Wednesday, January 26, 2011

Republic Day - गणतंत्र दिवस


(यह पोस्ट मेघवाल यूथ पॉवर से ली गई है.
यह बहुत अच्छी और सकारात्मक पोस्ट
है जिसे मुकेश मेघवाल ने लिखा है)
 
में अपने गणतंत्र से कई शिकायतें हैं. मसलन, हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है. गरीबी और गैर-बराबरी है. देश की एक बहुत बड़ी आबादी की बुनियादी जरूरतें आज भी पूरी नहीं की जा सकी हैं. ये सारी बातें अपनी जगह वाजिब हैं. लेकिन अगर हम अपने नजरिए को थोड़ा फैलाएं, सारी दुनिया पर गौर करें और उन मुश्किल हालात को याद करें, जहां से हमने यात्रा शुरू की थी, तो शायद हमें खुद को उतना कोसने की जरूरत महसूस नहीं होगी.

गर हम याद करें कि आज जिन बहुत-सी बातों को हम तयशुदा मानते हैं, वो 1947 में उतनी निश्चित नहीं थीं. मसलन, भारत अपनी एकता और अखंडता को कायम रख सकेगा, यहां एक स्थिर व्यवस्था बन सकेगी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का पूरी दुनिया के लिए एक मॉडल तैयार हो सकेगा, इन सबका तब सिर्फ सपना ही देखा जा सकता था. लेकिन आज ये सब हमारे सामने साकार रूप में मौजूद हैं. इस गणतंत्र के पूर्वजों ने जिस वैज्ञानिक और आर्थिक संरचना की नींव डाली, उसकी बदौलत भारत आज दुनिया की एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है.

जाहिर है, समस्याएं अभी और भी हैं. बल्कि गंभीर समस्याएं हैं. कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनसे अक्सर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है. लेकिन यहां गौर करने की बात यह है कि इनमें से बहुत-सी समस्याएं हमारी पुरातन व्यवस्था और लंबी गुलामी का परिणाम हैं. इनका संबंध हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक विकासक्रम के स्तर से है.

दुनिया का कोई समाज इस संदर्भ से कटकर विकास नहीं कर पाया है. हम भी अपनी समस्याओं से उलझते हुए उनका समाधान ढूंढ़ने और प्रगति एवं विकास का रास्ता बनाने की जद्दोजहद में हैं और कामयाबी भी पा रहे हैं. इसलिए शिकायतें अपनी जगह भले सही हों, लेकिन खुद और अपने गणतंत्र पर गर्व करने की भी हमारे पास पर्याप्त वजहें हैं.

Wish you happy republic day.

Thursday, January 20, 2011

Bhagat Mahasabha Punjab unit holds meeting at Jugyal


Sh. Girdhari Lal addressing the meeting
A meeting of Bhagat Mahasabha Punjab unit was held at Jugyal in premises of Saint Ravidass Gurdwara. In addition to members many government employees participated in the meeting. It was unanimously decided that next meeting will be called very soon and everybody attending the meeting shall bring aloong 5 to 10 more members. Total 50 members attended the meeting.

सहभागियों का समूह
 Sh. Girdhari Lal form Pathankot, Tarachand from J&K and Pritam Bhagat from Sarna were present in the meeting. Other members present were Hans Raj, Bakshi Ram, Tarsem Lal, Satish Kumar, Joginder Paul, Tarlok singh, Sewa Ram, Guran Ditta, Vishav Bhagat, Savinder Kumar, Hari Ram, Sharma Ram Bhagat, Parvodh Kumar, Sohan Lal, Romesh Kumar, Dev Raj, Sewa Ram, Nand Lal, Sweg Singh, Gopal Dass, Revail Chand, Capt. Ram Chand, Sham Lal, Sukhdev, Ramesh Lal, Sukhdev Kumar, Dr.Sushil Kumar, Jagdish Raj.

