Tuesday, September 28, 2010

अभिवादन का सूक्ष्म संसार (Subtle World of Courtesies)

बारह-तेरह साल की आयु में एक बार टोहाना में प्रातःकाल नहर के किनारे सैर पर जा रहा था. सामने से एक बूढ़ा व्यक्ति सैर से लौट रहा था. उसने मुझे राम-राम (Ram-Ram) जी कहा. मेरे मन में पहला प्रश्न उठा कि स्कूल में पढ़ाए गए अनुसार आयु में छोटा होने के नाते पहले मुझे नमस्ते (Namaste) कहनी चाहिए थी. मैंने उस सज्जन को नमस्ते कही और आगे निकल गया. अगले दिन मुझे वह घटना फिर से याद आई और मेरे विश्लेषक मन ने यह कहा कि उस सज्जन ने प्रेम से तो राम-राम नहीं कहा था बल्कि ऐसे कहा था जैसे वह मुझे सिखा रहा हो कि राम-राम कहना चाहिए.
बचपन देखें तो घर में नमस्ते की परंपरा थी. हमारी अमृतसर की उस गली में सत्श्रीअकाल’ (Sat sri akal) कहा जाता था. कुछ बड़े हुए तो नमस्कार (Namaskar) सीखा. दुनिया में बाहर निकले तो अभिवादनों की बाढ़ आ गई. कोई 'जय भोलेनाथ' या राम-राम कहता था कोई जय श्री कृष्ण’, ‘हरे कृष्णा तो कोई जय बाबा, 'जय गुरुदेवगुड मॉर्निंग और उसका हिंदी वर्शन सुप्रभात सुना. सुश्री एम.एस. सुब्बलक्ष्मी का गाया सुप्रभातम् बचपन से सुनता आया था फिर भी गुड मार्निंग के लिए सुप्रभात कान में चींटी चलाता था. उसमें सुब्बलक्ष्मी का सुमधुर कर्नाटक प्रभाव नहीं था. ऐसे ही शुभरात्रि का भी समझ लीजिए.
हर अभिवादन पहली बार अजीब लगा. अजीब तब भी लगा जब पहली बार किसी ने राधास्वामी कहा. मैं नहीं समझ पाया कि यह कैसा अभिवादन है और इसका सही अर्थ क्या है. बाद में इसे इतनी बार सुना कि आदत पड़ गई और मैं राधास्वामी मत के बहुत पास गया. ऐसे ही धन्न निरंकार’, (Dhan Nirankar) ‘जय माता दी (Jai Mata Di) भी आस-पास सुनाई देता है. जय श्रीराम (Jai Sriram) को तो राजनीतिक नारे का ऊँचा स्वर दे दिया गया.
अब एक नई स्थिति मेरे सामने है. मेघनेट पर कार्य करते हुए कई राज्यों के अलग-अलग लोगों के साथ बातचीत होती है. उनकी भाषा, स्थानीय संस्कृति का संस्कार अलग-अलग है. कहीं से अभिवादन मिलता है जय भीम (Jai Bhim) (डॉ. अंबेडकर को उनके अनुयायी कृतज्ञता के भाव से ऐसे याद करते हैं), जय कबीर (Jai Kabir) (पंजाब), खंडोबा प्रसन्न’ (Khandoba Prasanna) (महाराष्ट्र), जय मेघ- जय भीम (Jai Megh-Jai Bhim) और जय बाबा रामदेव (Jai Baba Ramdev) (राजस्थान), जय भीम– जय भारत (Jai Bhim-Jai Bharat) (उत्तर प्रदेश), जय महाबली (Jai Mahabali) (एक मित्र से सुना), वणक्कम् (Vanakkam) (तमिलनाडु), नमस्कारम् (केरल और आंध्रप्रदेश), धनी मातंग या धर्माचार’ (Dhani Matang or Dharmachar) (गुजरात)आदि. सब की ध्वनियाँ भिन्न हैं. सब को उन्हीं के अभिवादन में उत्तर देने की कवायद करता हूँ. अब दिल की बात बताता हूँ.
मुझे टेलीफोन पर इतने अभिवादनों के साथ स्वयं को सहज करने में समय लगता है. पहले तो यह भी लगता था कि मैं नमस्ते कहता हूँ, ये कुछ और कहते हैं. जो अभिवादन मेरी जिह्वा पर नहीं चढ़ा उसे बोलने में परेशानी भी होती है. लब्बो लुआब यह कि सब का अंदाज़ अपना-अपना. परंतु हैं तो हृदय से आए अभिवादन ही. अनेकता में एकता का एक और दर्शन.

इतने अभिवादन सुनने के बाद मेरे मन ने भी एक अभिवादन बना लिया है- जय मेघ- जय भारत’ (Jai Megh - Jai Bharat). मैं समझता हूँ यह अभिवादन भी है और शुभकामनाएँ भी कि समस्त भारत के मेघवंशी समृद्ध हों और भारत के माथे से ग़रीबी का कलंक हटे.  (Linked to MEGHnet )

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