Wednesday, December 28, 2011

The first Megh - आदि मेघ



बड़ा देखने के लिए इस चित्र पर क्लिक कीजिए.



Monday, December 26, 2011

International Meghvansh Council

We feel glad to announce through prominent Press Club of Jaipur that after our decades endevour and consultation with each other we have become able to announce the formation and establishment of and International Meghvansh Council. Shri Gopal Denwal, National President, Rastriya Meghvance Mahasabha (India) would be the president and Arjun Das Advocate, Chairman Pakistan Mehwar Council would be the Secretary General of this council.

Shri Denwal and Arjundas further stated that there are about 20% Meghwancies in India who are living miserable lives, as such about 2 million Meghvansh are residing in Pakistan, so as about 15-16 lac Meghvansh in Bangladesh, 10-11lac in Nepal, 8-9 lac in Bhutan and in lacs in no. Meghvansh people are residing in various countries of this world, who being not in touch and contacts with each other are living two miserable and pitiable lives.

Today it is known to all, if any Sikh person would feel himself uneasy. The entire Sikh community throughout world would raise their voice in his support till the relief is provided to him. So we would like to bring our Meghvansh people of this world under a united shade of International Meghvansh Council. They further stated that this council would take efforts for the safe guard of fundamental rights of Meghvansh people, so also the council would work for getting redressal of atrocities confronting to Meghvansh people throughout the countries where ever they are putting up, through U.N.O.

The IMC Secretary General Arjundas Advocated has stated that he has come here to invite the Bhartiya Meghvansh Mahasabha to come Pakistan and now we have decided to arrange a seminar of International Meghvansh Council in Pakistan with mutual efforts, for which we have made our contacts with the organizations of Meghvansh people working in the numerous countries of this world.

(Arjun Das, Advocate)
Secretary General
International Meghvansh Council
(This information is via Face Book)

Sunday, December 18, 2011

I dream of Megh University - मैं मेघ विश्वविद्यालय का सपना देखता हूँ


सपना देखना सभी का अधिकार है. इसकी अहमियत समय-समय पर संतों ने और मैनेजमेंट गुरुओं ने बताई है. मन की कार्यप्रणाली का यह ऐसा रहस्य है कि कई लोगों ने सपना दिखाने को एक व्यवसाय के तौर पर अपनाया है. इनमें समझदार ज्योतिषी भी शामिल हैं और साहित्यकार भी. पिछले दिनों डेविड श्वार्ट्स की लिखी एक पुस्तक देखी जिसका शीर्षक था बड़ी सोच का बड़ा जादू (The Magic of Thinking Big). यह पुस्तक दुनिया के best sellers में से एक है. पन्ने उलटे-पलटे. कुल मिला कर यह सपने जगाने वाली किताब लगी. प्रभाव प्रभाव दिखने लगा. सपने जगने लगे.

तुरत मन में विचार आया कि मुझे एक सामाजिक संस्था ने मेघ-भवन का सपना दिखाया था. मेरी ख़्याली उड़ान कभी-कभी मेघ-भवन से भी आगे जाकर मेघ इंजीनियरिंग कालेज, मेघ मेडिकल कालेज, मेघ फार्मास्युटिकल्स तक जाती थी. अब मेघ यूनिवर्सिटी का सपना भी देखने लगा हूँ. यूनिवर्सिटी एक विद्यामंदिर है जिसकी अहमियत है. उसके साथ एक और सपना जुड़ रहा है एक कमर्शियल बैंक का दि मेघ बैंक. एक मेघ नगर भी तो हो सकता है जिसमें सभी समुदायों के लोग प्रेमपूर्वक रहते हों.

मन है कि रुकने का नाम नहीं लेता. एक वास्तविक सा थ्री-डी सपना देखता हूँ - हजार एकड़ में फैले कबीर मंदिर का और हजार एकड़ में फैले मेघऋषि (वृत्र) महामंदिर का जहाँ प्रतिवर्ष मेघ-महाकुंभ का भव्य मेला लगता है. सभी मेघवंशी प्रकाश में धुले से यहाँ आते हैं जिनमें एकता है और सर्वसाधन संपन्न हैं. ऐसे सपने बहुत से हैं और भी आ रहे हैं.....

क्या आप भी ऐसे सपने देखते हैं? आज से ज़रूर देखें. विश्वास कीजिए उन पर कार्य भी होने लगेगा.
Megh University!!!!!


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MEGHnet

Friday, December 16, 2011

Meghvahan - A link to ancient times


Meghwahan, the Genius

During this period Kalhana wrote the third book of Rajtarangani in which he has made a reference to the wisdom of king Meghwahan. Meghwahan was born in Gandhar. Gandhar, at that time, was an important centre of Buddhism. Buddhism had spread upto Afghanistan and Turkey because of the efforts of Kanishka. Thus Meghwahan started a strange campaign for the spread of Buddhism which in the history of the world is novel and incomparable. He decided to ban human killings in the entire world (Rajtarangani -3/27). After banning killing of animals in Kashmir he went towards the south upto Sri Lanka to make this prohibitive order effective. Meghwahan camped on the southern bank of the sea. One aborigin (Shabr) was keen to perform human sacrifice. That time Meghwahan offered himself for the sacrifice and this had caused a major transformation in the mind of the aborigine who gave up indulging in human sacrifices. (Rajtarangani-3/57). He had offered his body for sacrifice to make sincere efforts to save the life of a Brahmin boy. (Rajtarangani-3/78). The king had alienated even the demons from the acts of violence. The king got issued a proclamation not only in Kashmir but in the whole of India that whosoever he may be, living beings are not meant for killing or sacrifice. (Rajtarangani-3/88).

