Tuesday, December 28, 2010

मानव धर्म- Religious Unity- Baba Faqir Chand


किस लिये धार्मिक जगत में आकर झगड़ा मचाया हुआ है? तुमने किस लिये मानवजाति को विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों में बाँट दिया है? यह सब अज्ञान है. गवर्नमैंट लाख प्रयत्न करे, बिना इस अज्ञान के मिटाये एकता लाना महाकठिन है या यूँ कह लो असम्भव है. 1921 में हिन्दू-मुसलमानों ने दिल्ली की जामा मस्जिद में एक प्याले में पानी पिया और फिर उन्हीं हिन्दू-मुसलमानों ने 1947 में एक-दूसरे के सिर काटे. जो एकता लालच देकर की जाती है या डरा कर की जाती है, वह एकता नहीं है. यह अस्थाई एकता है. जब स्वराज लेना था तो हिन्दू-मुसलमान इकट्ठे हो गये और जब मिल गया तो टुकड़ों की तरह बाँट लिया. कहीं पाकिस्तान बना. कहीं कुछ बना. मानव जाति इस अज्ञान में डूब गयी. इसका एक मात्र इलाज है सन्तमत की शिक्षा, हमारे ऋषियों की शिक्षा. लोग कहते हैं राजनीति (Politics) को धर्म से अलग रखो. मैं कहता हूँ कि जब शासन की राजनीति में धर्म नहीं रहेगा, शासन नहीं चलेगा.(बाबा फकीर चंद, पुस्तक सत सनातन धर्मसे.)

Thursday, December 23, 2010

Unity in Megh Vanshi Castes - मेघ वंशी जातियों में एकता क्यों नहीं होती-2- (Indian System of Slavery and Meghvansh)

प्रतिदिन यह प्रश्न उठता है कि मेघ वंशी जातियों में एकता क्यों नहीं होती. इस प्रश्न की गंभीरता का रंग अत्यंत काला है जिसे रोशनी की ज़रूरत है. यदि मेघ वंशियों का आधुनिक इतिहास लिखा जाए तो उसमें एक वाक्य अवश्य लिखा रहेगा कि इनमें एकता नहीं है. एकता न होना एक नकली चीज़ है जो गुलामी का जीवन जी रहे/जी चुके लोगों में पाई जाती है. यह एक मानसिकता है जो यात्नाएँ दे कर गुलामों में विकसित की जाती है. उन्हें विश्वास दिलाया जाता है कि वे न तो एक हैं और न ही एक हो सकते हैं. उनके समूहों के नाम, धर्म आदि अलग कर दिए जाते हैं. उन्हें यह विचार दिया जाता है कि उनका धर्म, जाति या दर्जा अलग-अलग है. इस तरह उन्हें एक-दूसरे से अलग रहने की आदत डाल दी जाती है और जातिवाद के मैकनिज़्म से ऐसे हालात पैदा कर दिए जाते हैं कि वे एक दूसरे से संपर्क न बढ़ाएँ. जाति आधारित इस गुलामी (Caste based slavery), जिसे भारतीय गुलामी (Indian slavery) कहा जाता है, में बने रहने की मजबूरी बनी रहती है. इससे विभिन्न जातियों को मानवीय अधिकारों (Human rights) और राष्ट्रीय स्रोतों से दूर रखना आसान हो जाता है. वे शिक्षा, कमाई के बेहतर साधनों, सम्मानपूर्ण जीवन आदि से दूर कर दिए जाते हैं. यदि शिक्षा द्वारा इस तथ्य को समझ लिया जाए तो इस मानसिकता से पूरी तरह पार पाया जा सकता है और सामाजिक एकता लाई जा सकती है. नतीजतन आत्मविश्वास बढ़ेगा और सब के साथ मिल कर चलने की शक्ति आएगी. लोकतंत्र में अपने विकास के मुद्दों पर बात कहने के लिए सामाजिक मंच साझा करने की और संगठनात्मक शक्ति बढ़ाने की आवश्यकता है. अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का यही एक रास्ता है.



Friday, December 17, 2010

Megh Day Celebrated with Fan and Fare

Bhagat Mahasabha, Punjab Distt.Units Participated in “MEGH JAYANTI” function held at Megh Rishi Chowk, Abohar, Punjab on 16/12/2010 in which Prof. Raj Kumar addressed the gathering. Other members who addressed at the function were Rajesh Bhagat, Ludhiana; Sham Lal Bhagat, Ludhiana; Jatinder Jind, Jalandhar; Girdhari Lal Bhagat, Pathankot; Des Raj Bhagat,Ludhiana; Sanjeev Kumar Rinku, Jalandhar; Pritam Dass, Bhagat, Qadian, Gurdaspur.

