Saturday, November 27, 2010

सामुदायिक एकता और विकास-पथ


प्रो.राजकुमार और श्री एम.आर. भगत एवं अन्य प्रतिनिधि
किसी समुदाय के भीतर कार्य कर रहे विभिन्न सामाजिक संगठनों का मिल कर अपने कार्यक्रम बनाना समुदाय के विकास का अगला चरण माना जाता है. मेघवंशियों के जम्मू-कश्मीर स्थित मेघ-भगत समुदाय ने, मेरी जानकारी के अनुसार, पहली बड़ी संगठनात्मक पहल की है कि कई वर्ष से कार्यरत मेघ सुधार सभा’ (Megh Sudhar Sabha) और भगत महासभा’ (Bhagat Mahasabha)  ने मिल कर अपने कार्यक्रम बनाने का और सामाजिक उत्थान का संकल्प लिया है. परंपरावादी शक्तियों द्वारा कई नाम दे कर भयंकर रूप से बाँट दिए गए इस समुदाय में बहुत समय के बाद यह सकारात्मक लक्षण देखने को मिला. विश्वास होने लगा है कि पंजाब और जम्मू-कश्मीर में इस समुदाय के भीतर कार्य कर रहे अन्य पुराने और ढीले ढँग से चल रहे संगठन इससे प्रेरणा लेकर एकता और विकास को मिशन बनाएँगे. इससे युवा शक्ति बड़े पैमाने पर आ जुड़ेगी. रास्ता लंबा है और बेचैनी भी बहुत है. शिक्षा, जागरूकता और निरंतर कार्य भी चाहिए.

बधाई और सुनहरे भविष्य हेतु शुभकामनाएँ.


अधिक विस्तार के लिए ये लिंक देखें



Thursday, November 18, 2010

Megh/Megh Bhagat - Origins

Photo Google Images
While searching on the net I found yet another link describing orgin of Megh/Megh Bhagat. It is interesting  and also confirms information given by Bhagat Munshi Ram in his book Megh Mala.

Tuesday, November 16, 2010

Megh Bhagats in Literature - साहित्य में मेघ भगत

आज नेट पर सर्च मार रहा था तो नीचे दिए लिंक पर मेघ भगत बिरादरी का उल्लेख करती एक कहानी मिली. रुचिकर है. आपसे साझा कर रहा हूँ. ओड़ समुदाय पर लिखा सुंदर नाटक 'जस्मा ओडन' मैंने पढ़ा था. परंतु मेघ समुदाय की पृष्ठ भूमि पर लिखी कोई सृजनात्मक रचना पहली बार नेट पर पढ़ी. ऑफिस से लेट हो रहा हूँ परंतु आज इसे यहाँ पोस्ट करके ही जाऊँगा. पढ़िए देसराज काली की लिखी एक सुंदर कहानी.


यह रचना प्रतिलिपि के साभार





Monday, November 15, 2010

Bhagat Mahasabha organised free medical camp

Bhagat Mahasabha organised free medical camp for the benefit of the poor and needy. Please follow this link-

Bhagat Chetna

Sunday, November 14, 2010

पंजाब के मेघ (भगत) और आर्य समाज (Meghs of Punjab and Arya Samaj)

स्यालकोट से विस्थापित हो कर आए मेघवंशी, जो स्वयं को भगत भी कहते हैं, आर्यसमाज द्वारा इनकी शिक्षा के लिए किए गए कार्य से अक़सर बहुत भावुक हो जाते हैं. प्रथमतः मैं उनसे सहमत हूँ. आर्यसमाज ने ही सबसे पहले इनकी शिक्षा का प्रबंध किया था. इससे कई मेघ भगतों को शिक्षित होने और प्रगति करने का मौका मिला. परंतु कुछ और तथ्य भी हैं जिनसे नज़र फेरी नहीं जा सकती.

स्वतंत्रता से पहले स्यालकोट की तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों की कुछ विशेषताएँ थीं जिन्हें जान लेना ज़रूरी है.

