Sunday, November 25, 2012

Elections held for All India Megh Sabha, Chandigarh - ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ के चुनाव संपन्न


आज दिनांक 25-11-2012 को ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ की आम सभा की बैठक अंबेडकर भवन, सैक्टर-37, चंडीगढ़ में आयोजित की गई. इस अवसर पर अगले सत्र हेतु विभिन्न पदों के लिए चुनाव कराए गए और अगले पाँच वर्ष के लिए निम्नलिखित को पदाधिकारी चुना गया. श्री इंद्रजीत मेघ को लगातार पाँचवें वर्ष के लिए निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया.

अध्यक्ष: श्री इंद्रजीत मेघ
वरिष्ठ उपाध्यक्ष: श्री दर्शन लाल रूजम
उपाध्यक्ष: श्री साधु राम भगत
महासचिव: श्री के.सी. भगत
संयुक्त सचिव: सरदार साध सिंह
वित्त सचिव: श्री बूटा राम
कानूनी सलाहकार: श्री आर.एस. साथी
मुख्य संपादक मेघ चेतना: श्री एन.सी. भगत

ऑल इंडिया मेघ सभा, चंडीगढ़ को सफल चुनावों के लिए और नई गवर्निंग बॉडी के लिए बधाई.

Today on dated 25.11.2012 a general body meeting of All India Megh Sabha, Chandigarh Has been held at Ambedkar Bhawan Sec 37, Chandigarh. An Election for various posts has been held and the Following are elected for next session. As President Sh. Inderjit Megh was nominated and elected un-opposed for consecutively for the 5th year.

President : Sh.Inderjit Megh
Sr.Vice President : Sh Darshan Lal Roojam
Vice President : Sh.Sadhu Ram Bhagat
General Secretary: Sh.K.C.Bhagat
Joint Secretary : S. Sadh Singh
Finance Secretary : Sh.Boota Ram
Legal Advisor : Sh.R.S.Saathi
Chief Editor Megh Chetna : Sh. N. C. Bhagat

Congratulations to AIMS, Chandigarh for the successful elections and the new governing body.

Thursday, November 15, 2012

BAMCEF-3 - बामसेफ-3


बामसेफ-बीएमएम चंडीगढ़ यूनिट की एक साप्ताहिक बैठक 04-11-2012 को अंबेडकर भवन, सैक्टर-37 ए, चंडीगढ़ में आयोजित हुई जिसमें भाग लेने का अवसर मिला. बामसेफ से मेरा संपर्क युवावस्था में हुआ था जब मैंने इसकी एक बैठक ए.जी. ऑफिस सैंक्टर-17 में देखी थी. बाद में माननीय काशीराम जी के देहत्याग के बाद बामसेफ काफी उतार-चढ़ाव में से गुज़री है. अब माननीय वामन मेश्राम के नेतृत्व में इसने काफी प्रगति की है और आरक्षण प्राप्त शूद्र और दलित कर्मचारियों के एक राष्ट्रव्यापी संगठन के रूप में जानी जाती है. बामसेफ दो समाचार पत्रों का प्रकाशन कर रही है. मूलनिवासी नायक जो दैनिक है और बहुजनों का बहुजन भारत जो साप्ताहिक है. इनका प्रकाशन लखनऊ और पुणे से हो रहा है.

प्रकाशनों से स्पष्ट होता है कि बामसेफ की एक सुस्पष्ट विचारधारा है जिसका वह प्रचार करती है और सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध है. इसके सामाजिक संगठन का नाम भारत मुक्ति मोर्चा है.




प्रतिभागी- (बैठे हुए बाएँ से) सुश्री संतोष, सर्वश्री दिलीप कुमार अंबेडकर, राजसिंह पारखी, हरिकृष्ण साप्ले, रामभूल सिंह, सतपाल, नंदलाल, अनिल यादव और जयप्रकाश,
(खड़े हुए) जेम्ज़ मसीह गिल, मनोज वर्मा, फूल सिंह, मल्लू राम, अयोध्या प्रसाद, कुलदीप माही, रामबहादुर पटेल और सुरेंद्र कुमार.