Friday, January 14, 2011

A feast for Megh Bhagwan - मेघ भगवान को बड़ा भोग लगाया जाएगा

 
निर्णय लिया गया है कि 15 जनवरी 2011 को अपराह्न 01.30 से 05.00 तक भगवान मेघ को बाबा रामदेव मंदिर, अंबावाड़ी, जयपुर में मेघ महोत्सव के दौरान हलवे का बड़ा भोग लगाया जाए. इस उत्सव के माध्यम से मेघवाल और अन्य मेघवंशी मेघ भगवान का संदेश देश-विदेश में फैलाएँगे और समस्त मेघवंशियों को यह उत्सव मनाने के लिए प्रेरित करेंगे ताकि अपने अतीत को जाना जाए, वर्तमान को बनाने का संकल्प लिया जाए और सुनहरे भविष्य की नींव डाली जाए. इस प्रकार मेघवंशियों की अपनी प्राचीन संस्कृति के गौरव और स्वाभिमान को देश-दुनिया में प्रचारित और स्थापित किया जाएगा.

Tuesday, January 11, 2011

R.L. Gottra (आर.एल. गोत्रा) - Our Knowledge Bank


R.L. Gottra
Mr. Rattan Lal Gottra was born on 3rd April 1942 in village Bonkan, District Sialkot (now in Pakistan). His father was Sh. Banshi Ram and mother’s name was Smt. Indira Devi. He did his Inter in 1963 and graduation in the year 1968. In between he served in the Office of Accountant General, Punjab at Shimla. In 1969 he joined Intelligence Bureau as Assistant Central Intelligence Officer. He was engaged in social service though in a low profile. He voluntarily retired as Deputy Intelligence Officer in  March, 2008 and was engaged in business for some time. His article ‘History of MEGHS’ has attracted many inquisitive and curious Meghs to know their origins.

Linked to MEGHnet

Young R.L. Gottra

ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਮਹਾਸਭਾ ਦਾ ਕਾਰਵਾਂ ਅੱਗੇ ਤੁਰਯਾ



ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਮੇਘਵੰਸ਼ ਮਹਾਸਭਾ, ਦਿੱਲੀ ਦਾ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਸੇਮਿਨਾਰ 26 ਦਿਸੰਬਰ 2010 ਨੂੰ ਮੇਘਗੰਗਾ ਸਮੁਦਾਇਕ ਭਵਨ, ਬਨੀਪਾਰਕ, ਜੈਪੁਰ ਵਿੱਚ ਸੰਪੰਨ ਹੋਇਆ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਰਾਜਸਥਾਨ ਦੇ ਅਨੇਕ ਜਿਲਿਆਂ ਤੋਂ ਸੈਂਕੜਿਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਕਰਮਚਾਰੀ ਪਹੁੰਚੇ. ਗੁਜਰਾਤ, ਮਧੱਪ੍ਰਦੇਸ਼, ਮਹਾਰਾਸ਼ਟਰ, ਜੰਮੂ-ਕਸ਼ਮੀਰ, ਪੰਜਾਬ, ਹਰਿਆਣਾ ਆਦਿ ਪ੍ਰਾਂਤਾਂ ਤੋਂ ਵੀ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਲੋਕ ਆਏ. ਸੇਮਿਨਾਰ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮਹਿਮਾਨ ਡਾ. ਯੋਗਿੰਦਰ ਮਕਵਾਨਾ (ਪੂਰਵ ਕੇਂਦਰੀ ਮੰਤਰੀ) ਅਤੇ ਸਭਾਪਤੀ ਸ਼੍ਰੀ ਕੈਲਾਸ਼ ਮੇਘਵਾਲ (ਪੂਰਵ ਕੇਂਦਰੀ ਮੰਤਰੀ) ਸਨ. ਮਹਾਸਭਾ ਦੇ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਗੋਪਾਲ ਡੇਨਵਾਲ ਨੇ ਫਤਹਿ ਦੀ ਪ੍ਰਤੀਕ ਤਲਵਾਰ ਸ਼੍ਰੀ ਕੈਲਾਸ਼ ਮੇਘਵਾਲ ਨੂੰ ਭੇਂਟ ਕੀਤੀ.












