Saturday, October 30, 2010

भगत महासभा की रैली - Rally of Bhagat Mahasabha

On the occasion of birthday celebrations of Shaheed-E-Azam Bhagat Singh, Bhagat Mahasabha,y Pathankot, Punjab organized a rally in the streets of the city. They registered a strong presence felt amongst the various programs held in the city. Indeed a very good start.


It was for the first time that such a rally was organized by youth of Megh Bhagat. Young ladies participated with enthusiasm. Ms. Asha Bhagat (Team- Santosh Bhagat, Krishna Bhagat, Sunita Bhagat, Kavita Bhagat, etc.) and Mr. Girdhhari Lal Bhagat (Team- Somnath Bhagat, Shashi Bhagat, Rinku Bhagat, Jagdish Bhagat, etc.) were the main inspiration. The rally was praised in the city. There was good The Media coverage and encourgament from the elderly people.

Let us see, now, how does Mahasabha evaluate the rally and is prepare for the next program. It is heard that Kabir Temple is being considered as the next activity.

Remaining narrative follows through pictures:

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के जन्म दिन पर भगत महासभा ने पठानकोट, पंजाब की गलियों में से रैली निकाली. और उस दिन शहर में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की. बहुत अच्छी शुरूआत.

उल्लेखनीय है कि ऐसी रैली मेघ भगत समाज के युवावर्ग ने पहली बार निकाली थी. इसमें युवतियों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया. सुश्री आशा भगत (टीम- संतोष भगत, कृष्णा भगत, सुनीता भगत, कविता भगत आदि) और श्री गिरधारी लाल भगत (टीम- सोमनाथ भगत, शशि भगत, रिंकू भगत, जगदीश भगत आदि) इसके मुख्य प्रेरणास्रोत रहे. शहर में इस रैली की प्रशंसा हुई. मीडिया ने इसे बहुत कवरेज दी और बुज़ुर्गों ने खूब प्रोत्साहित किया.

अब देखना है कि इस कार्यक्रम का मूल्यांकन महासभा कैसे करती है और आगामी कार्यक्रम क्या बनाया जाता है. सुना है कबीर मंदिर पर विचार किया जा रहा है.

तस्वीरों के माध्यम से शेष कथा इस प्रकार है:
















Monday, October 25, 2010

Maveli (राजा बली) is remembered by Meghvanshis in Kuchchh-Gujrat

This was the feedback I received from Gujrat (Kuchchh) as a comment on one of the articles. This deserved to be taken as proper input. :  
Thank you, Bharat Bhushan, for raising historical topic relating to identity of Meghwal identity. As far as western Gujarat (Kachchh) (erstwhile Sindh-Kachchh region) is concerned, we Maheshwari Meghwars have an interesting tradition to confirm much awaited return of Raja Bali's rule. People from our community are following an unique tradition during Diwali i.e. on Kali Chaudas Day - Kids/youths will take a 3 feet sugarcane stick with cotton tied on it and after burning the same, they will go to each and every fellow community brother's home and will say "HORI, DIYARI, MEGH RAJA JE GHARE MERIYO BARE", which means - lights shall ignite in the house of Megh Raja on every Holi and Diwali". In return, the householder will pour one spoon Ghee on the burning cotton. Eventually, after roaming almost all homes, all these Sugarcane stick (MERIYO) are kept at the outskirts. These MERIYAS when seen together gives a marvelous glimpse of unity of Meghwar community.

The basic idea behind all these traditions is to keep alive our craving for retaining our lost pride that we (Meghwars/Meghwals) are descendants of Great Ruler of ancient India. In our forefathers rule, we were happy and living a dignified life. As such, this tradition of remembering Bali Raja/Megh Raja is to keep alive our ambitions of restoring our lost rule and pride. I think so.

Thanks again for your cause of uniting entire Meghwals of India on one platform.