Thursday, October 25, 2012

BAMCEF-2 – बामसेफ-2



कल 21-10-2012 को बामसेफ चंडीगढ़ यूनिट ने कॉमनवेल्थ यूथ प्रोग्राम, एशिया सेंटर, सैक्टर-12 के हाल में एक दिवसीय इतिहासात्मक और विचारधारात्मक प्रशिक्षण काडर कैंप (Historical and Ideological Training Cadre Camp) का आयोजन किया. इसमें भाग लेने का मौका मिला. इस प्रशिक्षण कैंप में मुख्य प्रशिक्षक और वक्ता मान्यवर अशोक बशोत्रा, सीनियर एडवोकेट (Mr. Ashok Bashotra, Sr. AdvocateHigh Court J&K) थे जो जम्मू से पधारे थे.

उनके अभिभाषण में बहुत-सी जानकारी थी. जिसमें से मैं दो बातों का यहाँ विशेष उल्लेख करना चाहता हूँ:-

1. किसी भी मनुष्य के लिए तीन चीज़ें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं. 'ज्ञान'- जिससे मनुष्य अपने समग्र जीवन को बेहतर बनाता है, 'हथियार'- जिससे वह अपने प्राणों की रक्षा करता है और 'संपत्ति'- जो उसके जीवन को गुणवत्ता प्रदान करती है. मनुस्मृति के प्रावधानों के द्वारा देश के मूलनिवासियों (SC/ST/OBC) से यह तीनों अधिकार छीन लिए गए.

2. तक्षशिला, नालंदा, उज्जैन और विक्रमशिला उस समय (सम्राट अशोक से लेकर बृहद्रथ तक) के विश्व विख्यात विश्वविद्यालय थे. सोते हुए बृहद्रथ की हत्या पुष्यमित्र शुंग नामक ब्राह्मण ने कर दी और सत्ता संभालने के बाद मूलनिवासियों की महान परंपराओं को समाप्त करने करने के लिए उसने चारों विश्वविद्यालयों और वहाँ सुरक्षित साहित्य को नष्ट करने के आदेश दे दिए. डेढ़ माह तक विश्वविद्यालय जलते रहे. छह माह तक वहाँ के पुस्तकालयों को जलाया गया. साठ हज़ार बौध प्राध्यापकों की हत्या की गई जो वहाँ सुरक्षित विज्ञान, दर्शन, धर्म, इतिहास, साहित्य आदि के परमविद्वान थे.

यही कारण है कि कभी मातृत्वप्रधान समाज रहे भारत की स्त्री जाति, शूद्र और दलित अपने जिस इतिहास को ढूँढते फिरते हैं वह नहीं मिलता.










   


MEGHnet  

Saturday, October 20, 2012

Ravindranath Thakur belonged to Shudra caste – रवींद्रनाथ ठाकुर शूद्र जाति से थे


कुछ दिन पहले ही अपने एक ब्लॉग पर हरिचंद ठाकुर के मतुआ आंदोलन पर एक पोस्ट लिखी थी. हरिचंद ठाकुर की खोज करते हुए एक ऐसी जानकारी मिली जिसे देख कर मैं हैरान रह गया. मेरे लिए यह नई बात थी.

कई साल पहले पढ़ा था कि रवींद्रनाथ टैगोर को जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया था. लेकिन वहाँ उन्हें पीरल्ली ब्राह्मण लिखा गया था. लगा कि यह ब्राह्मणों का आपसी झगड़ा रहा होगा. रवींद्रनाथ टैगोर (ठाकुर) के परिवार ने आदि धर्म या ब्रह्मो/ब्रह्म समाज की स्थापना की थी. पीरल्ली ठाकुरों के इस परिवार में विवाह करने के लिए वहाँ का ब्राह्मण समाज तैयार नहीं था. अंततः देवेंद्रनाथ को अपने पुत्र रवींद्रनाथ टैगोर का विवाह अपने एक कर्मचारी की बेटी से करना पड़ा.