ਇਸ ਸਭਾ ਨੂੰ ਪੂਰਵ ਸੰਸਦ ਸ਼੍ਰੀਮਤੀ ਜਮਨਾ ਬਾਰੂਪਾਲ ਅਤੇ ਆਰ. ਪੀ ਸਿੰਘ, ਗਿਰਧਾਰੀ ਲਾਲ ਕਟਾਰਿਆ, ਦਿਨੇਸ਼ ਸਾਂਡਿਲਾ ਦੇ ਇਲਾਵਾ ਹੋਰ ਪ੍ਰਤਿਨਿਧਿਆਂ ਨੇ ਵੀ ਸੰਬੋਧਿਤ ਕੀਤਾ. ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸੰਗਠਨ ਉੱਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ. ਸਰਵ ਮੇਘਵੰਸ਼ੀ ਸਮਾਜ ਨੇ ਸ਼੍ਰੀ ਡੇਨਵਾਲ ਨੂੰ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਪ੍ਰਧਾਨ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤਾ. ਇਸ ਮੌਕੇ ਉੱਤੇ ਇੱਕ ਨਵੇਂ ਸਮਾਚਾਰ-ਪੱਤਰ ਦਰਦ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਦਾ ਵਿਮੋਚਨ ਵੀ ਕੀਤਾ ਗਿਆ.

Girdhari Lal Bhagat, R.P. Singh and Pritam Bhagat

राष्ट्रीय मेघवंश महासभा, दिल्ली का एक विशाल सेमिनार 26 दिसंबर 2010 को मेघगंगा सामुदायिक भवन, बनीपार्क, जयपुर में संपन्न हुआ जिसमें राजस्थान के अनेक जिलों से सैंकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता पहुँचे. गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा  आदि प्रांतों से भी बड़ी संख्या में लोग आए. सेमिनार के मुख्य अतिथि डॉ. योगेंद्र मकवाना (पूर्व केंद्रीय मंत्री) तथा सभापति श्री कैलाश मेघवाल ((पूर्व केंद्रीय मंत्री) थे. महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल डेनवाल ने विजय की प्रतीक तलवार श्री कैलाश मेघवाल को भेंट की.

इस सभा को पूर्व सांसद सुश्री जमना बारूपाल, सर्वश्री आर.पी सिंह, गिरधारी लाल कटारिया, दिनेश सांडिला के अतिरिक्त अन्य प्रतिनिधियों ने भी संबोधित किया. शिक्षा और संगठन पर जोर दिया गया. सर्व मेघवंशी समाज ने श्री डेनवाल को राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वीकार किया. इस अवसर पर एक नए समाचार-पत्र 'दर्द की आवाज़' का विमोचन भी किया गया.

Sunday, January 2, 2011

Bhagat Mahasabha organizes Satsang

 
Sunday, 2 January, 2011, 12:10 PM: A Satsang was held today at Kabir Mandir old Rehari, Jammu by Bhagat Mahasabha in which hundreds of people of Megh Samaj from whole Jammu province participated. Bhajans and Sabad Kirtan about the teachings of Sadguru Kabir Saheb Ji was sung by Milkhi Ram Bhagat of Gorda. Milkhi Ram Bhagat, Chairman while speaking on the occasion appealed to the Megh Samaj to get united and follow the teachings of Sadguru Kabir Saheb Ji. He further said that backwardness and disunity of Megh Samaj is because of selfishness, ego, illiteracy and not following the teachings of Sadguru Kabir Saheb Ji. He further said that it is duty of whole Megh Samaj to contribute in his mission to unite Megh Samaj & cautioned Megh Samaj to remain vigilant against divisive forces who are working against the interest of the community. In the end, everyone pledged to free Megh Samaj from social evils like drinking alcohol, smoking, dowry, etc. and to work hard to spread education among Megh Samaj. A ten member Satsang and Langar (kitchen) Management Committee was also formed which will manage all affairs of monthly Satsang to be held on every first Sunday of month at Sabha. Those among prominent were Dr. Rajesh Bhagat, Er. Sudesh, Er.Jai, Mahinder Bhagat, Tara Chand Bhagat, Girdhari Lal, Swarn Lal, Sansar Bhagat, Sewa Ram, Rattan Lal, Ram Lal, Satya Devi and Chanchla Bhagat.
Media coverage at: http://www.earlytimes.in/newsdet.aspx?q=65729