The wife of Meghwahan, Amritprabha, was the daughter of king of Assam. That time Assam and Bengal were under the influence of Vaishnavism. Therefore, the advent of this sect in Kashmir was the result of efforts of Amritprabha. This faith could not become as influential as Shaivism. There was no conflict or differences between it and Shaivism or Buddhism. Amritprabha had built Amrit Bhawan named monestery for providing comfort and facilities to Buddhist monks. It was called Yukaang Vihar. The flagstaff of the flag that would be hoisted on the palace was gifted to king Meghwahan by the king of Sri Lanka. It is an example of unity in India from the Himalayas to the distant south. 

This article is part of this link: 
Kashmir's Mighty Tradition

Thursday, December 15, 2011

Political notes of 80 years old Virumal - 80 वर्षीय वीरूमल जी के राजनीतिक नोट्स

(यहाँ जो लिखा गया है वह श्री वीरूमल, पीसीएस (सेवानिवृत्त) के मेघ राजनीति के बारे में विचार हैं. श्री वीरूमल आज भी सरकारी कार्यालयों में आरक्षण नीति के विशेषज्ञ माने जाते हैं और इसी क्षेत्र में सक्रिय हैं. ये मेघ समुदाय से हैं लेकिन सरकारी नौकरी के समय से ही इनका दायरा चमार समुदाय में रहा है. उनके ये विचार scribbling के रूप में मिले हैं. उनकी भाषा का हिंदीकरण किया गया है.)

 
ऐतिहासिक दृष्टि से मेघों, कबीरपंथियों की अपनी कोई पॉवरफुल सामाजिक लॉबी कभी भी नहीं रही है, चाहे वे किसी भी धर्म या मत के क्यों न हों. पॉवर फुल लॉबी के लिए एक धर्म का होना सकारात्मक तत्त्व होता है. यदि ऐसा न हो तो इसका एक ही हल समझ में आता है कि अपने ऑरिजिन को आधार बनाया जाए. देश के कई समुदाय मेघ भगत, मेघवाल आदि मेघ ऋषि में अपना मूल देखते हैं तो उसी आधार पर एकता का प्रयास करना चाहिए.

अपने निजी विकास के लिए सहारा लेने हेतु हम इधर-उधर के कई (धर्मों में) गए हैं. सिखों ने हमें अपनी ओर खींचा, आर्यसमाज ने अपनी ओर खींचा. ऐसा वे अपनी संख्या बढ़ाने के लिए करते हैं. इनकी नीति एक ही रहती है कि ग़रीब का पेट न भूखा अच्छा - न भरा अच्छा. इनका प्रयास यही रहता है कि दलितों को दे चाहे दो लेकिन इतना नहीं कि ये कभी बड़ा हिस्सा माँगने लगें. ऐसी स्थिति में आप किसी को भी मानें लेकिन अपने ऑरिजिन के नाम पर एक हो जाएँ. ऑरिजिन के नाम पर किसी संगठन का अस्तित्व में आ जाना महत्वपूर्ण हो जाता है.

हमारी वर्तमान हालत ऐसी है कि हम स्वयं स्वतंत्र रूप से आगे नहीं बढ़ सकते. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को भी अन्य समुदायों को साथ लेना पड़ा है. उसने बीजेपी के साथ मिल कर दो बार कोलिशन सरकार बनाई है. उसके पास पैसे की कमी थी लेकिन फिर भी स्वयं सरकार बनाई. आज उसके पास, जैसे भी आया हो, पैसा है. उसे अन्य समुदायों, विशेष कर दलितों, के साथ मिल कर कार्य करना होगा. कमज़ोर व्यक्ति को उठने के लिए किसी अन्य का सहारा लेना पड़ता है. इसी प्रकार से अपने हित को साधना होगा.

कई लोग कहते हैं कि सरकारें दलितों को हड्डी से अधिक कुछ नहीं देतीं. मेरा कहना है कि यदि कोई सरकार हड्डी देती है तो थोड़ा आगे बढ़ कर माँस भी पकड़ो. इस दृष्टि से चमार समुदाय से बहुत कुछ सीखना होगा. उनसे सहयोग लेना होगा और उन्हें सहयोग देना भी होगा. वे अब काफी संगठित हो चुके हैं.

Political ambitions of Meghs - मेघों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा


पंजाब में विधान सभा के चुनाव फरवरी 2012 में होने जा रहे हैं. सुना है कि इस बार कम-से-कम 10 मेघ भगत किसी पार्टी की ओर से या स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में खड़े हो सकते हैं. देखना है कि हमारी तैयारी कितनी है.