Navin K. Bhoiya
Kachchh-Gujarat
18 September 2010 17:57”

Friday, October 22, 2010

कबीर मंदिर और आर्यसमाजी विचारधारा


पिछले दिनों एक मेघ सज्ज्न की तीमारदारी के दौरान उनके पास बैठने का मौका मिला. बूढ़े मेघ अभी कबीर मंदिर का सपना भुला नहीं पाए हैं. मैंने कुरेदा तो एक तस्वीर निकली जो आपके सामने रख रहा हूँ.

पंजाब सरकार ने एक बार विज्ञापन दिया था कि धर्मार्थ सोसाइटियाँ यदि आवेदन करें तो 2 कनाल ज़मीन लीज़ पर अलाट की जा सकती है.

उस समय एक शहर में मेघों का एक संगठन अस्तित्व में था. इसमें दो विचारधाराओं के दल थे. एक दल ने कबीर भवन के लिए प्रयास प्रारंभ किए. एक ट्रस्ट बनाया. दूसरे दल को इसमें रिश्तेदारियों का मामला नज़र आय़ा. बातचीत के बाद उसे ब्राडबेस बनाया गया. नए सदस्य जोड़े गए. संविधान बदला गया. पुनः रजिस्ट्रेशन हुआ. नया प्रबंधन बना. फिर से ज़मीन के लिए आवेदन किया गया. एक बड़ी रकम जमा की गई. प्राधिकारियों से मिलने वाले प्रतिनिधि दल में उस समय के अच्छी स्थिति वाले गणमान्य मेघ नौकरशाह थे. प्राधिकारियों का प्रश्न था कि कबीर मंदिर ही क्यों? उन्हें स्पष्ट किया गया कि यह मंदिर आम आदमी और श्रमिकों के लिए है जो अन्य धर्मों के सख्त अनुशासन में हमेशा बँध कर नहीं रह सकते. दूसरे उस क्षेत्र में ऐसी कोई संस्था नहीं थी जहाँ सारे समुदाय बैठ कर अपने गुरु का जन्मदिन मना सकें. प्राधिकारियों का रवैया सकारात्मक था. उल्लेखनीय है कि कबीर मंदिर जैसी धर्मार्थ संस्थाओं के लिए ग्रांट उपलब्ध थी.

इस बीच दूसरे दल ने अलग से प्राधिकारियों से संपर्क किया. यह दल (इसमें संभवतः आर्यसमाजी विचारधारा वाले लोग अग्रणी थे) कोई भवन बनाने के पक्ष में था. प्राधिकारियों ने जान लिया कि यह एक ही समुदाय के दो दल हैं. बात बिगड़ी. समय बीतने लगा. धीरे-धीरे ज़मीन की कीमतें पहुँच से बाहर होने लगीं. पैसा एकत्रित होता रहा. कीमतें भी बढ़ती रहीं. परिणाम की अभी प्रतीक्षा है.

क्या कबीर मंदिर का विचार बुरा था? क्या उसके लिए संगठित प्रयास (एकता) करने में बुराई थी?

अन्य शहरों में भी इसी से मिलती-जुलती कहानियाँ कही जाती हैं. एकता के प्रति आम मेघ आज भी आशावान हैं.

Monday, October 4, 2010

मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती

हाल ही में एक शहर में मेघ समुदाय ने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया. आजोजन सफल रहा. अधिक जानकारी लेने के लिए आयोजकों और मध्यम स्तर के तथा नए (युवा) नेताओं से बात की तो मतभेद और आरोप खुल कर सामने आ गए. यहाँ मेरा उद्देश्य उनका खुलासा करना नहीं है. ये मतभेद आदि तो केवल लक्षण मात्र हैं. यहाँ मैं उनके कारणों की जाँच करना चाहता हूँ.

हममें क्यों एकता नहीं होती....यह सवाल अब कई संदर्भों में उठने लगा है. दो-एक अधिक पिछड़े समुदाय मेघों से आगे निकल चुके हैं जिन्हें मेघ अपने से कमतर मानते थे. आगे बढ़ चुके समुदाय अब अन्य जातियों के साथ अधिक समन्वयन करके आर्थिक संपन्नता की ओर बढ़ चुके हैं और राजनीतिक सत्ता में उनकी भागीदारी बढ़ी है. एक राज्य में तो उनकी मुख्यमंत्री है. जाहिर है कि एकता और फिर सत्ता में भागीदारी के बिना सामूहिक संपन्नता नहीं आ सकती. बिखरे हुए समूह लोकतंत्र में हैसीयत खो देते हैं क्यों कि वे दबाव समूह नहीं बन सकते.