भारत छोड़ो आन्दोलन : कर्नल तिलक राज



अगर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने पलटें तो दो बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ाव नज़र आते हैं. पहला था 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और दूसरा उन्नीस सौ ब्यालीस का भारत छोड़ो आन्दोलन. पहला असफल रहा परन्तु दूसरा सफल.

जो लोग कुर्बानी देना नहीं जानते वे आज़ाद नहीं हो सकते. 09 अगस्त, उन्नीस सौ ब्यालीस को शुरू हुए आन्दोलन के मूल में भी यही भावना काम कर रही थी. गांधी जी वैसे तो अहिंसावादी थे मगर देश को आज़ाद करवाने के लिए उन्होंने ''करो या मरो'' का मूल मंत्र दिया. अंग्रेजी शासकों की दमनकारी, आर्थिक लूट-खसूट, विस्तारवादी एवं नस्लवादी नीतियों के खिलाफ उन्होंने लोगों को लामबंद करने के लिए ''भारत छोड़ो आन्दोलन'' छेड़ा.

गांधी जी ने कहा था कि ''एक देश तब तक आज़ाद नहीं हो सकता जब तक कि उसमें रहने वाले लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते.'' उनके इन शब्दों ने लोगों पर जादू-सा असर डाला और वे नये जोश, नये साहस, नये संकल्प, नई आस्था, दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. देश के कोने-कोने में ''करो या मरो'' की आवाज  गूंजने लगी.

दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश फौजों की दक्षिण पूर्व एशिया में हार पर हार होने लगी. जापान द्वारा भारत पर हमला लगभग निश्चित था और मित्र देश-अमेरिका, रूस व चीन-ब्रिटेन पर दबाव डाल रहे थे कि इस संकट की घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन हासिल करने की पहल करे. इसी मकसद के लिए उन्होंने स्टेफोर्ड क्रिप्स को मार्च, 1942 को भारत भेजा. ब्रिटेन सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं थी. भारत की सुरक्षा अपने हाथ रखना चाहती थी और गवर्नर जनरल के वीटो के अधिकार को भी पहले जैसा ही. इसी लिए भारतीय प्रतिनिधियों ने क्रिप्स के सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया.

क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद भारतीय नेशनल कांग्रेस कमेटी की बैठक  आठ अगस्त, 1942 को बम्बई में हुई. फैसले किए गये कि अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही होगा. भारत अपनी सुरक्षा ख़ुद करेगा और सभी प्रकार के साम्राज्यवाद और फासीवाद का विरोध करेगा. अंग्रेजों के भारत छोड़ने पर अस्थाई सरकार स्थापित होगी. ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सिविल अवज्ञा आन्दोलन छेड़ा जाएगा और उसके नेता गांधीजी होंगे.

गांधीजी ने बहुत ही सुनियोजित ढंग से इस आन्दोलन को चलाने की रूप रेखा तैयार की. उन्होंने कहा, ''हम या तो भारत को आज़ाद करवाएंगे या इस कोशिश में मिट जाएंगे.''

विदेशी सरकार न तो कांग्रेस से समझौता करना चाहती थी और न ही  उसने आन्दोलन के विधिवत आरम्भ होने की प्रतीक्षा की. 09 अगस्त, 1942 की सुबह होने से पहले ही कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को कैद कर के उन्हें अनजान स्थानों पर ले जाया गया. फलस्वरूप ''भारत छोड़ो''आन्दोलन की बागडोर नौजवानों और उग्रवादी देशभक्तों के हाथों में आ गई. जनता ने पब्लिक स्थानों पर नेशनल झण्डे को जबरदस्ती फहराया. पुलों को उड़ा दिया, रेल की पटरियां उखाड़ दीं और अन्य सरकारी प्रतीकों को नुकसान पहुंचाया. समानांतर सरकारें बलिया, तामलुक, सतारा आदि में स्थापित की गईं. इस आन्दोलन में नौजवानों, मजदूरों, किसानों, सरकारी कर्मचारियों, नारियों, क्रांतिकारियों और साम्यवादियों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया. सरकार ने जनता पर बहुत ज़ुल्म ढाया. लोगों पर लाठियां, अश्रुगैस और गोलियां बरसाई गईं. दस हज़ार लोग शहीद हुए.