शुद्धीकरण की प्रक्रिया से गुजरने के बाद सन् 1910 तक मेघों में जैसे ही अत्मविश्वास जगा तुरत ही उनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो गई.  इसे लेकर अन्य समुदाय चौकन्ने हो गए. अपने हाथ में आई सत्ता को कोई किसी दूसरे को थाली में नहीं परोसता कि 'आइये हुजूर मंत्रालय हाज़िर है'. तब से लेकर आज तक  वह महत्वाकांक्षा ज्यों की त्यों है लेकिन समुदाय में राजनीतिक एकता का कहीं अता-पता नहीं. 
भारत विभाजन के बाद मेघ भगतों का  कांग्रेस की झोली में गिरना स्वाभाविक था. अन्य कोई पार्टी थी ही नहीं. फिर आपातकाल के बाद जनता पार्टी का बोलबाला हुआ. जालन्धर से श्री रोशन लाल को जनता पार्टी का टिकट मिला. पूरे देश में जनता पार्टी को अभूतपूर्व जीत मिली. लेकिन भार्गव नगर से जनता पार्टी हार गई. देसराज की 75 वर्षीय माँ ने हलधर पर मोहर लगाई, विजय के 80 वर्षीय पिता ने हलधर पर ठप्पा लगाया. ये दोनों छोटे दूकानदार थे. लेकिन इस चुनाव क्षेत्र से दर्शन सिंह के.पी. (के.पी. = (शायद) कबीर पंथी) चुनाव जीत गया. राजनीतिक शिक्षा के अभाव में मेघ भगतों के वोट बँट गए.
फिर भगत चूनी लाल (वर्तमान में पंजाब विधान सभा के डिप्टी स्पीकर) यहाँ से दो बार बीजेपी के टिकट से जीते. लेकिन समुदाय के लोगों को हमेशा शिकायत रही कि इन्होंने बिरादरी के लिए उतना कार्य नहीं किया जितना ये कर सकते थे. कहते हैं कि नेता आसानी से समुदाय से ऊपर उठ जाते हैं और फिर 'अपनों' की ओर मुड़ कर नहीं देखते. यहाँ एक विशेष टिप्पणी आवश्यक है कि यदि कोई नेता विधान सभा का सदस्य बन जाता है तो वह किसी समुदाय/बिरादरी विशेष का नहीं रह जाता. वह सारे चुनाव क्षेत्र का होता है. दूसरी वस्तुस्थिति यह है कि हमारे नेताओं की बात संबंधित पार्टी की हाई कमान अधिक सुनती नहीं है. मेघ भगत ज़रा सोचें कि वे कितनी बार अपने नेताओं के साथ सड़कों पर उतरे हैं, कितनी बार उन्होंने अपनी माँगों की लड़ाई लड़ते हुए हाईवे को जाम किया है या अपने नेता के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन किया है. इसके उत्तर से ही उनके नेता और उसके समर्थकों की शक्ति का अनुमान लगाया जाएगा.

सी.पी.आई. के टिकट से जीते एक मेघ भगत चौधरी नत्थूराम मलौट से पंजाब विधान सभा में दो बार चुन कर आए. इन्हीं के पिता श्री दाना राम तीन बार सीपीआई की टिकट से जीत कर विधानसभा में आए हैं. पता नहीं उनके बारे में कितने लोग जानते हैं.

सत्ता में भागीदारी का सपना 1910 में हमारे पुरखों ने देखा था. वे मज़बूत थे. इस बीच क्या हमें अधिक मज़बूत नहीं होना चाहिए था? सोचें. 'एकता ही शक्ति है' की समझ जितनी जल्दी आ जाए उतना अच्छा. एकता की कमी और राजनीतिक पिछड़ेपन का हमेशा का साथ है.

राजनीतिक पार्टी कोई भी हो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. सब का चेहरा एक जैसा होता है. महत्वपूर्ण है कि मेघ समाज आपस में जुड़ने की आदत डाले. आपस में जुड़ गए तो स्वतंत्र उम्मीदवार को भी जिता सकते हैं. यही बात है जो बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ नहीं चाहतीं. इस हालत में आपको क्या करना चाहिए?


मेघो कर लो एका, भगतो कर लो एका.


     

Saturday, December 3, 2011

History of Megh Bhagats - मेघ भगतों का इतिहास - Dr. Dhian Singh

Emergence and Evolution of Kabir Panth in Punjab
पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास

Are you searching for history/known history of Megh Bhagats? 
Yes, this thesis of Dr Dhian Singh can
guide you through

An enthusiastic young man Mr. Dhian Singh from Kapurthala (Punjab), pioneered research on history of Megh Bhagat community in the backdrop of emergence and evolution of Kabir Panth in Punjab. This was very important from the point of view that his work helps in reconstruction of history of Dalit communities which has been destroyed and corrupted. Researcher Dr. Dhian Singh and director of this research work Dr. Seva Singh have, within the limitations, put in tireless efforts using research methodologies while pursuing intensive study, visits and interviews. Use of libraries for research work is a common thing. Dr. Dhian Singh undertook intensive touring of Jammu-Kashmir, Punjab, Haryana and Rajasthan at his own expense. His hard work together with diligence of his Director helped his thesis through for Ph.D degree in the year 2008.

