Wednesday, January 11, 2012

The Epic of Meghvansh-2 – मेघवंश का महाकाव्य-2


 









फरवरी 10, 2012 को गुजरात में मेघवार एक त्योहार मनाते हैं जो धणी मातंग देव जी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. मातंग शब्द का अर्थ मेघ है. इस अवसर पर वे 28 मेघों की पूजा करते हैं. यह जानकारी मुझे श्री नवीन भोइया से मिली जो अपने संगठन श्री अखिल कच्छ महेश्वरी विकास सेवा संघ के माध्यम से यह त्योहार इस बार बड़े स्तर पर मनाने की योजना बना रहे हैं.

उत्तर भारत में मेघों के पास मेघ ऋषि के जन्म दिवस की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. चूँकि धणी मातंग देव एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में साहित्य और लोक कथाओं में तारीखें उपलब्ध हैं अतः बहुत संभावना है कि उनके जन्मदिन का मेघ ऋषि के जन्मदिन से कोई परोक्ष संबंध हो. ऐसे में यदि विक्रमी संवत् की पहली तारीख को मेघऋषि का जन्मदिन मना लिया जाए तो असंगत नहीं होगा. मेघवंशी समुदाय इस पर विचार कर सकते हैं.  

एक बड़ी खबर नवीन जी ने बताई है कि वे मार्च 2012 में एक संगोष्ठी आयोजित करेंगे जिसमें ऐसे विद्वान आमंत्रित होंगे जिन्होंने मेघवारों के धर्म बारमती पंथ (जिसकी शिक्षा को जिनान (Ginan) कहा जाता है) पर शोध किया है. 4 विद्वान पीएचडी (डॉक्टरेट) डिग्री वाले हैं. एक फ्रेंच महिला (Francoise Mallison) शोधकर्ता को भी इस अवसर बुलाया गया है और उसने आने के लिए अपनी सहमति दे दी है. उम्मीद है कि इस आयोजन के दौरान मेघवंशियों के मूल धर्म पर प्रकाश डाला जाएगा जिसे मेघवारों ने सुरक्षित रखा है. क्योंकि मेघवंशी सिंधुघाटी सभ्यता से संबंधित हैं अतः धर्म के मूल में बौधधर्म के सिद्धांत मौजूद रहेंगे ही साथ ही प्रस्तुत किए जाने वाले शोध पत्रों से वे तथ्य सामने आने की संभावना है कि बारमती पंथ तक आते-आते उनमें किस प्रकार का विकासात्मक परिवर्तन हुआ है.

अपनी इंटरनेट यात्रा के दौरान मैंने जाना है कि मेघवार सिंधुघाटी से बिहार की ओर पलायन कर चुके मेघवंशी हैं जो बाद में क्षत्रिय जाति के रूप में गुजरात की ओर लौटे और बहुत बड़े क्षेत्र पर उन्होंने शासन किया. मातंग देव के जन्म दिवस पर वे जिन 28 मेघों की पूजा करते हैं संभव है कि वे मेघ सम्राट रहे हों या धार्मिक प्रमुख रहे हों या उनका राजा के रूप में ऐतिहासिक महत्व रहा हो जिसे आक्रमणकारी आर्य कबीलों ने इतिहास से हटा दिया लेकिन जिन्हें लोक परंपराओं के माध्यम से जनमानस ने याद रखा है.

आज मेरे समुदाय के लोग इस बात पर विश्वास नहीं कर पाते कि मेघ, मेघवाल और मेघवार वास्तव में मेघ ऋषि की ही संतानें हैं जिनका मूल एक है और जिनका गौरवशाली इतिहास रहा है. यद्यपि इतिहास नष्टप्रायः है तथापि उसकी कड़ियाँ जोड़ने का कार्य शोधार्थी कर रहे हैं भारत में भी और अमेरिका में भी. सिंधुघाटी सभ्यता की लिपि को अमेरिका में कंप्यूटर डिकोट करने में लगे हैं जो सिद्ध करेगा कि हम ऐसी सुशिक्षित सभ्यता से निकली जातियाँ हैं जिन्हें आक्रमणकारियों ने जबरन शिक्षा से दूर किया और आधुनिक इतिहास तक आते-आते उन्हें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों और अन्य पिछड़ी जातियों के रूप में एक योजना के तहत बाँट दिया ताकि हम आपस में एकता न कर सकें. परंतु समय आ रहा है कि इस ग़ुलामी की मानसिकता से निकल कर मेघवंशी आपस में राजनीतिक संपर्क बढ़ाएँगे.