तब स्यालकोट के मेघवंशियों (मेघों) को इस्लाम, ईसाई धर्म और सिख पंथ अपनी खींचने में लगे थे. स्यालकोट नगर में रोज़गार के काफी अवसर थे. यहाँ के मेघों को उद्योगों में रोज़गार मिलना शुरू हो गया था और वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे थे. इनके सामाजिक संगठन तैयार हो रहे थे. उल्लेखनीय है कि ये आर्यसमाज द्वारा आयोजित शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रने से पहले मुख्यतः कबीर धर्म के अनुयायी थे. ये सिंधु घाटी सभ्यता के कई अन्य कबीलों की भाँति अपने मृत पूर्वजों की पूजा करते थे जिनसे संबंधित डेरे और डेरियाँ आज भी जम्मू में हैं. शायद कुछ पाकस्तान में भी हों. कपड़ा बुनने का व्यवसाय मेघ ऋषि और कबीर से जुड़ा है और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कोली, कोरी, मेघवाल, मेघवार आदि समुदाय भी इसी व्यवसाय से जुड़े हैं.

इन्हीं दिनों लाला गंगाराम ने मेघों के लिए स्यालकोट से दूर एक आर्यनगरकी परिकल्पना की और एक ऐसे क्षेत्र में इन्हें बसने के लिए प्रेरित किया जहाँ मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से अधिक थी. स्यालकोट, गुजरात (पाकिस्तान) और गुरदासपुर में 36000 मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू दायरे में लाया गया. सुना है कि आर्यनगर के आसपास के क्षेत्र में मेघों के आर्य भगत बन जाने से वहाँ मुसलमानों की संख्या 51 प्रतिशत से घट कर 49 प्रतिशत रह गई. वह क्षेत्र लगभग जंगल था.

खुली आँखों से देखा जाए तो धर्म के दो रूप हैं. पहला है अच्छे गुणों को धारण करना. इस धर्म को प्रत्येक व्यक्ति घर में बैठ कर किसी सुलझे हुए व्यक्ति के सान्निध्य में धारण कर सकता है. दूसरा, बाहरी और बड़ा मुख्य रूप है धर्म के नाम पर और धर्म के माध्यम से धन बटोर कर राजनीति करना. विषय को इस दृष्टि से और बेहतर तरीके से समझने के लिए कबीर के कार्य को समझना आवश्यक है.

सामाजिक और धार्मिक स्तर पर कबीर और उनके संतमत ने निराकार-भक्ति को एक आंदोलन का रूप दे दिया था जो निरंतर फैल रहा था और साथ ही पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत पर इसने कई प्रश्न लगा दिए थे. इससे ब्राह्मण चिंतित थे क्योंकि पैसा संतमत से संबंधित गुरुओं और धार्मिक स्थलों की ओर जाने लगा. आगे चल कर ब्राह्मणों ने एक ओर कबीर की वाणी में बहुत उलटफेर कर दिया, दूसरी ओर निराकारवादी आर्यसमाजी (वैदिक) विचारधारा का पुनः प्रतिपादन किया ताकि निराकार-भक्तिकी ओर जाते धन और जन के प्रवाह को रोका जा सके. उन्होंने दासता और अति ग़रीबी की हालत में रखे जा रहे मेघों को कई प्रयोजनों से लक्ष्य करके स्यालकोट में कार्य किया. आर्यसमाज ने शुद्धिकरण जैसी प्रचारात्मक प्रक्रिया अपनाई और अंग्रेज़ों के समक्ष हिंदुओं की बढ़ी हुई संख्या दर्शाने में सफलता पाई. इसका लाभ यह हुआ कि मेघों में आत्मविश्वास जागा और उनकी स्थानीय राजनीति में सक्रियता की इच्छा को बल मिला. हानि यह हुई उनकी इस राजनीतिक इच्छा को तोड़ने के लिए मेघों के मुकाबले आर्य मेघों या आर्य भगतों को अलग और ऊँची पहचान और अलग नाम दे कर उनका एक और विभाजन कर दिया गया जिसे समझने में सदियों से अशिक्षित रखे गए मेघ असफल रहे. इससे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक बिखराव बढ़ गया.