मुद्राराक्षस जैसे स्थापित हिंदी साहित्यकार ने बहुत स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है कि रवींद्र नाथ टैगोर दलित जाति से थे. इसे नीचे उल्लिखित उनके आलेख टैगोर साहित्य में जाति के सवाल में देखा जा सकता है. हालाँकि आज के संदर्भ में पीरल्लियों को दलित (आज के SCs/STs) लिखना शायद श्रेणी की दृष्टि से ठीक न हो, तथापि, वे निश्चित ही शूद्र जाति (जिसमें OBCs  आती हैं) से संबंधित थे जिन पर निम्नजाति होने का कलंक (stigma) लगा है और ब्राह्मण इन्हें चांडाल कहा करते हैं. पीरल्ली लोग स्वयं को ब्राह्मणों (विशेषकर बैनर्जी) से निकली शाखा मानते हैं. मतुआ आंदोलन पर जानकारी लेते हुए पढ़ा है कि पिछली बार सत्ता में आने से पूर्व ममता बैनर्जी ने स्वयं को मतुआ धर्म का बताया था जो पीरल्लियों का चलाया हुआ आंदोलन था. यह भी देखने योग्य है कि कुछ निम्नजातियाँ जैसे मेघ, मेघवाल, मेघवार आदि स्वयं को ब्राह्मणों से निकली शाखा मानती रहीं हैं.

रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य का नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय थे जिन्हें बहुत देर तक ब्राह्मण के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा. रवींद्रनाथ के कुछ पुरखों ने जातिगत भेदभाव से तंग आकर 151511111111151515पंद्रहवीं शताब्दी में इस्लाम अपना लिया था.

(कुछ स्पष्ट हो रहा है कि रवींद्रनाथ ठाकुर रचित जन-गण-मन के साथ बंकिमचंद्र चटर्जी लिखित वंदेमातरम् को नत्थी करने का कारण क्या रहा होगा.)

टैगोर के विषय में Wikipedia पर दिए ये दो आलेख पढ़े जा सकते हैं जो पर्याप्त रूप से स्पष्ट हैं. ये लिंक 20-10-2012 को देखे गए हैं.




निखिल चक्रवर्ती के लिखे एक बढ़िया आलेख का लिंक नीचे दिया गया है जिसके बारे में इतना ही कहना चाहूँगा कि यह एक ब्राह्मणिकल नज़रिए से लिखा गया है. बहुत से तथ्य दे दिए गए हैं लेकिन उनमें निहित जातिगत सच्चाई को स्पष्ट रूप से कह न पाने की मजबूरी-सी नज़र आती है. यह आलेख वास्तविकता के ऊपर मँडराता तो है लेकिन उस पर उतरता नहीं. Wikipedia में साफ़ जानकारी है कि रवींद्रनाथ टैगोर पीरल्ली जाति से थे. यह जाति stigmated थी. इस परिवार ने ऊँची जातियों की घृणा के डंक को सदियों सहन किया. टैगोर ने कहा है कि यदि दूसरा जन्म होता है तो वह बंगाली बन कर पैदा होना नहीं चाहेंगे. उनकी ऐसी कटुता का विश्लेषण करने की हिम्मत शायद कोई करे. यह आलेख कहता है कि टैगोर ने नमोशूद्रा जाति के एक सम्मेलन में भाग लिया था. पीरल्ली और नमोशूद्रा दोनों stigma युक्त जातियाँ हैं. टैगोर की जाति से संबंधित उस समय के इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम और तथ्यों को  बंगाली इतिहासकारों ने शायद शर्मिंदगी के कारण अपनी ही बग़ल में छिपाने की गंभीर कोशिश की है.





