Saturday, August 28, 2010

रंगमंच के माध्यम से


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मैंने उसके बारे में सुन रखा था. ज़ुल्फ़िकार ख़ान ने एक कार्य को अलग अंदाज़ में किया है. थिएटर एज चंडीगढ़ में नया नाम नहीं है. आप थिएटर एज के एक थ्रीव्हीलर को रद्दी पेपर और रद्दी सामान एकत्रित करते हुए देख सकते हैं. यह साधारण गतिविधि लगती है. परंतु यह साधारण नहीं है. इसका परिदृश्य बहुत बड़ा है और ऐसे क्षेत्र में है जहाँ जाने का साहस बहुत कम लोग करते हैं.
ज़ुल्फ़िकार ख़ान शाहाबाद, ज़िला हरदोई, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं जो अत्यंत ग़रीबी और बेरोज़गारी के लिए जाना जाता है. उनके अपने परिवार में पाँच भाई और एक बहन है. उन्होंने बचपन में देखा है कि सप्ताह में दो-तीन बार ही खाना बनता था. आगे चल कर परिवार की स्थिति बेहतर हुई.
वे चंडीगढ़ में अपने बड़े भाई से मिलने के लिए आए. तब तक वे स्नातक पास कर चुके थे. वे फिल्मों में कार्य करना चाहते थे. डिपार्टमेंट ऑफ़ इंडियन थिएटर में प्रवेश के लिए पहली कोशिश की परंतु सफलता नहीं मिली. तब टी.वी. मैकेनिक का कार्य सीखाबात नहीं बनी. टेलरिंग का कार्य सीखा, एक टी.वी. शॉप पर नौकरी की परंतु बात नहीं बनी. किसी के कहने पर पुनः डिपार्टमेंट ऑफ़ इडियन थिएटर में कोशिश की और बात बन गई. वहाँ से गोल्ड मेडलिस्ट बन कर निकले. परंतु यह जीवन संघर्ष की शुरूआत भर थी.
रंगमंच के क्षेत्र में प्रभावशाली लोग बहुत हिस्सा लेते हैं. ज़ुल्फ़िकार के एक नाटक की रिहर्सल के दौरान एक बच्चे को ऐसी जगह बिठाया गया जो छुपने की जगह जैसी गोलाकार थी. एक व्यक्ति आया और कहा कि इस बच्चे को यहाँ न रखिए बाहर निकालिए. उसे पूछा गया कि आप कौन हैं तो उसने बताया कि वह बच्चे का बॉडीगार्ड था. ज़ुल्फ़िकार ने पहली बार सुना कि बच्चे का भी बॉडीगार्ड होता है. शाम को यूनीवर्सिटी आपने होस्टल लौट रहे थे तो रास्ते में कूड़े के एक बड़े कण्टेनर में कई बच्चों को अस्वस्थकर स्थितियों में कूड़ा बीनते हुए देखा. आपने भी देखा होगा.
ज़ुल्फ़िकार ने उन बच्चों को थिएटर में लाने की सोची. सैक्टर 25 में श्मशान घाट के पास पेड़ के नीचे साफ़ जगह बनाई गई और गानों की रिहर्सल शुरू हुई. अगले दिन वहाँ पहुँचे तो वहाँ लोगों ने जंगल-पानी किया हुआ था. सो दूसरे पेड़ के नीचे जगह साफ़ की गई. अगले दिन भी लोगों ने प्रमाणित कर दिया था कि जंगल-पानी के लिए साफ़ जगह होनी चाहिए. होस्टल के पास ही कार्य शुरू किया गया जो चल निकला.
अब उनका समूह स्वरूप ग्रहण करने लगा जो आगे चल कर एक ग़ैर-सरकारी संगठन बना जिस का नाम थिएटर एज रखा गया. ग़रीब बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए कक्षाओं का प्रबंध किया गया. अपनी कमाई के लिए बच्चे बार-बार कक्षाएँ छोड़ कर भाग जाते. उन्हें बार-बार वापस लाया गया. ज़ुल्फ़िकार ख़ान आज इस ग़ैर-सरकारी संगठन के अध्यक्ष हैं. 