गांधीजी हज़ारों निशस्त्र और बेगुनाह लोगों की निर्मम हत्या के विरोध में मरणव्रत पर बैठ गए. नतीजा यह हुआ कि देश और विदेश में ब्रिटेन सरकार की बहुत निन्दा हुई. वायसराय कौंसिल के तीन सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिए.

''भारत छोड़ो आन्दोलन'' एक ऐसा आंदोलन था जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी. जनता का मनोबल बढ़ा और सरकार की दमनकारी एवं दोगली नीतियों का पर्दाफाश हो गया. इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव इन्डियन नेशनल आर्मी की स्थापना में तेजी लाना था जिसके फलस्वरूप जनरल मोहन सिंह की कमाण्ड में सितम्बर, 1942 में 16300 युद्धबंदियों के साथ एक फौजी डिविज़न का गठन किया गया. जनरल मोहन सिंह का लक्ष्य दो लाख युद्धबंदियों से इण्डियन नेशनल आर्मी का निर्माण करना था परन्तु जापानियों से गंभीर मतभेद होने के कारण यह संभव न हो सका. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के सिंगापुर पहुंचने पर उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया के भारतवासियों अैर  आईएनए को लेकर अंतरिम सरकार बनाई जिसे मित्र देशों ने शीघ्र ही मान्यता प्रदान कर दी. नेताजी ने अपने ऐतिहासिक उद्‌बोधन में कहा था- ''तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा.'' इन शब्दों ने जवानों में नया जोश भर दिया और वे सभी बाधाओं को रौंदते हुए आगे बढ़ते गए, आगे बढ़ते गए. उन्हें न परिवारों की चिन्ता थी न मौत का डर. उनका बस एक ही मकसद था- आज़ादी को हासिल करना. यह सब देख कर अंग्रेजों ने अपना बोरिया बिस्तरा गोल करना ही बेहतर समझा.

आज ''भारत छोड़ो आन्दोलन'' दिवस है. उत्सव, खुशी और उल्लास का दिन. उन शहीदों को याद करने का दिन, जिनकी बदौलत आज हम आज़ाद हैं. उन्होंने हंसते-हंसते अपना सब कुछ हमारे लिए कुर्बान कर दिया. उनके कुछ सपने थे पर वे अभी भी अधूरे हैं. हम अभी तक उनके सपनों के उस सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ढांचे का निर्माण नहीं कर पाए जहां सभी को निःशुल्क शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, इंसाफ और आगे बढ़ने के समान अवसर मिल सकें. उनके ख़्याल में पूर्ण आज़ादी का अर्थ सिर्फ़ अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा प्राप्त करना ही नहीं बल्कि हर प्रकार की दिमागी गुलामी से भी मुक्ति प्राप्त करना था. क्या हम यह सब कर पाए? शायद नहीं. आइये, उनकी बेमिसाल कुर्बानियों से प्रेरणा लें और अपने आपको उनके स्वप्नों को साकार करने में लगा दें. यही आज के दिन उनको सही श्रद्धांजलि होगी.

शहीदों को सलाम, शहीदों को सलाम, शहीदों को सलाम. जय हिंद.


जैसा मैंने जाना-भारत छोड़ो आन्दोलन
आकाशवाणी वार्ता, दिनांक 09 अगस्त , 2010 समय 11 बजे प्रसारित
वार्ताकार- कर्नल तिलक राज, चीफ़ पोस्टमास्टर जनरल (रिटायर्ड), पंजाब.