Sunday, October 14, 2012

Matua Movement - मतुआ आंदोलन





दिनांक 23-09-2012 को बामसेफ (मेश्राम) के एक दिवसीय कार्यक्रम के समय उनकी एक पत्रिका 
बहुजन भारत का मार्च 2012 का विशेषांक खरीद लाया था. 22वें बामसेफ और राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ के संयुक्त राष्ट्रीय अधिवेशन में विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तुत आलेखों का सार इसमें दिया गया है. यह अधिवेशन गुलबर्गा (कर्नाटक) में 24 दिसंबर से 28 दिसंबर 2011 तक आयोजित किया गया था.

उक्त पत्रिका से मतुआ धर्म (आंदोलन) की जानकारी मिली.

मतुआ आंदोलन

आज से 200 वर्ष पूर्व मतुआ धर्म की स्थापना नमोशूद्र हरिचंद (हरिचाँद) ने सन् 1812 में की थी. इस धार्मिक आंदोलन का एक ही संदेश था कि खुद खाओ या न खाओ, लेकिन बच्चों को शिक्षा दो. इस आंदोलन ने बंगाल में अपनी एक अलग परंपरा बनाई. जब ये लोग घरों से निकलते थे तो हाथों में क्रांति का प्रतीक लंबा लाल झंडा लेकर निकलते थे और साथ में डंका बजाते चलते थे. इनके डंके की आवाज़ से ब्राह्मण बहुत चिढ़ते थे.

हरिचंद का जन्म फरीदपुर नामक गाँव में हुआ था जो अब बंग्लादेश में है. उन्होंने लोगों को कबीर की भाँति समझाया कि वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों, पुराणों, गीता महाभारत, रामायण आदि ग्रंथों पर विश्वास न करना. अपनी बुद्धि और सोच-समझ से अपना रास्ता बनाना.

बंगाल की परंपरा के अनुसार हरिचंद-गुरुचंद (पिता-पुत्र) को सम्मानपूर्वक ठाकुर की उपाधि दी गई. यह उपाधि समाज हित में कार्य करने वालों को दी जाती है. (रवींद्रनाथ ठाकुर साहित्य का नोबल पुरस्कार पाने वाले भारत के प्रथम साहित्यकार थे और वे दलित जाति से थे. हरिचंद-गुरुचंद की भाँति वे भी पीरल्ली जाति के थे जो घृणा के निशाने पर रही है और उन्हें जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया था.)

हरिचंद-गुरुचंद नामक इन दोनों ठाकुरों ने बंगाल, बिहार, असम और ओडिशा में डेढ़ हज़ार प्राइमरी स्कूल खोल कर ब्राह्मणों को चुनौती दी. इसके बाद आठ से अधिक उच्च विद्यालय (हाई स्कूल) खोले गए. शिक्षा देने के साथ उन्होंने चांडाल आंदोलन, नील आंदोलन और भूमि आंदोलन का भी नेतृत्व किया. सन् 1865-66 में  हरिचंद ने ब्रिटिश को साथ लेकर ज़मींदारों के विरुद्ध भूमि आंदोलन किया था. इन आंदोलनों को ब्राह्मण इतिहासकारों ने इतिहास से दूर रखा. हरिचंद और गुरुचंद ने उन क्षेत्रों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध भी किसान आंदोलन चलाया जहाँ अंग्रेज़ किसानों को नील की खेती करने के लिए मजबूर करते थे जिससे उनकी ज़मीन तबाह हो जाती थी.

हरिचंद ठाकुर ने जब स्कूल बनवाए तब सबसे पहले उन्होंने गोशाला में पढ़ाने की व्यवस्था की. गाय चरने चली जातीं तो जगह को साफ करके स्कूल में परिवर्तित कर दिया जाता. उन्होंने 1500 से अधिक खोले.  हरिचंद के बाद इस कार्य का बीड़ा उनके सुपुत्र गुरुचंद ने उठाया. आश्चर्य की बात है कि शिक्षा के क्षेत्र में हुए इतने बड़े आंदोलन को पाठ्यक्रम में जगह नहीं दी गई.