एक पत्रकार भाई ने उन्हें रद्दी एकत्र करके आय का स्रोत खड़ा करने का आइडिया दिया. पहले साइकिल पर रद्दी इकट्ठी की गई फिर साइकिलों पर. फिर स्कूटर खरीदा गया. उल्लेखनीय है कि इस कार्य के लिए सरकार से कोई मदद नहीं ली गई. एक समय आया जब भारतीय स्टेट बैंक की नज़र पड़ी और उसने एक थ्रीव्हीलर ले कर दिया. थिएटर एज नुक्कड़ नाटकों से लेकर टैगोर थिएटर तक में अपने आयोजन करता है और कई सामाजिक सरोकारों से जुड़ा है. इसने ग़रीबी के हाशिए में पड़े 55 बच्चों के लिए प्रयास किया है. इनके द्वारा चलाए जा रहे स्कूल में बच्चों के भोजन से लेकर पढ़ाई तक की ज़रूरतें पूरी हो रही हैं. वे कंप्यूटर की भी ट्रेनिंग देते हैं. चंडीगढ़ के संभ्रांत परिवारों के लोग यहाँ बच्चों को कई विषय पढ़ाने के लिए अपना समय, धन और मुफ़्त सेवा दे रहे हैं.

डॉ. वीरेंद्र मेंहदीरत्ता एवं श्रीमती कांता मेंहदीरत्ता बच्चों के साथ

यदि आप चंडीगढ़ में हैं और घर का रद्दी सामान निकाल रहे हैं तो इस मोबाइल नंबर का प्रयोग कर सकते हैं. 9815145453


Friday, August 27, 2010

धार्मिक एकता (Religious Unity)

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    यदि कोई समझता है कि उनका धर्म या उसका गुरु दुनिया में सर्वश्रेष्‍ठ है तो वह गंभीर गलती पर है. व्‍यक्ति का अपना विश्‍वास सर्वश्रेष्‍ठ है, जहाँ भी आ जाए.
    बाहरी धर्म मनुष्‍य का बनाया हुआ एक नकली हौवा है. वास्तविक धर्म अच्‍छे गुणों को अपने भीतर धारण करना है. बाहरी धर्म का कार्य लोगों को रोचक, भयानक और आकर्षक बातें सुना कर उनका दोहन या शोषण करना और धन एकत्रित करना है. कुछ धन सामाजिक कार्यों पर खर्च करके लोगों को प्रसन्न रखा जाता है. शेष धन ऐसी जगह इस्तेमाल होता है जिससे लोगों पर रौब और धौंस जमाई जा सके. तब राजनीति का खेल खेला जाता है. ये बातें जुड़ी हुई हैं.  इसे आखें खोल कर देख लें और समझ लें.
    मनुष्‍य के भीतर का धर्म (अच्‍छा गुण भंडार) ही वास्‍तविक  धर्म है. कोई व्‍यक्ति शराब पीता है और धार्मिक जगहों और तीर्थ स्थलों पर भी जाता है तो जान लें वह कुछ भी हो सकता हैपरन्‍तु धार्मिक नहीं हो सकता.           
    जिस व्‍यक्ति में हीनता की भावना है वह भी धार्मिक नहीं कहला सकता क्‍योंकि उसने अपने भीतर ब्रह्म बनने या बढ़ने का गुण धारण नहीं किया. अपने आपको सब के जैसा अच्‍छा मानव समझें और जीवन का कार्य करें.
    दूसरों को धर्मभीरू बनाने के लिए कई अनपढ़ लोग कहते हैं कि 'धर्म से डरो'. जिसका अर्थ है बाहरी धर्म से डरो. भीतरी और असली धर्म से डरने की तो आवश्यकता ही नहीं है. धर्म को धारण करने वाला धार्मिक है. धर्म से डरने वाला धार्मिक नहीं हो सकता. धर्म की सौगंध खाने वाले अक़सर झूठे पाए गए हैं.
    परिवार और समुदाय की बेहतरी के लिए कर्म करना धर्म है. समुदायिक कार्य के लिए दान देना भी धर्म है. बाहरी धर्म या धर्मस्‍थल बाद में आते हैं. इस बात को समझ लेने पर धार्मिक एकता की कोई समस्‍या रह जाएगी. समाज के प्रति अपने धर्म का पता हो तब धार्मिक एकता या धार्मिकता की समस्‍या कैसी?