वहाँ की स्थिति से जो समझा उसे यहाँ लिख रहा हूँ-
1. उत्साह, अवसर, समर्थन, मार्गदर्शन, धन, नेतृत्व आदि सब कुछ था, समन्वय नहीं था.
2. पृष्ठभूमि में राजनीतिक दल थे. उन्होंने समुदाय के आंतरिक नेतृत्व को उभरने नहीं दिया. इससे असंतोष हुआ. युवा इस प्रक्रिया को समझ नहीं सके. प्रशिक्षण की कमी स्पष्ट थी.
3. कुछ युवकों में मशहूर होने की महत्वाकाँक्षा आवश्यकता से अधिक थी.
4. समन्वय और सहयोग की जगह दोषारोपण का दूषित दौर शुरू हो गया.
5. युवाओं से लेकर अनुभवी लोगों तक ने समुदाय को कोसना जारी रखा कि यह अनपढ़ तबका है, ये एकता कर ही नहीं सकते, इन्हें समझाना असंभव है, इनमें आगे बढ़ने की इच्छा ही नहीं है आदि पुराने वाक्य सैंकड़ों बार दोहराए गए. नतीजा - वही ढाक के तीन पात सब कुछ हुआ लेकिन कार्यक्रम से संतुष्टि नहीं हुई. एक दूसरे की आलोचना की गई परंतु कार्यक्रम के बाद की जाने वाली आवश्यक समीक्षा करना किसी को याद नहीं रहा.

प्रबंधन गुरुओं ने इन सारी स्थितियों पर अपार प्रशिक्षण सामग्री और साहित्य रचा है.  मेघ समुदाय के लोग बार-बार समाजिक-राजनीतिक गतिविधियाँ चलाते हैं, असफल होते हैं और बाहर-भीतर से टूटते हैं क्योंकि जहाँ से शुरू करते हैं, वहीं पहुँच जाते हैं. यह कष्ट देने वाली स्थिति है.

समन्वय क्यों नहीं होता
- सामूहिक गतिविधि का अर्थ लोकप्रियता लगाया जाता है
- सामूहिक लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता
- मिशनरी भावना नहीं है, प्रत्येक गतिविधि अल्पकालिक होती है
- कोई भी कार्यक्रम शुरू होने से पहले स्थानीय राजनीति करने वाले अपना कुचक्र शुरू कर देते हैं. राजनीतिक जागरूकता न होने से संगठन टूटने लगता है.

सुझाव
1. नेतृत्व देने वाले नेता समुदाय के सदस्यों के प्रति अपशब्द बोलना बंद करें. अपशब्दों से नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है.
2. समुदाय के लोग शताब्दियों की ग़रीबी से प्रभावित हैं. आप उनसे अचानक एकता की आशा कैसे कर सकते हैं. उनका मन अचानक अपनी सभी बाधाएँ दूर करके आपसे कैसे मिल सकता है. उन्हें प्रताड़ना दे-दे करके विभाजित रहने की आदत डाली गई थी. उनके साथ प्रेम का बर्ताव करें.  
3. राजनीतिक दखलअंदाज़ी रहेगी, युवा कार्यकर्ताओं का प्रबंधन गुरुओं द्वारा समुचित प्रशिक्षण इसके नकारात्मक प्रभाव को रोक सकता है.
4. लक्ष्य तय और स्पष्ट हों.
5. आपसी सहयोग और समन्वय की आवश्यकता को पहले समझा/समझाया जाए.
6. अपने सामाजिक कार्यक्रमों को भी प्रशिक्षण का मंच बनाएँ.
7. सबसे बढ़ कर महिलाओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करें. एक महिला पूरे परिवार और गली मोहल्ले के लिए शिक्षिका बन जाती है. बच्चों को संस्कार द्वारा जो वह बना सकती है वह कार्य देश के नेता नहीं कर सकते. माता ने जो संस्कार दे दिया वह अवश्य फलित होता है.