महात्मा फुले और डॉ. अंबेडकर ने ब्राह्मणों द्वारा लक्षित स्वतंत्रता आंदोलन को मूलनिवासियों का स्वतंत्रता आंदोलन कभी नहीं माना. गुरुचंद का दृष्टिकोण भी यही था. एम. के. गाँधी ने सी.आर. दास को गुरुचाँद के पास संदेश भिजवाया था कि वे गाँधी द्वारा चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन में साथ दें. गुरुचंद ने उत्तर भिजवाया कि यह आंदोलन हमारा नहीं है. पहले अस्पृश्यता समाप्त करो फिर साथ आएँगे. सी.आर. दास को खाली हाथ लौटना पड़ा.

लगभग उसी समय आस्ट्रेलिया से ईसाई धर्म का प्रचारक फादर मीड भारत आया था. उसे जानकारी मिली कि ब्राह्मण धर्म (मनुवाद) के विरोध में गुरुचंद ठाकुर आंदोलन कर रहे हैं. फादर मीड ने गुरुचंद ठाकुर से संपर्क साधा. गुरुचंद ठाकुर इस बात पर दृढ़ रहे कि पहले दलितों की शिक्षा का प्रबंध किया जाए. बाद में लोग स्वयं निर्णय करेंगे की उन्हें क्या करना है. उनकी बात से प्रभावित हो कर फादर मीड गुरुचंद के आंदोलन से जुड़ गया.

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध खड़े हुए इस आंदोलन को ब्राह्मणों ने भक्ति आंदोलन का नाम दे दिया. आज बंगाल में हरिचंद-गुरुचंद के नाम पर हज़ारों संगठन हैं लेकिन वे नामों में बँटे हुए हैं. इस ठाकुर द्वय के सामाजिक आंदोलन को धर्म का रूप देकर ब्राह्मण उस पर काबिज़ हो गए और धर्म की दूकानें खोल ली. आगे चल कर ब्रह्मणों ने हरिचंद-गुरुचंद को भगवान घोषित करके मंदिरों ने बिठा दिया और उन्हें भगवान विश्वासी कह दिया. इस प्रकार आंदोलन के वास्तविक कार्य को धर्म का नाम दे कर वास्तविकता को पीछे रख दिया गया.
हरिचंद अनपढ़ अवश्य थे लेकिन अशिक्षित नहीं थे. उन्होंने हरिलीलामृत नामक ग्रंथ की रचना करके उसे प्रकाशित कराया. मतुआ धर्म और बौध धर्म का दर्शन एक ही है. मतुआ आंदोलन को नमोशूद्र आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है. अपने शुद्ध स्वरूप में यह भारत के मूलनिवासियों का स्वतंत्रता आंदोलन रहा.

ऐसा माना जाता है कि यह हरिचंद-गुरुचंद के आंदोलन का ही प्रभाव था कि उस बंग्लाभाषी क्षेत्र में योगेंद्रनाथ मंडल और मुकुंद बिहारी मलिक ने अपूर्व त्याग करके डॉ. भीमराव अंबेडकर को अविभाजित बंगाल से चुनाव जितवा कर संविधान सभा में भेजा था जबकि वे महाराष्ट्र से चुनाव हार चुके थे.

इतिहास के हाशिए से बाहर रखा गया मतुआ आंदोलन अपनी सही पहचान के साथ लौट आया है.

बंगाल में मतुआ धर्म मानने वालों की संख्या 1.2 करोड़ है जबकि देश भर में इनकी संख्या 4 करोड़ के लगभग है.

(Note: यह आलेख बामसेफ की उक्त पत्रिका में छपे सर्वमान्यवर जगदीश राय, शैलेन गोस्वामी, के.एल.विश्वास, ए.टी. बाला और शरद चंद्र राय के आलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा गया है.)