Tuesday, August 24, 2010

Bhagat Maha Sabha Meets at Pathankot



Newspoint Bureau
Pathankot, August 22
A meeting was held by Bhagat Maha Sabha under the leadership of district co-ordinator G.L. Bhagat.
The Chief guest of meeting was National President of Bhagat Maha Sabha Prof. Raj Kumar Bhagat and Tara Chand was guest of honour. The co-ordinators of different Bhagat Maha Sabha units of Tehsil Pathankot has participated the meeting.
In this meeting the working of Sabha was inspected and the policies for new years was discussed. Speaking on the occasion Prof. Bhagat said that Sabha had also constituted women cell and to promote it the presidents will be appointed soon who will constitute the women committees in their own area as per the directions of higher authority of Sabha.
He also praised the work done by Asha Bhagat, G.L. Bhagat, Pawan Bhagat, Varinder Bhagat, Vishav Bhagat and Ratan Bhagat.
On this occasion Karm Chand, Sansar Chand, Lal Chand, Des Raj, Ratan Chand, Vijay, Ami Chand, Ramesh Bhagat, Satpal, Jagdish, Shashi, Omprakash and Tara Chand were present.



Saturday, August 21, 2010

बलाई समाज जाग्रति महासंघ (Balai Samaj Federation)


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जयपुर 08 अगस्त 2010 राजस्थान प्रदेश बलाई समाज जागृति महासंघ की सातवीं महापंचायत धर्मशाला एवं छात्रावास भेरूजी के मन्दिर के सामने बेनाड़, जिला जयपुर में अखिल भारत अनुसूचितजाति परिषद्‌ के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल डेनवाल की अध्यक्षता एवं श्री लालचन्द कटारिया सांसद जयपुर ग्रामीण के मुख्य अतिथि एवं श्री नारायण कुलरिया, उप जिला प्रमुख विशिष्ट अतिथि सहित अनेक गणमान्य लोगों के साथ बलाई महापंचयात एवं बलाई समाज सामूहिक गोठ का आयोजन बडी धूम-धाम से संम्पन हुआ एवं बलाई समाज के जनजाग्रण हेतू विशाल वाहन रेली भी निकाली गई जिसमें लाल चन्द कटारिया क्षेत्रीय सांसद ने अपने कोटे से 5 लाख रुपये बलाई सामुदायिक भवन के निर्माण व 2 लाख रूपये श्री नारायण कुलरिया उप जिला प्रमुख ने शौचालय निर्माण व भेरूलाल बुनकर जिला पार्षद ने बलाई सामुदायिक भवन के लिए 2.5 लाख रुपये देने की घोषण की गई. इसके अलावा अनेक समाज सेवकों ने भी अपनी श्रद्धा के अनुसार सहयोग दिया. इस अवसर पर अनेक भजन कार्यक्रम भी हुए. श्री बंन्सीधर रांगेरा, महानगर अध्यक्ष एवं श्री हरिश बागोतिया प्रदेश महामंत्री, श्री भैरू लाल जाटावत जिला पार्षद व श्री महेन्द्र तानावाड, ठेकेदार, चौमू श्री बंशीलाल चाहिल्या एडवोकेट अध्यक्ष राजस्थान प्रदेश बलाई बिग्रेड, संयोजक व्यवस्था कमेटी श्री आर.जी. बुनकर प्रदेश अध्यक्ष राजस्थान प्रदेश बलाई समाज जागति महासंघ जयपुर, श्री बद्रीनारायण बाण्डिया ग्राम अणतपुरा वाया जैतपुरा चौमू, संयोजक जोधाराम बुनकर देगडावास, पं. नरोत्तम सागर संयोजक कर्मकाण्ड शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान बढारणा, श्री मांगीलाल रांगैरा खोराचिराडा, श्री किशनलाल तानावाड अध्यक्ष राज मेघवंशी बलाई समाज सामूहिक विवाह संस्थान, श्री हरिशंकर बुनकर तहसील अध्यक्ष बलाई समाज जाग्रति