भारत विभाजन के बाद लगभग सभी मेघ भारत (पंजाब) में आ गए. यहाँ उनकी अपेक्षाएँ आर्यसमाज से बहुत अधिक थीं. लेकिन मेघों के उत्थान के मामले में आर्यसमाज ने धीरे-धीरे अपना हाथ खींच लिया. यहाँ भारत में मेघ भगतों की आवश्यकता हिंदू के रूप में कम और सस्ते मज़दूरों (Cheap labor) के तौर पर अधिक थी. दूसरी ओर भारत विभाजन के बाद भारत में आए मेघों की अपनी कोई राजनीतिक या धार्मिक पहचान नहीं थी. धर्मों या राजनीतिक पार्टियों ने इन्हें जिधर-जिधर समानता का बोर्ड दिखाया ये उधर-उधर जाने को विवश थे. धार्मिक दृष्टि से राधास्वामी मत और सिख धर्म ने भी वही कार्य किया जो ब्रहामणों ने निराकार के माध्यम से किया. राधास्वामी मत को कबीर धर्म या संतमत का ही रूप माना जाता है लेकिन यह उत्तर प्रदेश में कायस्थों के हाथों में गया और पंजाब में जाटों के हाथों में. सिखइज़्म और राधास्वामी मत के साहित्य में मानवता और समानता की बात है लेकिन जैसा कि पहले कहा गया है सस्ता श्रम कोई खोना नहीं चाहता. वैसे भी धर्म का काम ग़रीब को ग़रीबी में रहने का तरीका बताना तो हो सकता है लेकिन उसकी उन्नति और विकास का काम धर्म के कार्यक्षेत्र में नहीं आता. यह कार्य राजनीति और सत्ता करती है लेकिन आज तक मेघों की कोई सुनवाई राजनीति में नहीं है और न सत्ता में उनकी कोई भागीदारी है. तथापि मेघों ने एक सकारात्मक कार्य किया कि इन्होंने बड़ी तेज़ी से बुनकरों का पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता अन्य कार्यों में दिखाई और उसमें सफल हुए.

दूसरी ओर विभिन्न स्तरों पर मेघों के बँटने का सिलसिला रुका नहीं. ये कई धर्मों-संप्रदायों में बँटे. कई कबीर धर्म में लौट आए. कई राधास्वामी मत में चले गए. कुछ गुरु गद्दियों में बँट गए. कुछ ने सिखी और ईसाईयत में हाथ आज़माया. कुछ ने देवी-देवताओं में शरण ली. कुछ आर्यसमाज के हो गए. वैसे कुल मिला कर ये स्वयं को मेघऋषि के वंशज मानते हैं और भावनात्मक रूप से कबीर से जुड़े हैं. मेघवंशियों में गुजरात के मेघवारों ने अपने बारमतिपंथ धर्म को सुरक्षित रखा है. राजनीतिक एकता में राजस्थान के मेघवाल आगे हैं. विडंबना ही कही जाएगी कि इन मेघवंशियों की आपस में राजनीतिक पहचान नहीं बन पा रही है. हालाँकि यह चिरप्रतीक्षित है और बहुत ज़रूरी है.
(विशेष टिप्पणी- इस संबंध में कपूरथला के डॉ. ध्यान सिंह (जो स्वयं मेघ समुदाय से हैं) का शोधग्रंथ आप देख सकते हैं.)          
                                  
        

Tuesday, November 9, 2010

जीवों की आदि सृष्टि

जीवों की आदि सृष्टि विषयक कथाएँ (सुनी-सुनाई) प्रत्येक समुदाय में चली आ रही हैं. कुछ पात्रों के नाम तद्भव हैं और कुछ के तत्सम् चल रहे हैं. राजस्थान मेघवंशियों में जो परंपरागत जानकारी उपलब्ध है उसे श्री गोपाल डेनवाल ने समेकित कर के भेजा है जिसे ज्यों का त्यों यहाँ दिया जा रहा है. (श्री जीतेंद्र कुमार ने इसे यूनीकोड में तैयार किया है). कुछ शब्दों का स्वरूप बदला सा है. शिक्षा से दूर रखे गए समुदाय किसी-न-किसी रूप में जानकारी को संजोए हुए हैं. नामों में टंकण की त्रुटियाँ भी हो सकती हैं. शुद्ध वर्तनी के सुझाव मिलने पर इसे सुधारा जाएगा.

