Tuesday, September 28, 2010

Megh Vandana मेघ वंदना : Yash Pal Bhagat, I.E.S. यशपाल भगत, आईईएस)

(प्रत्येक व्यक्ति अपनी, समाज की और देश की उन्नति के लिए किसी को इष्ट बना कर प्रार्थना करता है. ऐसी कुछ प्रार्थनाएँ मेघनेट पर पहले से उपलब्ध हैं. मेघ चेतना पत्रिका के दूसरे अंक में श्री यशपाल भगतआई.ई.एस. की लिखी एक प्रार्थना मिली. इसे इस ब्लॉग पर संभाल लेना चाहता हूँ. यदि आपकी जानकारी में ऐसी अन्य रचनाएँ हों तो कृपया संपर्क करें. ऐसी रचनाओं का एक लिंक MEGHnet पर Other Links के नीचे हमारी प्रार्थनाएँ शीर्षक से बना दिया गया है. ये कभी पुस्तकाकार हो कर हमारा मार्ग प्रशस्त करेंगी. साहित्य हमारा हित करता है. प्रार्थनाएँ हमारा भविष्य बनाती हैं.)
   
हे मालिक! ईश्वर, मेरे ख़ुदा।
तेरे चरणों में सजदा करें हम सदा।

हाथ जोड़ करें मेघ यह विनती।
सरबत का भला सब की हो उन्नति।
हर बुराई को कह दें हम अलविदा।
हे मालिक, ईश्वर, मेरे ख़ुदा।

दीन दुखियों को, उठने की दो हिम्मत।
तेरी रहमत से दुनिया बने जन्नत।
हो सच्चाई हमारी सदा संपदा।
हे मालिक, ईश्वर, मेरे ख़ुदा।

बूँद बन कर गिरें, हम मोती बनें।
बुझ न पाए जो वह मेघ ज्योति बनें।
हक़ के लिए सब कुछ कर दें फ़िदा।
हे मालिक, ईश्वर, मेरे ख़ुदा।

सप्त सिंधु के मेघों को वरदान दो।
जो वतन पर मिटे ऐसी संतान दो।
शान से हम जिएँ हो ऐसी अदा।
हे मालिक, ईश्वर, मेरे ख़ुदा।

                यशपाल भगत
                साभार: मेघ चेतना

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धार्मिक जगह कभी-कभी, शिक्षा निरंतर

भारत के जातिवाद की शिकार ग़रीब जातियों को धर्म ने भी शोषित किया है. धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाज़ इनके हाथों से धन खीचते रहते हैं. इसके लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं, जैसे 1. यह प्रचार कि धार्मिक स्थल पर जाने से ही मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, 2. यह प्रचार कि यह विशेष धार्मिक स्थल समतावादी समाज का निर्माण करेगा, 3. यह प्रचार कि यही डेरा मानवतावादी है, 5. यह अनुष्ठान न करने से पूर्वजों को कष्ट होगा, 6. यह यज्ञ करने से पवित्रता आएगी, 7. यह दान देने से यश और समृद्धि प्राप्त होगी आदि. यह किसी का व्यवसाय हो सकता है. आप उसमें मदद कर सकते हैं परंतु शोषण के प्रति होशियार रह कर.

धर्म या संप्रदाय के झंडे पर ऐसे आकर्षक और संकेतात्मक नारे लिख दिए जाते हैं कि ग़रीब जातियों के लोग किसी आशा में आकर्षित हो जाते हैं. अंतिम परिणाम वही- आर्थिक शोषण. चढ़ावा चढ़ाओ, मन्नत माँगो और घर चले जाओ. मन्नत तो घर पर भी माँगी जा सकती है. लोगों का अनुभव है कि धार्मिक जगहों पर की गई सभी मनोकामनाएँ पूरी नहीं होतीं. मनोकामना वह भी पूरी हो जाती है जो गली या पार्क में की जाए, वह भी बिना पैसा-प्रसाद चढ़ाए.

इधर धार्मिक स्थल इतने बना दिए गए हैं कि राह चलते सिर से टकराते हैं. एक सावधानी बरती जा सकती है कि जैसे ही धर्म स्थल सामने आए उसी समय अपने बच्चों की शिक्षा और उन्नति का ध्यान करें और अपनी मेहनत का पैसा उनकी शिक्षा पर व्यय करें. बच्चों को अच्छी शिक्षा देना देशभक्ति है, पूजा का बेहतर स्वरूप है. हालाँकि इस भक्ति (शिक्षा) को मँहगा किया जा रहा है जो ग़रीब जातियों के विरुद्ध षड्यंत्र से कम नहीं है. हम मिलकर प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर उनका भला करे.
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अभिवादन का सूक्ष्म संसार (Subtle World of Courtesies)