महासंघ धाटाजलधारी जमवारामगढ, श्री रामजीवन बुनकर, श्री बंशीधर बुनकर जालसु व्यवस्था कमेटी, श्री गोपाल कांदेला महासचिव जयपुर महानगर राजस्थान मेघवंशी कल्याण परिषद्‌, श्री अर्जुनलाल मेघवंशी तहसील अध्यक्ष बलाई जाग्रति महासंघ कानोता (बस्सी), सहित अनेक बलाई संस्थाओं के पदाधिकारी सहित चौमू, शाहपुरा, विराट नगर जमवारामगढ, सांभर फुलेरा, अजीतगढ़ (जिला सीकर) बस्सी, दूदू आमेर कानोता सहित अनेक तहसीलों सहित जयपुर महानगर के पंच पटेलों व अन्य बलाई समाज के प्रमुख समाज के गण मान्य गणों के बीच बैठक हुई जिसमें निम्नलिखित निर्णय लिये गयेः-
1.    हमारा समाज मेघवंशी है और सर्वब्राह्मण महासभा की तर्ज़ पर व कर्मचारी-कर्मचारी भाई-भाई कि तर्ज़ पर अगर कोई सर्व मेघवंशी महासभा बनती है तो हमे अपनी जाति बलाई का स्वरूप बनाए रखते हुए समरसता का परिचय देते हुए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आज की समय की मांग के अनुसार उसकी मदद कर सामाजिक व राजनीतिक एकता का परिचय देना चाहिए.
2.    जगह-जगह समाज उत्थान के लिए छात्रावास, बालिका छात्रावास, विद्यालय, महाविद्यालय, आवास, धर्मशालाएँ, प्रशिक्षण केन्द्र, कोचिंग आदि का निर्माण करते हुए क्लास, पैत्रिक कार्यों की ओर भी ध्यान दें.
3.    कोई भी व्यक्ति दूसरे समाज की मीटिंगों/सभाओं/पंचायतों या महा-सम्मेलनों में उस जाति का व्यक्ति बनकर नहीं जायेगा या पिछल्गू बन कर नही रहेगा. समाज एकता को जो भी खण्डित करने की कोशिश करेगा वो समाज का दोषी कहलाएगा. साथ ही रोटी-बेटी और वोट समाज को ही दिया जाएगा.
4.    सफाई कर्मचारी आयोग की तर्ज़ पर बुनकर आयोग व बुनकर वित्त व विकास सहकारी निगम की स्थापना की जाए. राजस्थान राज्य बुनकर सहकारी संघ व राजस्थान हैण्डलूम बोर्ड में बलाई जाति के बुनकर को ही अध्यक्ष बनाया जावे. गुर्जर समाज की भान्ति देवनारायण बोर्ड की तर्ज़ पर बुनकर कल्याण बोर्ड बनाए जाकर 400 करोड़ रुपये का प्रावधान कर केबिनेट का दर्जा देकर बलाई (बुनकर) को ही अध्यक्ष बनाया जाए.
5.    गैर सरकारी संस्थाओं में आरक्षण एवं गांव की दुग्ध डेयरी, ग्राम सेवा सहकारी सोसायटियाँ, सहकारी बैंक आदि में गांव से लेकर जिला एवं प्रदेश स्तर पर अध्यक्ष/उपाध्यक्ष के पदों पर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आरक्षण लेने का प्रयास करेंगे.
6.    जनसंख्या के अनुसार देश व प्रदेशों के बजट में से हमारे समाज के विकास पर खर्च किया जावे एवं जनसंख्या के अनुपात के अनुसार ही खेती व अन्य जमीनों पर खातेदारी अधिकार दिए जाए व सरकारी योजनाओं में जनसंख्या के अनुपात के अनुसार ही भगवान मेघ, भगवान मेघऋषी महाराज, संत कबीर साहेब, बाबा रामदेव जी महाराज, बाबा साहेब डॉ.अम्बेडकर, गरीब साहेब आदि के नाम से सरकारी योजनाओं के नाम काबिज की जाए. एवं इन संत-महात्माओं के नाम से डाक टिकट बनाए जाएं.
7.    किसी भी उस दूसरे समाज के व्यक्ति के शादियों आदि अन्य समारोह में भोजन प्रसादी नहीं लेने जाएँ जो हमारे यहाँ आकर नहीं खाता हो. एवं मृत्युभोज एक अभिशाप है इस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाए. निमन्त्रण के लिए (चीरी) भी जारी न की जाए बल्कि अपने निजी सगे-संबंधियों तक ही सीमित रखी जाए.    
(आर.जी. बुनकर, प्रदेश अध्यक्ष) (बंशीधर रांगैरा, महानगर अध्यक्ष जयपुर)