For the past two years I had been requesting Dr. Singh to help  make his thesis on line for the benefit of others. Now on 08-02-2011 he gave me his thesis which was scanned and blogged. It is in the form of PDF file. To make it easy to read please press ‘ctrl’ and +.

I hope that, now, the desire of Meghs will be satiated with regard to their eternal questions as to who they are, who were their ancestors and what they used to do.

This thesis will help change the conventional thinking of Megh community which has been divided in so many names and religions that their social and political integration seems to be a distant dream. This thesis will help the community grow a sense of unity.

Finally big thanks to you Dr. Seva Singhji and Dr. Dhian Singhji. You have done a work of great importance. 


कपूरथला (पंजाब) के एक उत्साही युवक ध्यान सिंह ने पंजाब ने कबीर पंथ के उद्भव और विकास की पृष्ठभूमि में मेघ भगत समुदाय के इतिहास पर शोध करने का बीड़ा उठाया था. यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण इसलिए था कि जिन दलित समुदायों का इतिहास नष्ट-भ्रष्ट किया जा चुका हो उनका इतिहास कैसे लिखा जाए. शोध के लिए पुस्तकालयों का उपयोग करना एक सामान्य बात है. शोधछात्र के तौर पर ध्यान सिंह ने और उनके निर्देशक डॉ सेवा सिंह, डी.लिट्. ने शोध सामग्री को देखते हुए विचार-विमर्ष के बाद मान्य पद्धतियों (methodologies) की सीमाओं में रहते हुए गहन अध्ययन के अतिरिक्त यात्रा और साक्षात्कार का सहारा लेने का निर्णय लिया. ध्यान सिंह जी ने इसके लिए जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के दौरे किए. उनके परिश्रम और निर्देशक के मार्गदर्शन से कार्य बखूबी हुआ और शोधग्रंथ वर्ष 2008 में पी.एच.डी. की डिग्री के लिए स्वीकार कर लिया गया. यह अपनी तरह का पहला कार्य है.

मैं दो-एक वर्ष से डॉ ध्यान सिंह से आग्रह कर रहा था कि वे अपने शोधग्रंथ को अन्य के लाभ के लिए ऑन-लाइन करें. अब 08-02-2011 को उन्होंने यह शोधग्रंथ मुझे सौंपा और मैंने उसकी स्कैनिंग कराने के बाद उसे एक ब्लॉग का रूप दे दिया.

मुझे आशा है कि अब हमारे मेघ भाइयों की यह जिज्ञासा शांत हो जाएगी कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और हमारे पुरखे क्या करते थे.

सब से बढ़ कर यह शोधग्रंथ मेघ भगत समुदाय की पारंपरिक सोच को बदलने में सहायक होगा जिसे इतने नामों और धर्मों में बाँट दिया गया है कि उनमें सामाजिक और राजनीतिक एकता दूर का सपना लगती है. इसे पढ़ने के बाद इस समुदाय में एकता की भावना बढ़ेगी.

अंत में डॉ ध्यान सिंह और डॉ सेवा सिंह जी को कोटिशः धन्यवाद. आपने बहुत महत् कार्य को संपन्न किया है. यह शोधग्रंथ सात पीडीएफ फाइलों के रूप में नीचे दिया गया है. इन पर क्लिक करें और पढ़ें. फाइल खोलने के बाद स्क्रीन पर बड़ा पढ़ने के लिए ctrl और + को दबाएँ. पीडीएफ फाइल पर भी ऊपर दाएँ हाथ (+) और (-) के चिह्न हैं उनका भी प्रयोग किया जा सकता है. यह पीडीएफ़ फाइल एक बार खोलने से न खुले तो दूसरी बार क्लिक कर के खोलें. 

पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास

Part-7






Key words: History of Meghs, History of Megh Bhagats, History of Kabir Panthis, Pujnabi Kabir Panthis, Megh Bhagat, Thesis, मेघ भगत, शोधग्रंथ,  


Thursday, December 1, 2011

Megh Mahakumbh organized - मेघ महाकुंभ का आयोजन


मेघ न्यूज़ के साभार 

बुधवार, ३० नवम्बर २०११


मेघ महाकुंभ में किया मेघवंशियों से एकजुट होने का आह्वान


छोटी चौपड़ से निकला मेघसेना का फ्लैग मार्च

Source: dainik bhaskar,jaipur   |
date 17:56(27/11/11)
जयपुर।


महाकुंभ के मौके पर सुबह छोटी चौपड़ से मेघसेना की ओर से फ्लैग मार्च निकला। इस दौरान पूरा वातावरण मेघवंश के जयघोष से गूंज उठा। बड़ी संख्या में समाज के लोग जो मेघवंश की बात करेगा, वही देश में राज करेगा...जैसे नारे लगाते हुए रवाना हुए।
वहीं पोस्टर-बैनर लिए समाजबंधु संजय सर्किल, संसार चंद्र रोड, भगवानदास रोड, बाईस गोदाम होकर अमरूदों का बाग पहुंचे। इस बीच जगह-जगह पुष्पवर्षा कर जोरदार स्वागत किया गया।