बारह-तेरह साल की आयु में एक बार टोहाना में प्रातःकाल नहर के किनारे सैर पर जा रहा था. सामने से एक बूढ़ा व्यक्ति सैर से लौट रहा था. उसने मुझे राम-राम (Ram-Ram) जी कहा. मेरे मन में पहला प्रश्न उठा कि स्कूल में पढ़ाए गए अनुसार आयु में छोटा होने के नाते पहले मुझे नमस्ते (Namaste) कहनी चाहिए थी. मैंने उस सज्जन को नमस्ते कही और आगे निकल गया. अगले दिन मुझे वह घटना फिर से याद आई और मेरे विश्लेषक मन ने यह कहा कि उस सज्जन ने प्रेम से तो राम-राम नहीं कहा था बल्कि ऐसे कहा था जैसे वह मुझे सिखा रहा हो कि राम-राम कहना चाहिए.
बचपन देखें तो घर में नमस्ते की परंपरा थी. हमारी अमृतसर की उस गली में सत्श्रीअकाल’ (Sat sri akal) कहा जाता था. कुछ बड़े हुए तो नमस्कार (Namaskar) सीखा. दुनिया में बाहर निकले तो अभिवादनों की बाढ़ आ गई. कोई 'जय भोलेनाथ' या राम-राम कहता था कोई जय श्री कृष्ण’, ‘हरे कृष्णा तो कोई जय बाबा, 'जय गुरुदेवगुड मॉर्निंग और उसका हिंदी वर्शन सुप्रभात सुना. सुश्री एम.एस. सुब्बलक्ष्मी का गाया सुप्रभातम् बचपन से सुनता आया था फिर भी गुड मार्निंग के लिए सुप्रभात कान में चींटी चलाता था. उसमें सुब्बलक्ष्मी का सुमधुर कर्नाटक प्रभाव नहीं था. ऐसे ही शुभरात्रि का भी समझ लीजिए.
हर अभिवादन पहली बार अजीब लगा. अजीब तब भी लगा जब पहली बार किसी ने राधास्वामी कहा. मैं नहीं समझ पाया कि यह कैसा अभिवादन है और इसका सही अर्थ क्या है. बाद में इसे इतनी बार सुना कि आदत पड़ गई और मैं राधास्वामी मत के बहुत पास गया. ऐसे ही धन्न निरंकार’, (Dhan Nirankar) ‘जय माता दी (Jai Mata Di) भी आस-पास सुनाई देता है. जय श्रीराम (Jai Sriram) को तो राजनीतिक नारे का ऊँचा स्वर दे दिया गया.
अब एक नई स्थिति मेरे सामने है. मेघनेट पर कार्य करते हुए कई राज्यों के अलग-अलग लोगों के साथ बातचीत होती है. उनकी भाषा, स्थानीय संस्कृति का संस्कार अलग-अलग है. कहीं से अभिवादन मिलता है जय भीम (Jai Bhim) (डॉ. अंबेडकर को उनके अनुयायी कृतज्ञता के भाव से ऐसे याद करते हैं), जय कबीर (Jai Kabir) (पंजाब), खंडोबा प्रसन्न’ (Khandoba Prasanna) (महाराष्ट्र), जय मेघ- जय भीम (Jai Megh-Jai Bhim) और जय बाबा रामदेव (Jai Baba Ramdev) (राजस्थान), जय भीम– जय भारत (Jai Bhim-Jai Bharat) (उत्तर प्रदेश), जय महाबली (Jai Mahabali) (एक मित्र से सुना), वणक्कम् (Vanakkam) (तमिलनाडु), नमस्कारम् (केरल और आंध्रप्रदेश), धनी मातंग या धर्माचार’ (Dhani Matang or Dharmachar) (गुजरात)आदि. सब की ध्वनियाँ भिन्न हैं. सब को उन्हीं के अभिवादन में उत्तर देने की कवायद करता हूँ. अब दिल की बात बताता हूँ.
मुझे टेलीफोन पर इतने अभिवादनों के साथ स्वयं को सहज करने में समय लगता है. पहले तो यह भी लगता था कि मैं नमस्ते कहता हूँ, ये कुछ और कहते हैं. जो अभिवादन मेरी जिह्वा पर नहीं चढ़ा उसे बोलने में परेशानी भी होती है. लब्बो लुआब यह कि सब का अंदाज़ अपना-अपना. परंतु हैं तो हृदय से आए अभिवादन ही. अनेकता में एकता का एक और दर्शन.

इतने अभिवादन सुनने के बाद मेरे मन ने भी एक अभिवादन बना लिया है- जय मेघ- जय भारत’ (Jai Megh - Jai Bharat). मैं समझता हूँ यह अभिवादन भी है और शुभकामनाएँ भी कि समस्त भारत के मेघवंशी समृद्ध हों और भारत के माथे से ग़रीबी का कलंक हटे.  (Linked to MEGHnet )