देश को नेता नहीं बनाते. देश को और नेताओं को महिलाएँ ही बनाती हैं. पहले उनके प्रशिक्षण का प्रबंध करें.

मेघनेट पर इस आलेख के नीचे टिप्पणीकार श्री पी.एन. सुब्रमणियन द्वारा दिया गया लिंक यहाँ जोड़ा गया है. (स्त्री सशक्तिकरण) सुब्रमणियन जी को कोटिशः धन्यवाद

Saturday, October 2, 2010

Mahabali, Maveli and Matriarchal Society - राजा महाबली और मातृप्रधान समाज

इसका संदर्भ Maveli belongs to Meghvansh और ऐसे अन्य आलेखों से है. हाल ही में मुझे याद आया कि केरल में मातृप्रधान समाज है. इसी प्रकार उत्तर-पूर्व में भी मातृप्रधान समाज प्रचलित है. महाबली का राज्य दक्षिण और दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्रों में था. उसका बेटा बाण उत्तर-पूर्वी क्षेत्र का गवर्नर था. क्या यह हैरानगी की बात नहीं है कि इन दोनों क्षेत्रों में आज भी मातृप्रधान समाज है? क्या राजा महाबली ने समाज में महिलाओं का महत्व समझते हुए यह प्रणाली लागू की थी या महाबली से भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता में यह प्रणाली पहले से चल रही थी? क्या देश के अन्य हिस्सों से मातृप्रधान समाज को क्रमबद्ध तरीके से समाप्त किया गया? मैं यह भी महसूस करता हूँ कि इन क्षेत्रों में संपत्ति महिलाओं के नाम में होती है लेकिन वे पुरुषों पर इक्कीस नहीं पड़ती हैं. वंश का नाम माता के नाम से चलता है. इन क्षेत्रों की महिलाएँ अपने अधिकारों के बारे में और घर की चारदीवारी से बाहर के संसार को तनिक बेहतर जानती हैं.

यह सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता के मूल निवासियों के इतिहास को इतना नष्ट और भ्रष्ट कर दिया गया है कि उसे पहचानना और उसका पुनर्निर्माण करना कठिन है. लेकिन संकेतों और चिह्नों को एकत्र करना संभव है और मानवीय अनुभव से कुछ-न-कुछ निकाला भी जा सकता है. भारत के कायस्थों ने आख़िर 200 वर्षों के संघर्ष के बाद अपना इतिहास ठीक करने में सफलता पाई है. ऐसा शिक्षा, संगठन और जागरूकता से संभव हो पाया. महर्षि शिवब्रतलाल (ये संतमत/राधास्वामी मत में जाना माना नाम हैं और सुना है कि इन्होंने भारत में दूसरी टाकी फिल्म बनाई थी जिसका नाम 'शाही लकड़हारा' था) और मुंशी प्रेमचंद कायस्थ थे. मेघवंशियों के लिए ऐसा कर पाना और भी कठिन होगा. परंतु यह करने लायक कार्य है.

Violence and Non-violence - हिंसा-अहिंसा



What can I do!
जातिवाद की शिकार ग़रीब जातियों के लिए दलित शब्द का प्रयोग किया जाता है. मैं इस शब्द से घृणा करता हूँ. मैं दलित हूँ का अर्थ यह निकलता है कि मैं गरीब हूँ, हीन हूँ, दीन हूँ, मैं क्या कर सकता हूँ, सभी मेरे खिलाफ हैं आदि. इस सोच को तुरत रोकिए. अपने मन को दुखी करना सब से बड़ी हिंसा है. यह सोचें कि मैं ठीक हूँ, सब के जैसा हूँ, सब के साथ मिल कर चल सकता हूँ, मुझे शिक्षित होना है, अन्य को शिक्षित बनाना है, देश के लिए बड़े कार्य करने हैं आदि. अन्य अच्छे लोग आपसे आ जुड़ेंगे. यह अहिंसा है.
Yes! I can.