फिर महाकुंभ शुरू हुआ। इसमें मेघवंश समाज के बिखरे हुए विभिन्न वर्गों से एकजुट होने का आह्वान किया गया। इसके साथ ही सरकार से मेघवंश कल्याण बोर्ड बनाने, अनुसूचित जाति व के आरक्षण में 16 से 17 प्रतिशत बढ़ाने, बुनकर वित्त व सहकारी निगम बनाकर अनुसूचित जाति का अध्यक्ष बनाए जाने सहित 11 सूत्री मांगे रखी गई।

यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ.योगेंद्र मकवाना ने महाकुंभ का उद्घाटन किया। अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय मंत्री कैलाश मेघवाल ने की। इस अवसर राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल डेनवाल सहित कई पदाधिकारी मौजूद थे।

link- http://www.bhaskar.com/article/c-10-1354299-2596900.html

Tuesday, November 22, 2011

You did it rightly Mayawati


यू.पी. के बँटवारे का आइडिया पुराना नहीं है. महीने भर पहले मीडिया ने स्टंटी खबर निकाली कि चुनाव से पहले मायावती यू.पी. के चार अलग-अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव ला सकती है. लेकिन मीडिया को पता नहीं था कि उसका लगाया गया राजनीतिक क़यास माया के हाथ में इतनी जल्दी राजनीतिक हथियार बन जाएगा है. और माया ने कर दिया. मीडिया (इसके आक़ा) तड़प उठे. माया के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए काफी पैसा मीडिया ने/मीडिया में झोंका. मीडिया को बार-बार फोन करके उसे अइडियाज़ दे रहे घरानों में अफ़सोस की लहर है. ख़ैर यह राजनीति है और माया मज़बूत है.

प्रस्तावित विभाजन को मैं एक और कोण से भी देखता हूँ. पूर्वांचल में खास बात न होती तो मोती लाल नेहरू का परिवार कश्मीर से आकर इस अति पिछड़े क्षेत्र में क्यों बसता. यह क्षेत्र ब्राह्मणों की राजनीति का केंद्र रहा है और इस उद्देश्य से वहाँ पैसे और माफ़िया शक्ति की कमी कभी नहीं रही. बुंदेलखंड में ऐसी कौन-सी बात है कि बीजेपी इसके गठन से पहले ही विरोध में उतर आई है. यहाँ पिछड़ों के वोट काफी अधिक हैं. अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में ऐसी कौन-सी कमी है जो समाजवादी पार्टी को मंज़ूर नहीं. इनमें माया का प्रभाव अधिक पड़ा है. फिलहाल राजनीतिक दलों की परेशानी यह है कि यू.पी. का विभाजन यदि हो गया तो उत्तर भारत के चार राज्यों में उन्हें बीएसपी का सामना करना पड़ेगा जिन्होंने वृहत्तर यू.पी. के तौर पर माया का शासन देखा है.

इसी लिए केंद्र में कांग्रेस या बीजेपी की सरकारें इस प्रस्ताव को जल्दी से पास करने वाली नहीं हैं. तथापि इससे मायावती को राजनीतिक लाभ अवश्य होगा.

Thursday, November 17, 2011

Megh Mahakumbh organized - मेघ महाकुंभ का आयोजन

राजस्थान में श्री गोपाल डेनवाल, एक सशक्त सामाजिक कार्यकर्ता और श्री आर.पी. सिंह, (पुस्तक 'मेघवंश : एक सिंहावलोकन' के लेखक) के नेतृत्व में दिनाँक 27 नवंबर, 2011 को जयपुर में मेघ महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है. इसमें देश भर से मेघवंशियों के प्रतिनिधि भाग लेंगे. इस अवसर पर बहुत ही सुंदर मेघ भगवान की आरती भी प्रचारित करने की संभावना है. इसकी एक फाइल श्री आर.पी. सिंह ने भेजी है जिसे आपके साथ शेयर कर रहा हूँ. इसका लिंक नीचे दिया गया है. आप इसे डाऊनलोड करके सुन सकते हैं.

मेघ आरती


Wednesday, July 6, 2011

Bhagat Gopi Chand

                                                                                                                                                              Linked to MEGHnet


Bhagat Gopi Chand
BHAGAT GOPI CHAND


Bhagat Gopi Chand was born in village Poth, Sialkot now in Pakistan. He was self made man as he hailed from a poor family. He was one of the very few educated person of the Megh Samaj. With his self determination and commitment to the cause of upliftment of Megh community he became one of the pioneering figures in the entire Megh Samaj. He always propagated for the spread of education among the children of Megh families as he was of the staunch review that only through education, the standard of living of Megh Samaj can be raised. He heavily stressed on the point that Meghs should not consider themselves as downtrodden or lower strata of people. He was of the strong opinion that Meghs should develop self confidence and treat themselves as equal to highest hierarchy in the caste system.