नवीन भोइया जी ने आशा जताई है कि इस अवसर पर प्रस्तुत शोधग्रंथों को वे एक स्मारिका/पुस्तक रूप में छापेंगे. इससे मेघवंशियों के इतिहास में और पन्ने जुड़ेंगे.

Anjar

Anjar

Gandhidham

Gandhidham
कच्छ ज़िले के गाँधीधाम और अंजार ताल्लुका के अतिरिक्त भुज, मुंद्रा और मांडवी ताल्लुका और गाँवों में भी यह उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग भाग लेते हैं.

The Epic of Meghvansh-1

Tuesday, January 10, 2012

Why 'Bhargava Camp'? Why not 'Megh Nagar' - ‘भार्गव कैंप’ क्यों? ‘मेघ नगर’ क्यों नहीं?


संभव है कि यह संयोग मात्र हो कि स्यालकोट से आए मेघ भगतों को जालंधर (एक शूद्र ऋषि के नाम पर बने शहर) में बसाया गया. फिर जहाँ उनके लिए कच्ची बैरकें बनीं उस स्थान का नाम भार्गव कैंप, गाँधी कैंप आदि रखा गया. अब काफी वर्ष बीत चुके हैं और ये कैंप पूरी तरह से मेघों के साथ जुड़ गए हैं. भार्गव कैंप में कभी एक स्कूल खुला था जिसे आर्य समाज के नाम से खोला गया था. ज़ाहिर था कि इस स्कूल का नाम मेघ समुदाय के नाम से मेघ हाई स्कूल रखने में किसी की कोई रुचि नहीं थी.

देश को आज़ाद हुए 64 वर्ष से ऊपर हो चुके हैं. पंजाब में इतनी जनसंख्या होने के बावजूद मेघ भगतों के नाम से कोई स्थान नहीं है. ले दे के भगत बुड्डा मल के नाम से एक ग्राऊँड थी जहाँ शनि मंदिर बना दिया गया है.

क्या अब यह संभव है कि सभी वार्ड्स में हस्ताक्षर मुहिम चला कर भार्गव कैंप का नाम बदल कर मेघ नगर कराने के प्रयास किए जाएँ? इससे समुदाय को ज़बरदस्त पहचान मिलती है.


Sunday, January 8, 2012

Bhagat Mahasabha holds Satsang at Barjala, Satwari

Bhagat Mahasabha held a function at village Barjala, block Satwari to spread teachings of Sadguru Kabir Sahib ji among Megh Samaj. A large number of people gathered from the surrounding areas to listen Satsang and Kirtan by Swami Milkhi Ram Bhagat who told the masses about teachings of Kabir Sahib ji and advised them to walk on the path shown by the greatest saint of Bhakti movement in India. He cautioned Megh Samaj to remain vigilant from divisive forces which are trying to divide the community. After the Satsang, speeches were delivered by various leaders of the community and they raised long pending demand of Megh Samaj to declare gazetted holiday on the occasion of Kabir Jayanti. Mahasabha also announced that similar Satsang and Kirtan will be held at every block to aware the community. A Langar was also served to the people after the program. Prominent among them were Bodh Raj Bhagat, State President; Mahinder Bhagat, Tarsem Bhagat, Naresh Bhagat, Rakesh Bhagat, Sushil Bhagat, Satpal Bhagat, Ajay Bhagat,Raj Bhagat, Sarpanch Ashok Bhagat






Wednesday, January 4, 2012

Megh T-shirts

Can any Megh businessman give us T-shirts like that:-

क्या कोई मेघ व्यापारी हमें ऐसी टी-शर्ट्स दे सकता है.