Saturday, December 11, 2010

Kabir of the south - दक्षिण का कबीर - तिरुवल्लुवर (Thiruvalluvar)

The greatest saint of south India Thiruvalluvar is known in the world for his firm faith in the religion of humanity. He was from a weaver family. The values of life he stood for are prevalent in Kabir. It is in this context that we call him Kabir of south. In the same way it will be relevant if we call Kabir a Thiruvalluvar of North. The biographies of these great people have been vitiated and polluted in many ways as is clear from the variety of these stories. We shall revert to this subject later. For the time being you may read a beautiful article on Thiruvalluvar written by P.N. Subramanian. Here is the link:-तिरुवल्लुवर


दक्षिण भारत के महानतम संत तिरुवल्लुवर अपनी मानवधर्म (Religion of Humanity) के प्रति आस्था के लिए पूरे विश्व में जाने जाते हैं. वे जुलाहा परिवार से थे. जिन जीवन मूल्यों को उन्होंने महत्व दिया वे कबीर में भी विद्यमान हैं. इस दृष्टि से कबीर को उत्तर भारत का तिरुवल्लुवर कहें या तिरुवल्लुवर को दक्षिण का कबीर कहें एक ही बात है. ऐसे महापुरुषों की जीवनियों को कितनी प्रकार से भ्रष्ट किया गया है यह इनके कथानकों से स्पष्ट है. इसके बारे में फिर कभी....फिलहाल आप आदरणीय पा.ना. सुब्रमणियन जी का तिरुवल्लुवर पर लिखा एक सुंदर आलेख यहाँ पढ़ें:- तिरुवल्लुवर

Sunday, December 5, 2010

जातीय सद्भाव (Communal Harmony) – Bhagat Munshi Ram - Baba Faqir Chand

मुझे छोटी आयु से यह जानने की तलाश थी मैं कौन हूं?’ इस तलाश के सिलसिले में मैंने बहुत दौड़ धूप की. सन्‌ 1911 ई. में मैंने गायत्री मन्त्र का जाप शुरू किया. कई संतों-महात्माओं से मिला. धर्म ग्रन्थों का अध्ययन किया, मगर शांति नहीं आई. अन्त में 1963 ई. में मौज मुझे परम संत परम दयाल फकीरचन्द जी महाराज, जो होशियापुर, पंजाब के रहने वाले थे, उनके चरणकमलों में ले गई. उन्होंने मुझे बताया कि इन्सान एक चेतन का बुलबुला है. मौज से ज़िन्दगी बन जाती है और मैंपना आ जाता है और देश के, क्षेत्र के, जातिवर्ग के धर्मों, पंथों, संप्रदायों और भाषाओं के प्रभाव मनुष्य के मन पर प्रभाव डालते रहते हैं. अपनी समझ को अच्छा और दूसरों की समझ को बुरा समझने लग जाते हैं और जीवन अशांत हो जाता है. समाज में भी अशांति पैदा हो जाती है.

इन प्रभावों से बचने के लिए हुजूर परम दयाल जी महाराज ने मानव जाति के लिए इस ज्ञान का अपने जीवन में अनुभव किया कि इन्सान एक चेतन का बुलबुला है. जीवन गुजारने के लिए इस नामरूप संसार में सब का आदर, सब का मान सत्कार, दूसरों की भावनाओं का विरोध न करते हुए, ‘किसी से आश्रय लो और किसी को आश्रय दोके नियमों पर चलते हुए जीवन यात्रा पूरी करें. इस तरह घर-घर मिला कर ही देश बन जाता है, देश में भी शांति आ सकती है. (भगत मुंशीराम, छुआछूत कब और क्यों से)

Saturday, December 4, 2010

Baba Sahab Ambedkar belonged to a Kabirpanthi Family - बाबा साहब अंबेडकर कबीरपंथी परिवार से थे

हैदराबाद के मेरे एक मित्र पुलि पांडु (Puli Padu) ने बताया था कि डॉ अंबेडकर आमतौर शाम के समय अपनी मस्ती में कबीर के भजन (शब्द) गाया करते थे. वे महर समुदाय से थे. यह एक योद्धा और जुझारू जाति रही है. क्या वे कबीरपंथी थे? इस बार भी विकिपीडिया के संदर्भ काम आए और पुष्टि हुई कि वे कबीरपंथी परिवार से थे. भारत के कबीरपंथी बुद्धिजीवी इस बात से गौरवान्वित महसूस करते हैं कि भारतीय संविधान पर मानवधर्म के जिन सिद्धांतों की छाप है उसके मूल में कहीं-न-कहीं कबीर की वाणी और दर्शन है. भारतीय संदर्भ में कबीरमत और उनसे प्रभावित अन्य धर्मों, संप्रदायों और मतों की शिक्षाएँ इस बिंदु की पुष्टि करती हैं. कबीर की शिक्षाएँ अमेरिका में पहुँच रही हैं. अस्सी के दशक में कबीर के नाम पर साहित्यिक दुकानें वहाँ खुलनी शुरू हो चुकी थीं.

(All links retrieved on 04-12-2010)