Bhagat Gopi Chand was exemplary figure in Megh Samaj who set examples for others to follow. This made the people of Megh Samaj to follow him and seek his advice on political, economic and social issues. The guidance and advice provided by Bhagat Gopi Chand stood in good stead in the lives of those Megh who sought guidance and as much more and more people liked him and bestowed confidence in him.

In the pre-independence era Meghs were mostly dependent on daily earnings. So Bhagat Gopi Chand felt that the standard of living of Megh Samaj can be raised if they join government services. At that time Army service was the main and biggest service. But Meghs were not being recruited in the army as they were considered coward and weak by the Britishers. But he took up with the British authorities in the army and made representations and took Megh delegation to the authorities. He argued with British army authorities emphatically stating that Meghs are very strong at heart and body and are best suited to army service. It was after repeated delegations that British army accepted the arguments of Bhagat Gopi Chand and started allowing recruitment of Meghs in the army, though at the lower level. He was also recruited in the army as a test case.

Bhagat Gopi Chand was brave and courageous man. To prove that Meghs were also strong and fit for army service, he performed his duties boldly and won the hearts of his army officers. During World War II he was assigned the duty along with a unit of the army at the North West Provincial area. They were at high altitude. At might thunder storm hit the area with heavy rain and cold. The captain ordered the entire company to retreat to the base camp. But Bhagat Gopi Chand refused to obey the orders stating that he would remain there to protect the heavy ammunition the company had stored. The captain threatened to refer him for court marshal if he (Bhagat Gopi Chand) did not retreat along with rest of the company. But Bhagat Gopi Chand did not budge. Next day the captain complained to his next officer for court marshal. As the weather had calm down, the officer wished to personally impact. The officer along with the reached the place where the company was posted on the previous might. The officer saw that Bhagat Gopi Chand was lying cold and fatigued. The officer highly appreciated the courage of Bhagat Gopi Chand and instead of court-marshalling him he recommended for award of “Muraba” (a large area of cultivable land). Thereafter, Bhagat Gopi Chand never looked back and continued his struggle for the cause of Megh community.

When the British Government allowed home-rule for India, Bhagat Gopi Chand contested the election for MLA. The biggest drawback in Megh community was and is also existing in the present time is that there is lack of oneness in the community and there are elements who always try to pull the legs of the person who attempt to rise. This very negatively in the Megh community played its role then and Bhagat Gopi Chand lost the election. This did not deter Bhagat Gopi Chand to fight for the upliftment of Megh community.

In 1947 when India got independence and was divided into Pakistan and India, Bhagat Gopi Chand played a major role in saving the lives of the people belonging to Megh community. During partition Muslim organizations were bent upon annihilating the Hindus from the soil of Pakistan. So they started wide spread killing of Hindus in all the cities and villages of Pakistan. Even the women children were not spared. Young Hindu women forced to convert to Islam and those who refused were subjected to torture and humiliation of worst type. Their private parts of body were cut after tearing their dignity.

Bhagat Gopi Chand was highly aggrieved when he heard of killing of Meghs and their women and children by Muslims. He thought of an idea to save the lives of Meghs. He met leaders of Muslim organization and told them that Meghs are not Hindus and therefore, their lives should be spared. This idea struck and the Muslim organization agreed. Bhagat Gopi Chand then distributed black bandsamong the Meghs and told them to bind the same around their arms. The Muslims stopped killing Meghs who wore black band on their arms. By this way Bhagat Gopi Chand succeeded in saving the lives of Meghs. Thereafter he planned as to how Meghs could be brought safely by train from Pakistan to India. He got distributed black bands among the Meghs to be worn by them on their arms. He sent messengers to different villages to tell them to pack up the luggages at night and be ready be picked up, in the morning, by trucks which he got arranged. He also sent his younger brother Sh. Ram Chand as a messenger for the purpose. But when Sh. Ram Chand was returning at night after visiting one village, he was spotted some Muslim group who chased him and killed him mercilessly. Even this loss of brother could not dampen the spirit of Bhagat Gopi Chand. He tied up with the railways and got one train stationed at the railway station. All the Meghs who were brought from various villages by trucks boarded the train. Majority of passengers of this train were Meghs and the army contingent escorted the train. The train stopped at each railway station, on its way, and carried the Meghs waiting at the station. This train was perhaps the only train which completed its voyage from Pakistan toIndia safely without even a single person having killed by Muslims throughout the journey. Bhagat Gopi Chand got arranged settlement of Meghs at various settlement colonies in tents initially.