मतुआ आंदोलन से संबंधित अन्य उपयोगी लिंक-





Megh Bhagat

Friday, October 12, 2012

Why there is no unity in Meghs-3 - मेघों में एकता क्यों नहीं होती-3



मेघों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनके समुदाय का अपना कोई एक धर्म नहीं है. वे इधर-उधर धार्मिक सहारा ढूँढते-ढूँढते विभिन्न धर्मों में बँट गए. 

सामाजिक संघर्ष के लिए न उनके पास पर्याप्त शिक्षा है, न एकता और न ही इच्छा शक्ति. संघर्ष के रास्ते पर दो कदम चलते ही उन्हें निराशा घेरने लगती है और ईश्वर की याद सताने लगती है. वे नहीं जानते कि ईश्वर नाम के आइडिया का प्रयोग बिरादरी के विकास के लिए कैसे किया जाता है.

मेघ समुदाय के लोग एक धर्म के अनुयायी नहीं बन सके. जिसने जिधर आकर्षित किया उधर हो लिए. उनमें एकाधिक धर्मों के प्रति झुकाव पैदा हो गया. धर्म (अच्छे गुण) व्यक्ति की नितांत अपनी चीज़ होती है. लेकिन एक आम पढ़ा-लिखा मेघ पता नहीं क्यों अपने बाहरी धर्म और इष्ट के प्रति अत्यधिक मोह में फँस जाता है. अपने गुरु को सबसे ऊपर मानता है और बाकी गुरुओं और उनके चेलों को आधे-अधूरे ज्ञान वाला मानता है. एक तरह से वह खुद को सर्वश्रेष्ठ समझता है और अन्य के साथ मिल कर चलने में उसे कठिनाई होती है. 

यही बात राजनीतिक दलों के मामले में भी लागू होती है. मेघ किसी के हो गए तो हो गए. कुछ कांग्रेस से चिपट गए तो कुछ बीजेपी से लिपट गए. बिरादरी में एकता और राजनीतिक जागरूकता की कमी है.

सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष का रास्ता सब के साथ मिल कर चलने वाला होता है, अन्यथा इस बात का डर रहता है कि संघर्ष में लगी मानव शक्ति और उसकी भावना कहीं बिखर न जाए. शिक्षित समुदायों के लोग राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए धर्म, गोत्र, गुरु, देवी-देवता, माता, आदि को भुला कर अपने संसाधन लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास में झोंक देते हैं. वे जानते हैं कि सांसारिक प्रगति के लिए जो कार्य राजनीति कर सकती है वह ईश्वर भी नहीं कर सकता. इस दृष्टि से मेघ समुदाय को अभी बहुत कुछ सीखना है.

पिछले दिनों मेघों की संगठनात्मक गतिविधियाँ बढ़ी हैं जो एक अच्छा संकेत दे गई हैं.

सामाजिक और धार्मिक क्रांति के बाद ही राजनीतिक क्रांति आती है.- डॉ. अंबेडकर

Monday, October 8, 2012

Ekta Parishad leads Indian aboriginals to Delhi– एकता परिषद के नेतृत्व में आदिवासियों का दिल्ली कूच - 2012



भारत के आदिवासियों/मूलनिवासियों का इस देश की ज़मीन पर अधिकार सदियों से क्रमवार तरीके से समाप्त कर दिया गया है. आज भी उनके जंगलजल और ज़मीन पर कोई भी ठेकेदार अधिकार जमा लेता है. ठेकेदार को पुलिसनौकरशाही और मीडिया का और कई अन्य एजेंसियों समर्थन मिल जाता है. आदिवासियों की ग़रीबी दूर न होने का यही मुख्य कारण है. सरकार पूरी तरह से गंभीर नहीं है कि इन मूलनिवासियों के अधिकारों की रक्षा न्यायपूर्वक की जाए. दशाब्दियों से वह अपनी मजबूरियाँ गिनवाती आ रही है. इस बीच नक्सलवाद बढ़ा है.