Thursday, August 5, 2010

आपसी विश्वास बढ़ाएँ


एक बार बाबा फकीर चंद 1968 के आसपास हैदराबाद गए. वहाँ उन्होंने सत्संग दिए. एक सत्संग चिंतल बस्ती के पास रखा गया था. उसमें एक जाति विशेष के लोग भी आए जिन्हें दलित जाति के कहा जाता था. देखते ही मालूम होता था कि वे अत्यंत ग़रीब थे. वे एक कोने में बैठे थे. सत्संग के बाद वे फकीर चंद से मिले. वे नामदान लेना चाहते थे. फकीर ने उनकी हालत देखी. कहा, राम-नाम का क्या करोगे? तुम्हारी समस्या ग़रीबी है. नामदान लेना ही है तो ऐसा करो कि धार्मिक काम के लिए कभी उधार मत लो. शादी विवाह में झूठी शान के लिए ज़्यादा खर्च मत करो. खर्च के लिए अपना एक चिटफंड बनाओ. उसी में से बच्चों की शादियाँ करो. ऐसी सलाह दे कर वे चले आए. यह सच्चा नामदान था. सन् 1984 में मैंने चिंतल बस्ती देखी. उस समय वहाँ के लोगों की हालत बहुत अच्छी थी.
चंडीगढ़ के एक परिवार ने अपना एक फंड बनाया. सभी कमाऊ सदस्य प्रति माह दो सौ रुपए एक जगह जमा करते थे. ज़रूरत पड़ने पर कोई भी सदस्य उस फंड में से राशि ले सकता था. बाद में राशि लौटा दी जाती. उसे कोई ब्याज़ नहीं देना होता था. इस समूह ने बच्चों की शादियों समेत कई बड़े कार्य उस फंड में से किए.
इसे आज़मा कर देखें. बीस-बीस परिवार ऐसे समूह बना कर देखें. इसे शहरों में भी बनाया जा सकता है परंतु गाँव में ऐसा फंड किसी भी बैंक से बेहतर काम करेगा. ऐसे समूहों को बैंकों के साथ जोड़ा भी जाता है और बैंक उन्हें बचत के अनुसार ऋण भी देते हैं. स्वयं सहायता समूह बनाने से संबंधित एक पुस्तिका इस लिंक पर उपलब्ध है.


अपनी ईमानदारी पर विश्वास कीजिए. आपस में विश्वास बढ़ाइये. इसकी सफलता की कहानी यहाँ पढ़िए.


Wednesday, August 4, 2010

बौध मेघवंशी हैं - Buddhist Are Meghvanshis


हैदराबाद में मेरे एक पुराने मित्र हैं. वे बौध हैं और बहुत ही प्यारे व्यक्ति हैं. एक दिन फोन पर बात करते हुए मैंने मेघवंश का उल्लेख किया. उन्होंने प्रतिक्रिया की कि मेघवंशी उत्तर भारतीय हैं और नागवंशी (Nagvanshi) नागपुर (Nagpur) (महाराष्ट्र) के हैं. मैं जानता हूँ कि वे अम्बेडकरवादी हैं. उनकी प्रतिक्रिया से मझे धक्का लगा. अधिक पूछने पर पता चला कि उनके एक मित्र ने उन्हें ऐसा बताया था. तब मैंने उन्हें कुछ संदर्भ दिए ताकि वे समझ जाएँ कि दोनों का मूल एक ही है. वृत्र को पहला मेघ माना जाता है और उसे ही वृत्र असुर और अहि (नाग) वृत्र कहा गया है. ये दोनों ही नाम उसे दिए गए. बाद में उसकी संतानों को भी यही नाम दिए गए जो आज भी प्रचलित हैं.

नाम हमें बाँट देते हैं. पौराणिक कथाओं (Mythical Stories)और भ्रष्ट इतिहास (Corrupted History) के संदर्भ दे कर हमारे सामाजिक समूहों को और बाँट दिया जाता है. उन्हें क्षेत्रीय आधार पर भी बाँटा गया जैसा कि ऊपर दिए उदाहरण में था. इस प्रक्रिया को रोकने आवश्यकता है. इस बात की तुरत आवश्यकता है कि लोगों को शिक्षित करने के प्रयासों में तेज़ी लाई जाए. अलग-अलग राज्यों और धर्मों के हमारे नेताओं को इस गंदी बाँट को समझना चाहिए और एकता की प्रक्रिया को शुरू करना चाहिए. अन्य दायरों और क्षेत्रों के विवेकशील नेताओं को भी विचार-विमर्श में शामिल किया जा सकता है. इस बात का भी बहुत महत्व है कि बँटे हुए समाजिक समूहों को जोड़ने की ग़र्ज़ से धार्मिक नेताओं को एक मंच पर आने के लिए मजबूर किया जाए.

There is a google site link regarding Meghvanshis here --> Megh Rishi and Meghvansh