Bhagat Gopi Chand did not feel content with this rather he was always brooding over how to settle Megh families in respectable settlements and provide them with permanent source of earnings. He took up the case of Meghs refugees with the Indian government. On the basis of his past record, he was given the charge of rehabilitation of refugees by appointing in the Rehabilitation Department of Government of India. He then availed this opportunity effectively. He urged the Megh families who were living in tents under unhygienic and poor living condition to come to Alwar District of Rajasthan where they were to be allotted cultivableland for permanent and respectful rehabilitation. A large number of Megh families were taken to Alwar District free and were allotted cultivated land in the villages as ‘pucca pattas’ to be the owners of cultivable land allotted to them without charging even a single paisa. Many of the ignorant families opposed this move of Bhagat Gopi Chand and charged him for uprooting them from then tented settlements. They even abusive songs derogatory to Bhagat Gopi Chand. One line of a song was “…..Alwar jaan waalio bera rur jaye Gopi da….” This also did not dampen the spirit of Bhagat Gopi Chand and he continued with the rehabilitation scheme because he knew that Meghs were ignorant. With the passage of time the Megh families who settled in villages of Alwar District and other adjoining areas started getting the taste of fruit of that rehabilitation. They became self dependent could earn lot of money from cultivation of their own land. They could meet all the requirement of their families and could still save money for future. They used to recollect the time when they were living in tents in Punjab and were struggle daily for work to earn enough to both ends meet. In Rajasthan villages they felt proud to be owner of cultivable land. Now they have become rich and many families feel proud to be called as Jats. They have forgotten their past but still remember Bhagat Gopi Chand for the good he had done for them and showering lot of praise on him treating him as Messiah for them.

However, Bhagat Gopi Chand did not forget the Megh families who opt to remain back in tented accommodation. He saw men struggling for daily work and their women folk work in fields of others, he then concentrated on them. At that time government and private jobs were rare and while Meghs were mostly illiterate, it was all the more difficult to look jobs them. He then approached the Military establishment at Jalandhar and requested the authorities to provide the Meghs with unskilled, semi-skilled jobs in the establishment. The authorities agreed and recruited some Megh males on unskilled jobs to be trained for skilled jobs as well. Meanwhile he put the case before the government to provide alternative and better accommodation other than tents as the Meghs were leading miserable life in tents. After lapse of sometime the government provided kucha houses called barracks to Meghs.

During the fight for the cause ofMeghs, Bhagat Gopi Chand remained mostly in the transit and therefore could not devote his time to his family at Jalandhar. Even the work of admission of his children in the schools was done by his devout followers. After completing the work of rehabilitation of Meghs and subsequent retirement that he started living with his family at Jalandhar. Then he guided his children for proper education.

A man who spent his hectic life could not remain idle for long. Bhagat Gopi Chand started serving on small honorarium in Gulab Devi, T B Hospital at Jalandhar. There also he helped patients of Megh Community to get free treatment from the hospital. While serving in the T B Hospital, he also got infection. He was brought to Delhi, by his son, and got him admitted in a renowned T B Hospital. After treatment for a few months, he was discharged from the hospital with the direction to take medicine regularly for another year and then he returned to Jalandhar. But ill luck would have been he did not take care to take medicine regularly and also did not take precaution as advised by the doctor and left for heavenly abode on 14th Oct 1979. Thus the era of Bhagat Gopi Chand came to an end, but not before giving honorable life to the people of Megh Samaj. He has left the world but not the hearts of Meghs who will always feel indebted to him for what he has done for them.
Sh. Mohinder Paul
Contributed by: Mohinder Paul (son), Neha Bhagat (grand daughter) and

 Shashank Bhagat (grand son)



विशेष टिप्पणी :-
कुछ समय पूर्व भगत बुड्डामल ग्राऊँड में शनि सहित कई देवी-देवताओं का मंदिर बना दिया गया है. यह सोचने की बात है कि किसी मेघ भगत के नाम से पंजाब में इस प्रकार की यह एकमात्र ग्राऊंड है. माना कि यह सरकारी जगह है लेकिन इसका उपयोग पार्क की तरह ही होना चाहिए. बेहतर होगा कि शनि मंदिर को कहीं और शिफ्ट किया जाए. 
सोचने की बात है कि आपको 'आर्य समाज स्कूल' सुनने में अच्छा लगता है कि 'मेघ हाई स्कूल'. ऐसे ही सोच लें कि 'भगत बुड़्डामल ग्राऊँड' सुनने में अच्छा लगता है या 'शनि मंदिर ग्राऊँड'. यदि मेघ भगत समुदाय या उसके किसी सदस्य के नाम पर कोई स्थल या शिक्षण संस्थान बने तो उससे समुदाय की छवि बेहतर बनती है. विचार करें.

अलवर में मेघों की रीसेटेलमेंट संबंधी अधिक जानकारी के लिए कृपया यह लिंक क्लिक करें :-

Monday, May 9, 2011

Now mainly on MEGHnet

I started blogging on Megh Bhagat on June 10, 2010 and then wrote first post on  MEGHnet on July 3, 2010. Nirat was started on August 30, 2010. Then few more blogs I created and deleted after some time. Blogging is an addiction that increases with a variety of subjects. Creating a blog for the categorization of subjects is good and many famous Bloggers of the world have taken the same route.

Meanwhile, I noticed that my blog Beyond Spiritualism was read by people abroad. For Dr. Dhian Singh's thesis on Kabirpanthis I created a separate blog. Then came few readers with a big bang and with high speed writing. I had to create discussion pages (blogs) for them and also make a discussion group which has a growing membership now.

But the overall experience is that, in a way, it all got scattered.

Now onwards I shall mainly write on MEGHnet. I shall also continue to write Megh Bhagat for the mission it was created.
 