अब देश भर के आदिवासियों ने एकता परिषद के झंडे तले ग्वालियर से दिल्ली की ओर कूच किया है जिसने भारत सरकार को परेशानी में डाल दिया है. आगे चल कर यह परेशानी बढ़ सकती है. इस कूच का नेतृत्व पी.वी. राजगोपाल कर रहे हैं. अच्छी बात यह है कि यह आंदोलन नक्सली हिंसा जैसे तत्त्व से मुक्त है.






Sunday, September 30, 2012

Dalit Media-2 - दलित मीडिया-2


देश की दलित (संघर्षशील) जातियाँ बहुत समय से इस प्रतीक्षा में हैं कि देश में उनका अपना मीडिया हो जो दलितों की बात करे और उनका पक्ष सच्चाई के साथ रखे. दलित मीडिया अब स्वरूप ग्रहण करने लगा है.

दलित साहित्य अकादमियों के रूप में कई जगह कार्य हुआ है. दलितों के पक्ष को  शिद्दत से रखने वालों में एक पत्रकार वी. टी. राजशेखर शेट्टी (V.T. Rajshekhar) हैं. उनका कुछ साहित्य मैंने पढ़ा है. वे एक पत्रिका और Dalit Voice नाम की वेबसाइट चलाते रहे हैं जिसे काफी पढ़ा जाता रहा है. कुछ देर से वह दिख नहीं रही है. सुना था कि राजशेखर का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था. आपका आभार राजशेखर जी. आपकी कुर्बानी का मूल्यांकन आगे चल कर होगा.

इन दिनों लॉर्ड बुद्धा टीवी नामक चैनल शुरू हुआ है जो डॉ. अंबेडकर की शिक्षाओं से प्रेरित है.

इधर कई दलित समुदायों ने अपने प्रकाशन निकाले हैं. मेघ समुदायों ने इस दिशा में कार्य किया है जिसे मैंने यहाँ और यहाँ संजोया है. कितने प्रकाशन धन की कमी के कारण बंद हो गए इसका हिसाब हो सकता है. इस दृष्टि से मुझे लगता है कि न्यूज़ लेटर और इश्तेहार बेहतर विकल्प हैं जो सस्ते पड़ते हैं जिन्हें आगे चल कर पुस्तक रूप में छापा जा सकता है.
बामसेफ के एक कार्यक्रम के दौरान एक पत्रिका देखी Forward. इसका फरवरी 2012 का अंक अभी हाल ही में देखा है. इसमें दिए आलेख ओबीसी का पक्ष सामने रखते हैं साथ ही दलितों के संदर्भ में राजनीति संतुलनों का नाप-तौल भी करते हैं. इसमें ओबीसी के लिए एक जीवन-दर्शन विकसित करने का प्रयास है जो बहुत महत्वपूर्ण है. यदि आप फेसबुक पर लॉगइन करके बैठे हैं तो इसे यहाँ देख सकते हैं.

इन दिनों मेरी नज़र से महत्वपूर्ण कार्य बामसेफ (मेश्राम) कर रहा है इसका मिशन बहुत बड़ा है. मेरे लिए नई जानकारी थी कि बामसेफ लखनऊ से हिंदी में और पुणे से मराठी में अपना दैनिक समाचार-पत्र निकालता है. आवधिक पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की जा रही हैं. एक प्रकाशन से पता चला है कि उन्होंने बहुत-सी उपयोगी पुस्तकों का प्रकाशन किया है जो सस्ती दरों पर उपलब्ध है. इनकी उपलब्धता के बारे में आप निम्नलिखित पतों से जानकारी ले सकते हैं. (इन चित्रों पर क्लिक कीजिए और स्पष्ट पढ़ पाएँगे.)