जीवों की आदि सृष्टि 
जीव की उत्पति जल से होती है. यह एक वैज्ञानिक सत्य है और जल के बिना जीव पैदा नही हो सकता यह भी एक कटु सत्य है. जल का निकास मेघों  द्वारा  होता है जिसे बादल भी कहते  हैं. उसी जल नारायण  की नाभि  कमल  से भगवान  ब्रह्मा  की उत्पति  है. अतः पूरी सृष्टि मेघ से उत्पन्न हुई  है.

मेघ बरसे मानव हर्षेहर्षे  ऋषि मुनि और देव |
संत महात्मा सभी पुकारे, करो  मेघ  की सेव ||

श्री भगवान मेघ  नारायण  की नाभि कमल से
ब्रह्मा 
ब्रह्मा से :-
1. ब्रह्मा :- चार ऋषि- सनक, सनन्दन, सनातन, संतकुमार
2. दस मानसपुत्र :- मरीच, अत्रि, अंगीरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ट, दक्ष, नारद
3. शरीर के दो खंडरो :-  पुरुष स्वायम्भुमनु, स्त्री स्तरूपा इनसे 2 पुत्र 3 कन्याएँ
उत्तानपाद, प्रियव्रत, आकुति, प्रसूति पति-दक्ष प्रजापति, देवहुति पति-कर्दम ऋषि
उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव
ध्रुव प्रतावती से - पति रूचिनाम ऋषि.  इनके पुत्र
आगिनध्र, विष्णु, दक्षिणा, वयुश्मान, ज्योतिष्मान, धुतिमान, भव्य, सवन, अग्नि बाहु, मित्र   

कर्दम ऋषि की 9 कन्याएँ  व उनका विवाह 
1. कला - मरीचि
2. अनुसूया - अत्री
3. श्रद्धा - अंगीरा
4. हवि  - पुलस्त्य
5. गतिका - पुलह
6. योग - क्रतु
7. ख्याति - भृगु
8. अरुंधती - वशिष्ट
9. शान्ति - अर्थवन

मरीचि :- (1)  कश्यप और (2) पूर्णिमा
कश्यप :- विवस्वान (सूर्य) इनसे सूर्यवंश चला, दनुस्त्री से 100 पुत्र हुए थे जिनमें एक मेघवान था जो सप्त सिन्धु  के महाराज के जनक थे.
विवस्वान :-  विवस्वत्म्नु (सात्वेमनु)
विवस्वत्म्नु:- 1. इशवाक, 2. विकुक्षि, 3. निभी आदि  सहित 101 पुत्र  थे.

अत्रि के पुत्र :- 1
. दत्तात्रेय, 2. दुर्वासा, 3. चंद्रमा
चंद्रमा के पुत्र :- 1. नहुश, 2. बुद्ध, 3. सोम, सोम से चन्द्रवंश चला
नहुश:- 1. यति, 2. ययाति, 3. संयाति, 4. उद्भव, 5. याची, 6. सर्य्याती, 7. समर्पिती

ब्रह्मा के चौथे  पुत्र :- पुलस्त्य
पुलस्त्य के पुत्र :- विश्रवा
विश्रवा के पुत्र :-  कुबेर, खरर्दुशन (खर-दूषण), तारिका, रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, सुरपन्खा (शूर्पनखा)   

Monday, November 8, 2010

मेघवंशियों का सम्मेलन (A Conference of Meghvanshis)

राजस्थान में मेघवंशियों का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन 26-12-2010 को किया जा रहा है जिसकी विस्तृत जानकारी निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है. उनके द्वारा भेजी गई जानकारी से सुखद अनुभूति होती है कि वे सामुदायिक कार्यक्रम एक योजनाबद्ध और अनुशासित तरीके से करते हैं जो अन्य मेघवंशियों के लिए अनुकरणीय है.