह का संचार हुआ और वे भी पाठशालाएँ खोलने के लिए प्रयत्न करने लगे.  

अखनूर से चार मील की दूरी पर बटोहड़ा की बस्ती है वहाँ के मेघों ने महाशय रामचन्द्र की सहायता से वहाँ पाठशाला शुरू कर ली. उन्हें देखकर राजपूत लोग भड़क उठे और उन्होंने लाठियाँ लेकर आर्यों पर हमला बोल दिया. परंतु महाशय रामचन्द्र जी इससे घबराए नहीं. उन्होंने वहाँ पर आर्य समाज स्थापित करके एक उपदेशक भी रख दिया. जम्मू से भी कुछ आर्य सज्जन बटोहड़ा आगए. वहाँ पर राजपूतों को भली-भाँति पता था कि जो भी अछूतोद्धार का कार्य वहाँ चल रहा है उसके पीछे महाशय रामचन्द्र का हाथ है. उन्होंने उसकी हत्या का षड्यंत्र रचा और डेढ़ सौ के लगभग व्यक्तियों ने भालों, लाठियों और बरछों से उन पर आक्रमण कर दिया. घायल दशा में उनको सरकारी अस्पताल में पहुँचाया गया. जहाँ 20/01/1923 को उनकी मृत्यु हो गई. महाशय रामचन्द्र जी जब तक जीवित रहे अछूतोद्धार के लिए जी जान से प्रयत्न करते रहे. और इसी के लिए उन्होंने अपने जीवन का बलिदान दे दिया. 

आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने लाहौर मेंरामचन्द्र स्मारकबनाया था. जहाँ हर वर्ष भारी मेला लगता था. (डॉ ध्यान सिंह के शोधग्रंथ से)

मेघों के लिए प्रसिद्ध था कि कैसा भी मामला हो, ये अदालत में नहीं जाते थे. लेकिन उक्त मामले में एक मेघ सज्जन श्री चाफ़्रू ने रामचंद्र की हत्या के चश्मदीद के तौर पर हत्यारे राजपूतों के विरुद्ध गवाही दी. यह उन दिनों बहुत महत्वपूर्ण था.