 

मैंने 10 जून 2010 को Megh Bhagat पर ब्लॉगिंग शुरू की थी और 03 जुलाई 2010 को MEGHnet पर पहली पोस्ट डाली. 30 अगस्त 2010 को निरत लिखना शुरू किया. उसके बाद कुछ ब्लॉग बनाए और कुछ देर के बाद मिटाए. ब्लॉगिंग एक नशा है जिसे विषयों की विविधता और बढ़ाती रहती है. विषयों के श्रेणीकरण के लिए अधिक ब्लॉग बनाना अच्छा है. विश्वप्रसिद्ध कई बलॉगरों ने यही रास्ता अपनाया है.

ब्लॉग Beyond Spiritualism को विदेशों में देखा गया. डॉ. ध्यान सिंह के कबीरपंथियों पर लिखे शोधग्रंथ के लिए मैंने एक अलग ब्लॉग बना दिया. कुछ पाठकों की रफ़्तार बहुत तेज़ थी उनके लिए डिस्कशन पेज (ब्लॉग) अलग बनाने पड़े. एक डिस्कशन ग्रुप भी बनाया जिसकी सदस्यता बढ़ रही है.

लेकिन कुल मिला कर अनुभव ने यह था कि यह सब काफी बिखर-सा गया था.

अब मैं मुख्यतः मेघनेट पर लिखूँगा. एक मिशन के साथ शुरू किया गया था इसलिए मेघ भगत पर लिखना जारी रखूँगा.




Monday, April 4, 2011

Kabir Nirvan Divas

Bhagat Mahasabha J&K Unit is celebrating Kabir Nirvan Divas at various places in J&K state. Today (03-04-2011) it was held at Machine Domana Jammu. 

Famous singer Ashukoti gave a wonderful performance

Bodh Raj Bhagat honoring Ashukoti
Sh Milkhi Ram from Gorda Akhnoor
Children make the functions lively
A good gathering

 
Contributed by : 
Tarachand Bhagat
Marheen.

Sunday, April 3, 2011

Development of Positive Power of Thought


(Contributed by Sh. R.L. Gottra via Face Book) 

Development of Positive Power of Thought is necessary for the Kabir followers'; because "Thought" is the only power by which we can systematically organize, accumulate and assemble facts and materials according to a definite plan. Man alone has the power to transform his thoughts into physical reality. Man alone can dream and make his dreams come true.

However, instead of applying this power to traditional 'Bhakti' (by which we could not progress), we need to apply it to achieve our practical objectives to rise high in life

Through evolution and struggle during millions of years man has risen above the other creatures of the earth as a result of his own thoughts and their effects upon himself.

No one knows the limitations of the power of thought or whether or not it has any. Whatever man believes he can do, he eventually does. But a few generations back, the more imaginative writers dared to write of the ‘horseless carriage’, and lo! It became a reality and is now a common vehicle. Through the evolutionary power of thought the hopes and ambitions of one generation became a reality in the next.

THOUGHTS ARE THINGS: The man who knows how to use his power of thought persistently wins success. Fortunate is the person who has found how to arouse or stimulate his thinking mind so that the powers of that mind will function constructively. Such a mind may be made to do anything constructive when placed back of any strong, deeply seated desire. It shows that thoughts are things.

Man’s dominating position in the world is the direct result of thought. The power of thought has been given the dominating position in one’s life. It must be this power that you as an individual will use in the attainment of success, no matter what may be your idea of what represents success. Through power of thought, you should take an inventory of yourself for purpose of ascertaining the factors or qualities with which you need to give your-self a well balanced and rounded out successful personality.

All thought is creative or productive. It can produce both positive and negative things. So, all thought is not constructive or positive. The power to “think” as you wish to “think” is the only power over which you create absolute control. If you think thoughts of misery or poverty and see no way to avoid these conditions, then your thoughts will create those very conditions and curse you with them. But, reverse the order and think thoughts of a positive, expectant nature. Then your thoughts will create those very positive conditions. Therefore, it rests upon you as to whether your thought will be of positive or negative type.

Whatever the mind of man can conceive and believe it can achieve. It is because thoughts are powerful things when they are mixed with definiteness of purpose and a burning desire for their translation into material object by application of known principles that need to be discussed separately.

You are the master of your faith and the captain of your soul by reason of the fact that you control your own thoughts with whose aid you may create whatever you desire. Thought magnetizes your entire personality and attracts to you the outward physical things that harmonize with the nature of your thoughts.

Plant a DEFINITE CHIEF AIM in your sub-conscious mind and fertilize it with full POSITIVE BELIEF. Belief will pave the way for “Infinite Intelligence” to step in to mature that project into exact reality. Any thing short of such belief will bring you disappointment.

More gold has been mined from thoughts of men than has ever been taken from the earth. However, success comes to those who are success conscious. So, create success consciousness in your mind. Success begins with a state of mind with definiteness of purpose. It comes only to those people who work hard and long.

On the other hand, failure comes to those who indifferently allow themselves to become failure conscious. When defeat overtakes a man, the easiest and most logical thing is to quit. That is what majority of men do. However, they could avoid defeat by learning the art of changing their minds from failure consciousness to success consciousness.